Tuesday, November 30, 2010

जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा ------- अमित शर्मा


रसाई माँगता हूँ नज़रों की तुझसे खुदा
जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा  


नाद-ऐ-अनलहक की गूंज में सरसार रहूँ
एक तू ही  एक ही तू  बार बार हरबार कहूँ 

खालिक हो तुम कायनात के मालिक तुम हो
क्या है रीता तुमसे जो बता इन खाफकानो को 


गर कहूँ के तू  बस वहाँ और ना कहीं यहाँ
तेरी ही बुलंदी पे तोहमत होगा मेरा कहा


सदाकत का जाम पियूँ साकी तुम रहना
सदाअत में बन्दों की तेरे जिंदगानी रखना 


गाफिल ना होऊं फ़र्ज़ ओ ईमान से रहनुमाई रखना
भूल जाऊ मैं तुझको मगर तुम याद अमित रखना


***************************************************************************

रसाई -----------    पहुंचने की क्रिया या भाव। पहुँच।
अलहदा -------     जुदा। पृथक्। अलग। भिन्न।
अनलहक -----     एक अरबी पद जो अहं ब्रह्मास्मि का वाचक है
सरसार --------    मग्न
खालिक --------   सृष्टि की रचना करनेवाला। ईश्वर। स्रष्टा।
 कायनात ------   सृष्टि
खाफकानो ------ पागल। 
सदाकत -------   सच्चाई। सत्यता।
सदाअत -------   भलाई  नेकी 
गाफिल ------    बेपरवाह, बेखबर, असावधान, उपेक्षक

43 comments:

  1. ज़र्रे ज़र्रे में दिखता है तू
    जो कहता हूँ सुनता है तू
    मै हँसता रहू इसलिए शायद
    मेरे दर्द सहता रहता है तू
    घबरा जाता एक छौने सा तो
    अपने में छुपा लेता है तू
    माँ के सरीखा गोद में लेकर
    मुझपर प्यार लुटाता है तू

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  2. बहुत खूब मिश्राजी !

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  3. वेद ओ क़ुरआँ का है बयां
    ज़र्रे ज़र्रे में जलवा है ख़ुदा का , मगर ख़ुद ख़ुदा नहीं
    हर शै से जुद है वो , फिर भी किसी शै से जुदा नहीं

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  4. @ हर शै से जुद है वो

    गर कहूँ के तू बस वहाँ और ना कहीं यहाँ
    तेरी ही बुलंदी पे तोहमत होगा मेरा कहा

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  5. गाफिल ना होऊं फ़र्ज़ ओ ईमान से रहनुमाई रखना
    भूल जाऊ मैं तुझको मगर तुम याद अमित रखना

    gajab yaar amit maan gaye

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  6. एक ठोस सच्चाई को वयां करती रचना

    एक शेर याद आ गया आप की रचना पढ कर

    "खुदा को भूल गये हैं लोग फ़िक्रे रोजी में
    ख्याल रिजक का है राजक का कुछ ख्याल नहीं"

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  7. जय हो!!

    सदाकत का जाम पियूँ साकी तुम रहना
    सदाअत में बन्दों की तेरे जिंदगानी रखना

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  8. "रसाई माँगता हूँ नज़रों की तुझसे खुदा
    जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा"
    उसकी नज़र के बिना ये नज़र कहाँ मिलाती है...

    "सदाकत का जाम पियूँ साकी तुम रहना
    सदाअत में बन्दों की तेरे जिंदगानी रखना

    गाफिल ना होऊं फ़र्ज़ ओ ईमान से रहनुमाई रखना
    भूल जाऊ मैं तुझको मगर तुम याद अमित रखना"


    आपकी प्रार्थना कुबूल हो...



    एक बार कहीं सुना था...

    "जब दूसरा मौजूद नहीं यहाँ तो
    समझ में आता नहीं तेरा पर्दा करना...."

