Friday, February 18, 2011

देश,संस्कृति को छोड़, शीला की चिंता खात है

भंड भांड बहुत फिरे पी वारूणी मतवारे
हरी कीर्तन भूले, गावें मुन्नी गान सारे

जोबन युवान को सारो गर्त में ही चल्यो जात है
देश,संस्कृति को छोड़, शीला की चिंता खात है

मोहल्ला में कौन मर्यो बस्यो कछु खबर नहीं
पर आर्कुट,फेसबुक पर सिगरो जगत बतरात है

अरे यह काहे को जोबन और कैसी जबानी है
खाली फूंकनी सी नसान में बहयो जात पानी है

अब भी ऊठ चेत करलो रे संगी, बनजा सत्संगी
देश-संस्कृति की कीरत को अमित वृक्ष बड़ो जंगी
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वारूणी ---- शराब
सिगरो ---- सारा, सभी
चेत ---- जागना, होश
बतरात ---- बात करना
नसान ---- नसों में (स्थानिक रूप में प्रयुक्त)
कीरत ---- कीर्ती

Thursday, February 17, 2011

गठबंधन की लाचारी या मन ही भ्रष्ठाचारी है

ये असल कमीने छिपे शफ्फाफ पोशाको में
नित नित लूट माल भरते निज तोशाखाने में

बदनाम करें खुद करतूतों से पंथ विशेष को
की फांसी दी तो विशेष नष्ट करदेंगे देश को

अमित आस बस नेक्स्ट जेन के भरोसे है
वरना गठबंधन के लाचारी मन मसोसे है



गठबंधन की लाचारी या मन ही भ्रष्ठाचारी
है
प्यादे को करके आगे खा रही विदेशी नारी है
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शफ्फाफ पोशाको ---- सफ़ेद कपडे, (उज्जवल चरित्र के सन्दर्भ में)
तोशाखाने ---- तिजोरी वस्त्रों और आभूषणों आदि का भण्डार।
नेक्स्ट जेन ---- युवा पीढ़ी से तात्पर्य


Monday, February 7, 2011

"मन आज मुझे ना जाने क्या-क्या कहता. नंगों को ही नंगा करने को कहता" --- प्रतुल वशिष्ठ

शांत चित्त कवि-ह्रदय प्रतुल जी वसंत पर्व पर एक नवीन ही आराधना कर रहे है. एक नवीन सरस्वती-आराधना गीत में उन्होंने अपने भाव प्रज्वलित किये है, आप भी इस आग में जलें आपके भी सीने में यही तपन पहुंचे, इसलिए आपको अपने साथ प्रतुल जी के ब्लॉग पर चलने का निमंत्रण देता हूँ ।
देखिये इस अंश में ही कितनी गर्मी है ---

मैं आज विवश होकर विषपान करूँगा.
पर कंठ तलक ही विष को मैं रक्खूँगा.
मेरी वाणी को सुन पापी तड़पेगा.
अन्दर से मरकर बाहर से भड़केगा


Wednesday, February 2, 2011

प्रेम हमारा दिव्या ! अमित रहे काल अनंत तक, यही चाहूँगा


आज हमारी शादी की पांचवी वर्षगाँठ है .
आशीर्वाद दीजिये मुझे और मेरी संगिनी दिव्या को, की हमारा प्रेम हमेशा दिव्य और अमिट रहे .


और यह कुछ भाव अपनी प्रिया को वर्षगाँठ पर विशेष भेंट स्वरुप
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अहो मत्त गयंदिनी चपला चित्त-हारिणी
तुम जीवन सखी मम ह्रदय कुञ्ज विहारिणी
थी हुयी प्रविष्ट क्षण जिस तुम जीवन में मेरे
नित मंगल बधाव प्रगटे रस प्रेम सिक्त घनेरे

परिजन आशीष-बल सबल उन्मुक्त था मन
नहीं चिंतन मनन फिरता था चहुँ छोर गगन
कल्पित वातायन में बैठ रचा करता छबी दिव्य
अंकन चित्रण पुनः संपादन ना जानता भवितव्य

निर्विकल्प समाधी सी दशा अजब ही होती जाती थी
पर विधाता ने भी अब भला हमारा करने की ठानी थी
थकित अनवरत प्रतीक्षित थे नयन दो से चार होने को
उत्कंठित प्राण चाहते जानना है कौन संग हमारे होने को

प्रबल चाहना पौत्र विवाह की बाबा की उग्र जब हो आई थी
श्यामसुंदर की लीलावश मैं तुम्हारे तुम सामने मेरे आई थी

प्रिये! क्या अनुपम थी वो प्रथम परिचय कि वेला
विकस उठे थे ह्रदय उपवन में जूही चंपा अरु बेला
रूप माधुरी अतिमधुर तुम्हारी मधुकर नयन हुए थे
हृदयस्थित कामना को पूर्ण शुभ परिणाम मिले थे

एहो प्राणसखी! मम ह्रदय निकुञ्ज विलासिनी प्रिये
सर्वकुटुम्बीजन मनभावनी सौभाग्य वर पावनी श्रिये
धन्य जीवन, सुगम कर्म पथ हुआ संगी तुमसा पाकर
धर्म सभी मेरे तुमने धार लिए मेरी सहधर्मिणी बनकर

कुछ और ना कह पाऊंगा, तेरे उपकार को शब्द ना दे पाउँगा
प्रेम हमारा दिव्या ! अमित रहे काल अनंत तक, यही चाहुंगा