Sunday, November 21, 2010

क्या कहर बरपा है कोई समझाए तो सही मुझ पागल अमित शर्मा को


हद है !!!!!!!  या तो मैं बिलकुल मुर्ख या यूँ कह लीजिये की परम मुर्ख हूँ जो अपने मन की सीधी सी बात भी ढंग से नहीं कह पाता हूँ......... या कुछ समझदार व्यक्तियों ने अपनी समझदारी सिर्फ  बात को कहीं दूसरी तरफ ले जा कर पटकने के लिए ही बुक कर रखी है..........
इस ब्लॉग की एक पोस्ट वेदों में मांसाहार की बात पर आई ................ भाई लोग आ पधारे की नहीं गधे तू कल का छोरा क्या जाने वेद-फेद ..................देख माता जी के बलि चढ़ती है तू क्यों टांड रहा है.................... अरे भाई बात यहाँ सिर्फ इतनी हो रही थी की हर चीज का अपना एक निचित विधान होता है उसी के हिसाब से सारा काम होता है अब वेद का भी अपना एक निश्चित विधान है उसी पे चलकर उसके अर्थ को जाना जा सकता है , पर नहीं वेद के हिसाब से नहीं वेवेकानंदजी की जीवनी जो पता नहीं किस ने लिखी होगी उसमें से उद्हरण देने लगे हमारे परम धार्मिक सात्विक बंधु .

बस हो गया ना मेरी पोस्ट का तो सत्यानाश!!!!!!!!!!! अरे भाई जिस प्रकार वेद में से ही वेद के ऊपर लगे आक्षेपों का निराकरण था, तो उसी तरह वेद में से ही सिद्ध करते की वेद में मांसाहार है ...बस फिर कौन किसको रोक सकता है हो गयी शुरू धींगा-मस्ती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 

अगली पोस्ट थी की सिर्फ अपने जीभ के स्वाद के लिए उपरवाले के नाम ले ले कर क्यों किसी को बलि का बकरा बना कर कुर्बान कर दिया जाये ?????????? 

अरे भाई खाना ही है तो खाओ उपरले की आड़ क्यों ?????????
पर नहीं यहाँ भी पोस्ट से उल्टी बात किसी की ईद खराब हो गयी अपने धर्म का मजाक लगा क्यों लगा भाई ?? समझ में नहीं आया कम से कम मुझे तो ........... परम समझदार जी प्रकटे पोस्ट से कोई लेना देना नहीं और हवन को घुसेड दिया बीच में "लाहोल-विला-कुवत" यार कभी तो समझदारी का परिचय दो, किसी पोस्ट पर पोस्ट से सम्बंधित कमेन्ट करो .................. मेरे दो मित्र शाकाहार-मांसाहार पर चर्चा कर रहे थी अपनी बात रख रहे थे उसमें भी टांग अडाई से बाज नहीं आये पर क्या करें समझदार ज्यादा ठहरे ना. 

................... फिर दो वीडियो लगा दिए की देखो ऐसे निर्ममता से बलि / कुर्बानी होती है जिसको सिर्फ अपनी जीभ के चटखारे के लिए उपरवाले की आड़ में किया जाता है, और अगर ऊपर वाले की भी इसमें सहमति है तो धिक्कार है मेरी तरफ से तो !!!!!!!!!    बस क्या था शुरुवात हो गयी धडाधड पोस्टों की कोई नाम लेकर कोई संकेत मात्र कर कर समर्थन-विरोध में लगें है पुराणों से रामायण से निकाल निकाल कर ला रहे है .  

अब कोई पूछे तो क्या मतलब इस बे मतलब की बात का. जब की मुद्दा तो यह था की मांसाहार में उपरवाले की घाल-घुसेड क्यों, आप को खाना  है तो खाओ. 
 इसमें  ऐसा  क्या कहर बरपा है कोई समझाए तो सही मुझ पागल अमित शर्मा को, क्योंकि मुझे कुछ समझ में नहीं आया की वेदों में मांसाहार का खंडन करना कैसे ब्लोगिंग का माहोल खराब करना हो गया,,,,,,,,,,,,,, मांसाहार के लिए अल्लाहजी/माताजी का नाम की आड़ लेने का विरोध करना कैसे ब्लॉगजगत की हवा दूषित करना हो गया ???????????   