    कुंवर जी,

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  9. नाद-ऐ-अनलहक की गूंज में सरसार रहूँ
    तू ही एक एक तू ही बार बार हरबार कहूँ

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  10. नाद-ऐ-अनलहक की गूंज में सरसार रहूँ
    तू ही एक एक तू ही बार बार हरबार कहूँ

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  11. वाह ! वाऽह ! वाऽऽऽऽऽह !
    क्या सूफ़ियाना क़लाम पेश किया है अमित जी !
    इश्क़-ए-हक़ीक़ी की बहुत ख़ूबसूरत रचना के लिए , जितनी बधाई दूं , कम है ।
    ऐसी रचनाओं पर बात नहीं , चिंतन-मनन और अनुसरण किया जाना चाहिए !
    पूरी रचना शानदार है !

    … और हां , उर्दू का आपका ज्ञान तो क़यामत ढा रहा है !

    बहुत बहुत शुभकामनाएं
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  12. बहुत खूब ! इतनी अच्छी उर्दू कहाँ सीखे अमित , हो सके तो अपनी शिक्षा और गुरु प्रभाव के बारे में बताएं ! हर बार तुमसे प्रभावित होता हूँ
    शुभकामनायें

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  13. परभू या पवन पावन पसरे यों ही मो घर सदा
    अनवर मो हिय अन्दर सु-ज्ञान दीप जले सदा

    मन हरण राजिंदर हो जग के संजीव सदा
    सती के ईश ज्यो त्यों अमित मन बसों सदा
    *************************************************

    हे मेरे प्रभु ! आपसे मेरी विनती है की यह आपकी निर्मल भक्ति रूपी बयार सदा मेरे घर में बहती रहे, यह आपकी भक्ति-ज्ञान का दीप हमेशा मेरे ह्रदय में शोभायमान(अनवर) रहे . प्रभुजी आप मन का हरण करने वाले हो, राजो के भी राजा हो, इस मृत संसार के संजीवन हो, प्रभु जी जैसे सती नारी का ईश्वर एक उसका पति ही होता है, पर-पुरुष की तरफ वह झांकती भी नहीं, उसी तरह मेरे मन में आप की छवि अमिट रूप से बस जाये .

    इस कवित्त में पवनजी, अनवर जमालजी, मोहिन्दरजी, सुग्यजी, कुंवरजी (हरदीप), राजेन्द्रजी,संजीवजी, और सतीशजी का नामोल्लेख है . इसलिए इनका आभारी हूँ की इनका नाम हरिनाम लेने में मेरा सहायक हुआ.

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  14. निश्चय ही यहाँ अल्लाह मियाँ की बात हो रही है

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  15. आशुकवि अमित जी,

    कमाल कर दिया, प्रभु के आभारी और प्रभुअंश को दिया आभार।
    अमित प्रार्थना!!

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  16. रसाई माँगता हूँ नज़रों की तुझसे खुदा
    जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा

    बहुत ख़ूब...

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  17. अमित जी प्रयास चलता रहे कुछ उर्दू ज्ञान अपना भी बढ ही जायेगा.

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  18. वैरी गुड है जी। लगे रहो....अमित भाई।

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  19. ये तो आपने वह बात कह दी कि मस्जिद में बैठकर पी लेने दे या उस जगह का नाम बता दे, जहां खुदा नहीं है.. गजब..

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  20. बहुत भावुक हो यार ...इतना कि दुखी कर देते हो ! कम से मैं अपने आपको इस पावन प्यार के योग्य नहीं समझता ! लगता है कर्ज़दार बना के ही छोड़ोगे !
    खैर
    सस्नेह आशीर्वाद अमित

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  21. गाफिल ना होऊं फ़र्ज़ ओ ईमान से रहनुमाई रखना ...

    आमीन !

