Sunday, January 31, 2016

"अघटित घटन, सुघट बिघटन, ऐसी बिरुदावली नहिं आन की।"

विनय पत्रिका में तुलसी बाबा हनुमानजी के लिए कहते हैं 
"अघटित-घटन, सुघट-बिघटन, ऐसी बिरूदावलि नहिं आनकी"
जो न घटने वाली घटना को घटा दे और जो घटना घटने वाली हो उसे विघटित कर दे ऐसा सामर्थ्य हनुमानजी का हैं !!!!!

और किसमें हैं ऐसा सामर्थ्य???
क्या स्वयं रामजी में भी नहीं!!!!!

काल सबको खाता हैं सब काल के वश में हैं लेकिन हनुमान जी महाकाल हैं।
काल स्वयं इनके वश में हैं इनके हाथ का खिलौना हैं  काल ---- "हाथ वज्र .........विराजे" वज्र मने काल 😊

दूसरे हनुमान जी इस प्रकृति से भी परे हैं।
क्योंकि इस प्रकृति प्रपंच को रघुनाथ जी ने गुण-दोष सहित रचा हैं, "सकल गुण दोषमय बिस्व कीन्ह करतार" 
संसार में ऐसा कोई नहीं जो सिर्फ़ गुणी हो या सिर्फ़ अवगुणी हो, गुण अवगुण दोनों ही सबमें रहतें है।
एक हनुमान जी में ही सिर्फ़ गुण ही गुण भरे हैं, "सकल गुण निधानम"।
क्योंकि जगन्माता जानकी जी ने ही इन्हें आशीर्वाद दिया हैं "........गुणनिधि, सुत होहु"
 इतना सुनकर तो प्रकृति भी मौन रह गई की अब तो हमारा भी कुछ बस नहीं हैं, अब तो
"अघटित घटन, सुघट बिघटन" समर्थ हनुमान जी हो गए हैं।
एक कारण और भी हैं, ऐसा सामर्थ्य तो परमेश्वर के अलावा और किसका हो सकता हैं, और हनुमान जी परमेश्वर हैं नहीं ये तो उनके दास हैं फिर उनका ऐसा बल कैसे हुआ???
सीधी सी बात हैं हनुमान जी का खुद का कोई बल हैं ही नहीं ;)  !!!!!!
क्या बात करते हो!!!    उनको "अतुलित बल धामं" कहा गया हैं और तुम कहते हो उनका कोई बल ही नहीं हैं!!!!

देखो भईया धाम कहते हैं घर/मन्दिर/तीर्थ को, तो हनुमान जी तो धाम हैं जिसमे बल रहता हैं और प्रभु से सम्बंधित स्थान को ही धाम कहा जाता हैं तो धाम हनुमानजी और धामी प्रभु का बल और बल तथा बलवान अलग अलग होते नहीं तो सारा सामर्थ्य हुआ रामजी का।
इसलिए "अघटित घटन, सुघट बिघटन, ऐसी बिरुदावली नहिं आन की।"
😊😊😊😊😊😊