79 comments:

  1. भाई अमित जी
    हताश न होइये
    आपकी कोई गलती नहीं है


    कुछ लोगों की मंशा केवल लोगों को चिकोटी काटने की ही होती है
    वो दूसरे को परेशान देखना चाहते हैं बस
    हमने लेख लिखा सोम पर और बहाँ भी यही सब शुरू हो गया ।

    पर हमने उसपर कोई टिप्पणी नहीं दी

    अपना काम करते चलें
    फालतू लोगों की फालतू बातों को एकदम से फालतू समझ कर
    छोड दीजिये

    जय श्री राम

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  2. bhai amit ji jo vichar hai aap ke apne hai logo ko kiyu aappati hoti hai .
    yeh samajh nahi aaya .
    ravan ki sena main bhee ------tha.

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  3. अमित जी एक मुद्दा पुराना है, वो है शाकाहारी होना या मांसाहारी होना. यह हर इंसान का हक है को क्या खाए. यदि कोई जीव हत्या के खिलाफ है तो किसी को एतराज़ होना ही नहीं चाहिए. लेकिन यह बात मैं नहीं समझ सका की यदी जीव हत्या के खिलाफ आप नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है की, कोई बीवी की ख़ुशी के लिए काटे, पड़ोसी को खिलाने को काटे या अपने भगवन अल्लाह की ख़ुशी बता के काटे?
    जीव हत्या यदी ग़लत है तो चाहे वो स्वाद के लिए की जाए या भगवान् के नाम पे ग़लत है. और यदी सही हैं , तो कोई किसी की ख़ुशी के लिए करे क्या फर्क पड़ता है.
    ऐसा मेरा मानना है. बाकी हर इंसान को हक है, जो चाहे नजरिया बना ले.

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  4. सिद्ध हो गई ना फिर वही बात की मुझे अता ही नहि है अपनी बात कहना, किसने कहा की मैं जीव हिंसा के पक्ष में हूँ ??????????

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  5. मासूम जी दो टूक बात तो यह है की जीव हिंसा से परेशानी तो बहुत है पर मेरी परेशानी से क्या होना.
    लेकिन अगर आप किसी संस्था के सदस्य है तो उसका दुरपयोग कैसे होने देंगे, उसी तरह सवाल यह है की जब मैं भी उपरवाले की धर्म नामक संस्था का सदस्य हूँ, अब चाहे अल्लाह का नाम लेकर या भगवान् का नाम लेकर नाम तो उपरवाले का ही लेकर काटे जा रहे हैं ना,,,,,,,, फिर मैं कैसे अपने धर्म का नाम लेकर जीभ के स्वाद के लिए ह्त्या करने के खिलाफ ना बोलूं ???? इसमें किसी को(या आप को ) क्या तकलीफ.

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  6. amit ji bhut khub sbhi dhrmon men ped podhon or sbziyon men jiv btaaye gye hen dhi or dudh men ji bektiriyaa btaaye gye hen sbzi khana fsl khaana jiv htya hi he kyonki ped podhon men jivn hota he yeh sbhi jaante hen koi janvr ko marta he koi paadp jiv ko marta he kisi men koi frq nhi he ramji bhi shaayd hrn ko marne gye the lekin yeh ishvr ka vidhi vidhaa he iskaa men or aap kya kr skte hen . koi nhin khata to nhin khaata jiv htya nhin krta to nhin krta lekin fir bhi aek vykti apne jivn me nprtidin naa jaane kitne hzar jivon ki htya krta he koi bhi pap se dhula nhin he . akhtar khan akela kot rajsthan

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  7. मुसलमानों में अपवाद स्वरूप ही कोई व्यक्ति आप से सहमत होगा इसलिये आप उनकी चिन्ता बिल्कुल न करें. चिन्ता करें तो उन हिन्दुओं की जो पूरी तरह से व्यापारी बन चुके हैं... ये तो धर्म प्रचारक हैं, लेकिन हमारे हिन्दुओं की आंख अभी भी बन्द है...