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  22. रहता है जिसके दिल में प्यार सदा
    वह करता है जग पर उपकार सदा


    हैवाँ भी करते हैं अपनों से प्यार
    इंसाँ ही गिराता है भेद की दीवार सदा

    मख़्लूक़ में सिफ़ाते ख़ालिक़ का परतौ
    इश्क़े मजाज़ी से वा है हक़ीक़ी द्वार सदा

    विराट में अर्श है जो, सूक्ष्म में क़ल्ब वही
    यहीं होता है रब का दीदार सदा

    किरदार आला, ज़ुबाँ शीरीं है अमित तेरी
    ऐसे बंदों का होता जग में उद्धार सदा
    ............
    मख़्लूक़ - सृष्टि , ख़ालिक़ - रचयिता , इश्क़े - मजाज़ी लाक्षणिक प्रेम जो किसी लौकिक वस्तु से किया जाए , हक़ीक़ी - सच्चा , हैवान पशु , शीरीं - मीठा

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  23. @ राजेन्द्रजी, सतीशजी सब कुछ अनायास ही है, मन में कुछ आता है तो पहले लिख लेता हूँ फिर http://pustak.org/bs/home.php?view=dict पे जाकर उनके समानार्थी खोजता हूँ कभी कभी खोजता कुछ और हूँ, लेकिन फिर पता नहीं कुछ अलग ही शब्द मिलते जाते है और तुकबंदी जोड़ता जाता हूँ . जो कुछ भी हो पर काव्य तो क्या कहेंगे इसको बस कुछ भाव हैं जिन्हें आप लोग स्नेहवश सराह रहे हैं .

    आभारी हूँ आप सभी स्नेहीजनों का !

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  24. aisi bahe bayar prem ras ke piche-piche
    sabd mere bhage bhaw ras ke piche-piche.

    sadar

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  25. Very nice.

    If one keeps coming on your blog, definitely one's knowledge about language and creative writing will improve dramatically. Wish you all the best.

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  26. लफ़्ज़ों के तअक्क़ुब(शब्द-संधान)और मन को सच्चाई से कविता में उड़ेलने का अत्यंत श्लाघनीय प्रयास|बधाई एवं शुभकामनायें|
    " वो ख़ुश्बू तुझ में है, तू जिसकी ख़ातिर|
    'अरुन', आहू सा वन-वन डोलता है||''
    - अरुण मिश्र.

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  27. अमित भाईसाहब,
    सबसे पहले तो शब्दार्थ के लिए आभार क्योंकि इस तरह की रचनाओं में मुझे इसी मामले में डर लगता था, रचनाकार के दिए शब्दार्थ ही ओरिजिनल सुकून देते हैं |

    अगला धन्यवाद इस सुन्दर रचना [हमेशा की तरह ] के लिए

    तीसरा धन्यवाद सामूहिक रूप से सभी टिप्पणीकर्ताओं को

    अरे हाँ भाई साहब .... मेरी ये पोस्ट आपने पढी है ना ? :)

    "उर्दू शब्दकोश urdu dictionary"

    यहाँ पर

    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/11/urdu-dictionary.html

    विषयांतर :
    आप तो कमेन्ट और पोस्ट दोनों में क्वालिटी मेन्टेन रखते हैं ये मेरे [केवल क्वानटीटी मेन्टेन करने वाले ] बस की बात नहीं है :))

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  28. अमित जी

    एक के बाद एक कमाल करते जा रहे हैं आप !
    अब, इस कवित्त पर क्या कहूं , बोलती बंद हो रही है … :)
    सबका ख़ैर मक़्दम एक साथ , काव्य की ओट में …
    ओये कमाल है कमाल है कमाल !

    लीजिए आपके नाम …
    अमित ! तुम्हारी लेखनी छोड़े अमिट प्रभाव !
    करती है घायल कहीं, कहीं भर रही घाव !!

    शुभकामनाएं और शुभकामनाएं !
    … और शुभकामनाएं !!