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  8. शांति, शांति, शांति।
    मैंने सोचा औरों के आने से पहले मैं ही कह देता हूँ:)

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  9. ॐ शांति!
    आप बेभावों को कुछ ज़्यादा ही भाव दे रहे हैं। चरैवेति!

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  10. अमित जी जीव हत्या के यदि आप खिलाफ हैं तो आप को अधिकार है, इस विषय पे बात करने का. जहाँ तक धर्म का सवाल है तो आप जिसके भी धर्म के खिलाफ बात करेंगे उसे बुरा अवश्य  लगेगा. यह बात हम सब जानते हैं. ऐसा करने की आवश्यकता इस मुद्दे पे है भी नहीं.
    सीधे सीधे बात जीव हत्या पे करने चाहिए  फिर उस दाएरे मैं कोई धर्म आये या इंसान. आप पे कोई एतराज़ नहीं कर सकता. मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी की नफरत क्यों फैलती  है? देख लें शायद मेरी बात समझ जाएं.
    यह कोशिश इसलिए कर रहा हूँ, की दो इंसानों का आपस का प्रेम भाव बना रहे. यदी आप  को लगता है आप के इस तरीके से दो इंसानों मैं प्रेम बढ़ता है. तो आप अपने तरीके पे आगे चलते रहें. किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?
    मैं जब भी टिप्पणी करता हूँ तो यह देख के करता हूँ "हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूँगा" --- वाल्तेयर"

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  11. प्रिय अमित जी
    सस्नेहाभिवादन !

    मानवता के नाते आपने वह किया जिससे मनुष्यत्व सार्थक हो ।
    … और कहूंगा -

    दूसरों के अश्क… अपनी आंख से बहने भी दे !
    अपने दिल को… दूसरों के दर्द तू सहने भी दे !
    दुनिया दीवाना कहे… तुझको , तू मत परवाह कर ;
    रास्ते अपने तू चल… कहते , उन्हें कहने भी दे !!


    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  12. ..

    अमित जी,
    आपकी पोस्ट की भाषा का तापमान 40 और 80 के बीच है.
    अच्छा है, आपकी सहिष्णुता का परिचय भी मिल रहा है.
    आपकी प्रति-टिप्पणियों में स्वर का तापमान संयत [50] है.
    आपने मांसाहार और शाकाहार पर चर्चा चलाकर
    अभक्ष्य को भक्ष्य बताने वालों की पोल खोल दी. साधुवाद.

    ..

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  13. .

    वैसे तो जड़मति हर युग में रहेंगे, फिर भी..
    आदमी की ज़ायके से शाकाहार और माँसाहार ज़रूरत से अधिक जुड़ा हुआ है,
    सभ्य होने तक उसे आखेट का चस्का पहले ही लग चुका था,
    दूसरे, खानपान की रीतियाँ स्थान विशेष के सँसाधनों पर भी निर्भर है,
    भला किसी साइबेरियन या एस्किमो से पूर्ण शाकाहारी हो जाने की अपेक्षा करना मूर्खता नहीं तो क्या है ?

    हर जगह मानव के अँतर में निहित पशुत्व की बलि माँगी गयी है, पर वह इसे बचा कर बल्कि अपने पशुत्व को और भी जागृत कर किसी निरीह पशु की बलि देकर सँतुष्ट हो लेता है ।

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  14. डा. अमर कुमार जी का कमेंट इस विषय पर मेरी नजर में अब तक का सबसे अर्थपूर्ण कमेंट है। डा. साहब से अनुरोध, इसे ठकुरसुहाती न समझें। और अगर समझें तो फ़िर इतना भी जान लें कि अब हम टटपूंजियाँ ब्लॉगर नहीं हैं, हमने भी मॉडरेशन लगा लिया है:)

    अय्र अमित जी, आप ने भी जगह-जगह वही कॉपी-पेस्ट शुरू कर दिया है। इरादे क्या हैं महाराज?

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  15. Wah! Lage rahiye sabhi log, waisi hi bahar kafi thand hai.

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  16. http://my2010ideas.blogspot.com/2010/11/veg-vs-non-veg.html

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  17. श्री अमित जी,

    हताश न हों, हिंसा के प्रति सम्वेदनशील लोग ब्लोग-जगत में कम ही सही, फ़िर भी काफ़ी संख्या में है। अहिंसा पर दो टूक कहना हर लिहाज से सही ही है। जीव-दया और शाकाहार किसी भी धर्म की बपौती नहिं है।
    और यदि कोई विचारधारा इसे विरोध मानती है तो निश्चित वह विचारधारा मनुष्य को आदि-अमानुषिकता की और ले जाना चाहती है। जो आप जैसे कम लोगों के भी चलते सम्भव न हो पायेगा।
    लोग डरते है, अगर हिंसा-कुरितियों का विरोध किया तो साम्प्रदायिकता में खप जायेंगे और ब्लोगीय प्रभामंडल खत्म हो जायेगा। क्या फायदा ऐसे आभासी प्रभामंडल का जो हिंसा के प्रति सम्वेदना-शून्य बनाए रखे।

    विभिन्न माध्यमो से 365 दिन अमानवीयता का प्रचार होता है, अगर एक दिन अहिंसा उठ खडी हुई तो इतनी आफ़त आ गई?

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  18. साइंटिस्ट ने स्टडी के दौरान ऐसे कई साक्ष्य पाए हैं, जिनके माध्यम से हमें आदिमानव से जुड़ी कई चौंकाने वाली बातें पता चलती हैं। इन साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि आज से 30 हजार साल पहले गुफाओं में रहने वाला इंसान भी भोजन तैयार करने के लिए आटा पीसता था और सब्जियां तैयार करता था।

    पकाकर खाना खाता था आदिमानव
    http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6775739.cms

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  19. ..

    डॉ. अमर जी
    आपने कहा :
    भला किसी साइबेरियन या एस्किमो से पूर्ण शाकाहारी हो जाने की अपेक्षा करना मूर्खता नहीं तो क्या है ?

    — पहली बात सभ्य जातियों के खानपान और असभ्य जातियों के खान-पान की परस्पर तुलना करना संगत नहीं कहा जाएगा.

    ..

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  20. ..

    — दूसरी बात साइबेरियन और एस्किमो जनजातियाँ अनुकूल परिवेश के विपरीत रहने वाली हैं. अंग्रेजों के समय कालापानी की सजा पा रहे लोगों ने लक्षद्वीप और अंडमान द्वीपों को रहने योग्य बना लिया तो इससे अनुकूल परिवेश में रह रही जातियों की खानपान सम्बन्धी आचार-संहिताएँ बदल जानी चाहिए क्या? उसी तरह आर्य युग में सामाजिक और नैतिक कायदों को न मानने वाली जातियों को यदि देश बहिष्कृत कर दिया जाये और आज के इतिहासकारों द्वारा उनकी विकसित सभ्यताओं को ही क्रमित विकास का आधार ठहराया जाये तो क्या न्यायसंगत है?

    ..

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  21. शाकाहारी था प्रागैतिहासिक मानव

    नयी खोज से पता चला है कि रोटी का प्रचलन 30 हजार वर्ष पहले भी था। इस अनुसंधान ने इस धारणा को चुनौती दी है कि प्रागैतिहासिक काल का मानव मुख्य भोजन के रूप में मांस खाता था। नए साक्ष्य बताते हैं कि भारत जैसे देशों में मुख्य भोजन रोटी का उपयोग प्राचीन काल में भी होता था। ............

    http://www.peoplessamachar.co.in/index.php?/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5.html

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  22. ..

    — तीसरी बात किसी मनुष्य द्वारा पेड़ पर ही रहने का निर्णय कर
    लिया जाये और उसके संकल्पों जैसे पत्तियाँ और पेड़ की छाल खाने को ही उसकी विवशता माना जाये तो समझ में आता है. लेकिन इससे क्या मनुष्य मात्र के लिये भक्ष्य सम्बन्धी परिभाषायें बदल देनी चाहियें?