    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  29. सॉरी अमित, मैं पहले य मानता था की यह सब कुछ तुम नहीं लिखते पर तुम्हारी यह तुरंत लिखी जाने वाली कविता जो तुमने सबका नाम लेकर लिखी अन्दर तक हिला दिया मुझे फिर तुम्हारी सारी पिछली कविताये पढ़ी मज़ा आ गया और ब्लोगों पर कुंवरजी अरुण मिश्रा का ब्लॉग इन पर तुम्हारे कविता शेर रूप में करे कमेंट्स देखकर जो की वहीँ के शब्दों को उठाकर जवाबी छंद बनाते हो कमाल की प्रतिभा है तुममे. अपने आप से शर्मिंदगी है की मैंने तुम्हारे लिए मन में गलत सोचा , आज तुम्हारे जैसे युवाओं की जरुरत है.

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  30. @बेनामी जी- सम्भवतः पहली बार मेरे मन में किसी बेनामी टिप्पणीकर्ता के लिए इतना सम्मान और प्यार आया है जितना कि आज आपकी टिप्पणी पढ़ कर मन में अपने आप आया है!जो भी हो आपने अपनी गलती सार्वजनिक रूप से मान कर माफ़ी मांगी है वह सच में सरहानीय है!

    असल में अमित भाई साहब का व्यक्तित्व ही उनकी लेखनी में झलकता है!मै उन से मिला तो नहीं अभी पर उनके चित्र में भी वही बात दिखती है जो उनमे होगी और लेखनी भी वही चीज़ दिखाती है!तुरन्त कविता घड़ने में वो अद्भुत क्षमता रखते है......

    बेनामी जी आपका स्वागत है जी...बस अब जब भी टिप्पणी करो तो खुल करना,आपको भी अच्छा लगेगा!

    कुंवर जी,

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  31. अनुजवत अमित जी,
    आपने निम्न बेहतरीन टिप्पणी तो लगाई मगर अफ़सोस ग़लत ब्लॉग पर लगाई,
    "भेड़ो की खाल में है हर तरफ यह भेड़िये,
    खुद शांति के नामवर आतंक मचा रहे हैं।

    सारा हादसा इन्ही दो लाइनों से समझ आ जाता है . बहुत बढ़िया मंथन"

    जी हाँ,सही समझा ये आप की बेहतरीन टिप्पणी है मगर ग़लत जगह लगा दी आपने.

    और हाँ, आप इतने अच्छे शेर भी कह लेते हैं ये तो मुझे आज पता चला.गद्य में आपका कोई जवाब नहीं ये तो मुझे पता था.आपकी मेल id होती तो विस्तार से बात हो सकती थी.मेरी id:kunwar.kusumesh@gmail.com है.bye amit ji.

    कुँवर कुसुमेश

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  32. .

    जब जर्रे-जर्रे में वही है तब क्या इसे इस तरह कहा जा सकता है कि
    जर्रा-ज़र्रा उसी से संचालित है. ज़र्रा-ज़र्रा वही है.
    क्या उसे विज्ञान के शब्दों में न्यूट्रोन, प्रोटोन, इलेक्ट्रोन नाम से समझ सकते हैं.

    इनकी गति का स्वर ही परमात्मा का स्वर है, इनका प्रभाव ही परमात्मा की इच्छा है,
    यह परमात्मा भेदभाव रहित है, प्रत्येक जीव के लिये बना है.

    क्या हम इस तरह के परमात्मा [शक्ति] के नाम पर या उसका नाम लेकर तरह-तरह के पंथों को चलाये जा रहे हैं
    या तरह-तरह के देवि-देवताओं को सृज रहे हैं, या बलि और कुर्बानी देने जैसे कार्य करते हैं क्या वह इनकी इच्छा करता है? या हम धर्म और मजहब के नाम पर भक्त जनों को बेवकूफ बनाते आ रहे हैं.

    .

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  33. .
    ग़ज़ल के शेअर मुझे बेहद पसंद आये.
    ग़ज़ल में निहित अर्थ तो निहायत ही खूबसूरत और झकझोर देने वाले हैं.

    .