    ..

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  23. ..

    — चौथी बात, जबरन कोशिशों से रह रहे अननुकूल प्रदेशों में भी शाकाहार के व्यापक प्रबंध किये जा सकते हैं. ..... विज्ञान के जनसंचार माध्यमों से खुलकर प्रयोग जब शिकागो से मांस के निर्यात में हो सकता है तो क्या अन्न आदि का नहीं हो सकता?
    — आज समुद्र की वनस्पतियाँ बड़े पैमाने पर खरीदी और खायी जाती हैं. उनकी खेती भी की जा सकती है.
    — अन्य उपाय भी हैं. यदि आप शाकाहार के खुलकर समर्थन में आ खड़े हुए तो मैं आपको सुझाऊँगा. और कहूँगा कि मांस के भक्षण को उचित ठहराना किसी भी प्रकार न्यायसंगत नहीं है.

    ..

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  24. शाकाहार समर्थक सभी मित्रों ----------------
    करो इतना निनाद कि, नींव ध्वस्त हो पाखण्डवाद की
    जय हो जब शाकाहार की, पोल खुले जीभ के स्वाद की

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  25. ..

    प्रिय गौरव जी,
    अब यदि पाश्चात्य सोच के इतिहासकारों ने हमारी सभ्यता का क्रमिक विकास धीरे-धीरे बता दिया तो क्या वह सभी के लिये मानने योग्य हो जाता है?
    भक्ष्य और अभ्क्स्य संबंधी बहस तो आपसे फिर होती रहेगी लेकिन मुझे कुछ विषयांतर बाते पहले करनी हैं ?

    — आपने कभी विचार किया कि भाषा का उच्चारण और लेखन की दृष्टि से विकास आरोही क्रम में है या अवरोही क्रम में है?
    — आपने कभी विचार किया है कि भौतिक उन्नति पहले अधिक थी या अब अधिक है? क्या आज की भौतिक उन्नति आने वाले हज़ार वर्ष बाद भी सुरक्षित रहेगी?
    — आपने कभी विचार किया है कि पर्यावरण, शारीरिक, मानसिक, वैचारिक, नैतिक, अध्यात्मिक [विज्ञानं और दर्शन] की दृष्टि से कौन सा समय उन्नत था?
    — आपने कभी विचार किया है कि आज का साहित्य पहले की बनिस्पत कम उन्नत नहीं है?
    — यह भी सोचें कि हमारा न जाने कितनी बार विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा [यथा नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय] साहित्य और इतिहास को नष्ट किया जा चुका है. सात दिन तक तो नालंदा का विशाल पुस्तकालय ही जलता रहा था. सोचिये. क्या था उस पुस्तकालय में ......... क्या हमारा उज्ज्वल अतीत तो नहीं ? ..........
    ..

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  26. .

    अब यदि आज के जनसंचार युग में भी बर्फीले और मरु परदेशों में रह रहे लोग मांसाहार करते रहेंगे तो मज़ाक नहीं है उन संचार के उपकरणों का.

    .

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  27. .


    और सोचिये कि भारत जैसे देश में अनाज बड़ी मात्रा में जलाया जा सकता है तो क्या अनाज की वास्तव में कमी का बहाना बनाना उचित होगा?

    ..

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  28. ..

    एक सच्ची घटना :
    एक स्वामी जी ने गुपचुप तरीके से पेड़ों के झुरमुट के बीच दो वर्ष तक बिल बनाकर उन्नाव में केवल सूखी अदरक {सौंठ} खायी तो क्या उसे मनुष्य मात्र के लिये खान-पान सम्बन्धी आचार-संहिता बना देना चाहिए.
    यह केवल वैयक्तिगत संकल्प है और कुछ नहीं. अब यदि वह अपने अनुयायियों को भी बाध्य करें कि आज़ से यही खाना है. और कुछ समय बाद उसकी पीढी में यह परम्परा भी पड़ जाये तो उसके व्यापक परिणाम होंगे.
    — उनकी संतानों के लिये साहित्य और परिवेश अलग बनाने की आवश्यकता होगी.
    — शैक्षिक पाठ्यक्रम भी काफी कुछ अलग बनाना होगा.
    — या उनके जरूरतों और मानसिकता को ध्यान में रखकर काफी कुछ एक सामान्य समाज में फेर-बदल करने होंगे. .............
    ऎसी क्रियायें हठ योग के अंतर्गत आती हैं. ...............
    एक सामान्य सुसंस्कृत जीवन के लिये ये जबरदस्तियाँ सरासर अनुचित हैं.