    ReplyDelete
  34. zarre zarre me tu hai samaya,mai apni hasti me tujhko dhoondhta hoo.

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  35. अमित जी, आप मासूम के अमन के पैगाम पर शान्ती सन्देश देते है पर वह
    "भेड़ो की खाल में है हर तरफ यह भेड़िये,
    खुद शांति के नामवर आतंक मचा रहे हैं।

    और यह अनवर जमाल के ब्लाग पर क्या कह रहा है? देखिये

    Blogger एस.एम.मासूम said...

    किसने कहा की अनवर जमाल और अमित शर्मा का धर्म युद्ध हो रहा है? ऐसी बकवास ना करें और दिलों मैं नफरत ना फैलें. एक ज्ञानी और अज्ञानी का युद्ध वैसे भी नहीं हो सकता.

    November 26, 2010 11:53 PM
    Blogger DR. ANWER JAMAL said...

    लोग हमारी वार्ता को युद्ध की संज्ञा देते हैं ।
    @ जनाब मासूम साहब ! मेरा मानना यह है कि मैं एक अलग माहौल में पला बढ़ा हूँ और मेरे भाई अमित शर्मा जी मुझसे मुख़्तलिफ़ माहौल में। इसमें न तो मेरी कोई खूबी है और न ही अमित जी का कोई दोष । मेरे माहौल की छाप मेरे जहन पर है और अमित जी के जहन पर उनके माहौल की । वे अपने धर्म-दर्शन के प्रति गंभीर हैं , मुझे यह अच्छा लगता है । मैं रब का शुक्र अदा करता हूँ कि वे आस्तिक हैं । अगर वे नास्तिक और शराबी होते तो हम उनका क्या कर लेते ? उन्होंने खुद को बहुत सी ख़राबियों से बचाया आज के दौर में यह कम बात नहीं है ।
    उन्हें अज्ञानी कहना ज्यादती होगी । वह पैदाइश के ऐतबार से भी पंडित हैं और अपने अमल से भी ।
    हमारे कुछ विचार टकराते हैं तो कुछ मिलते भी हैं जैसे कि हम दोनों ही धर्मपसंद हैं । कार्बन कॉपी तो न मैं उनकी बन सकता हूँ और न ही वे मेरी बनेंगे ।
    हमारी धर्मवार्ता को धर्मयुद्ध नाम देने वाले वास्तव में मुग़ालते के शिकार हैं ।
    जहाँ आदमी होंगे वहाँ बातचीत जरूर होगी । लोग अपनी रुचि के अनुसार ही बात करते हैं ।
    अमित जी की और मेरी रुचि धर्म में है सो हम धार्मिक विषय पर बातें करते हैं , बस ।
    युद्ध वहाँ होते हैं जहाँ हवस और रंजिशें होती हैं , ये दोनों ही चीजें हम दोनों में ही नहीं हैं , शुक्र है मालिक का !

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  36. राजेंद्र भाई की पंक्तियों को आगे बढाते हुए ...

    "मृदु स्वरूप,टीका तिलक, सुंदर रूप सुजान
    राम रूप इस बाल को नज़र नहीं लग जाए
    संत रूप राक्षस फिरें ब्लॉग जगत में आज
    सीधे साधे अमित का, कैसे होय बचाव "

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  37. @ सतीशजी

    सूधन सन अति सूधो रहत हूँ, अग्याकारी बालक आप बडन को हूँ
    टेड़े मोर कहा बिगार लेंगे, खुद उपासी मैं एक टेढ़ी टांग वाले को हूँ

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  38. ये देखिये अरब समाज का असली चेहरा
    ये है कट्टरता की पोल
    http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/12/101208_saudia_parties_wikileaks.shtml

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  39. आप इस टिपण्णी को हटा सकते हैं..... ये सिर्फ नए लेख की सूचना देने के लिए है

    scientific-evidence-reincarnation

    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/12/scientific-evidence-reincarnation.html

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)