    ..

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  29. मांसाहार करने का कारण क्या है ????????
    यदि प्राकृतिक भोजन है जिस के बिना काम ही नही चल सकता तो यह प्रकृति के नियम के अंतर्गत है . जैसे स्कीमो का उद्दहरण डा.अमर जी ने दिया .
    इसी प्रकार तिब्बत के लोग बौद्ध है पर पहाड़ी भेड़ के बिना उन का काम नही चल सकता इस लिए वो उस को खाते है . भेड़ को वे खुद नही मारते बल्कि दूसरे को बुलाते है. भेड़ को मारने का तरीका वे प्राकृतिक अपनाते है .एक भी खून की बूंद व्यर्थ नही जाती .
    यद्यपि वे अहिंसावादी है परन्तु ये उन की मज़बूरी थी .
    दूसरा कारण है जीभ का स्वाद
    मानव सदा ही अपनी कमजोरियों को छिपता आया है और अपनी कमजोरी को छिपा कर धर्म का चोला पहना दिया .
    जहा पर भरपूर मात्र में शाकाहार है वहा पर भी मांसाहार किया जाता है . धर्म का चोला पहनना तो महाधूर्तता है .

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  30. दारुल उलूम देवबंद ने एक (अमर उजाला काम्पैक्ट २१नवम्बर पृष्ठ 20) फतवा जारी करके रक्तदान और अंगदान को हराम घोषित किया है. हालांकि उसमे यह भी जोड़ा कि करीबी रिश्तेदारों को खून दिया जा सकता है.आगे यह भी है कि कोई इंसान यदि अपनी उंगली काटे या खुद को गोली मारे तो वह गुनाह गार है क्योकि शरीर अल्लाह का दिया हुआ है और इंसान इसका मालिक नहीं है. दारुल उलूम देवबंद के दारुल इफ्ता के मुफ्ती जैनुल इस्लाम ने कहा कि जो चीज़ इंसान कि नहीं है उसे किसी दूसरे को देने का हक नहीं है.
    अब मेरा प्रश्न है....
    १.धरती पर कोई भी चीज़ इंसान की नहीं है फिर उनका इस्तेमाल करके सारे इंसान अल्लाह के विरुद्ध कार्य करते है ?
    २. खुद की उंगली काटे तो हरामी, और जानवर जबह करे तो कुर्बानी ये दोगलापन क्यों? क्या जानवर इंसान ने बनाये है?
    ३. करीबी रिश्तेदार को खून दिया जा सकता है. जब इस्लाम के अनुसार सारे मुसलमान आपस में भाईचारे से बंधे है तो करीबी कौन या दूर का कौन? अपना मर रहा है खून चढ़ा दो गैर मरे तो मरने दो. वाह....... क्या भाव है?
    ४.दोगलेपन की हदे तोड़ता हुआ फतवा जड़ता और अज्ञानता के गहरे अँधेरे में अपने लोगो को धकेले के अतिरिक्त और कितना उपयोगी होगा ?

    http://pachhuapawan.blogspot.com/2010/11/blog-post_21.html

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  31. ..

    डॉ. पवन मिश्रा जी,
    वाह! क्या कहने!!
    आपकी मेधा के कायल हुए!

    ..

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  32. आदरणीय प्रतुल जी,
    नालंदा विश्वविद्यालय को छोडिये [वो तो सात ही दिन जला था ], आज की बात करते हैं .... मैं अच्छी तरह जानता हूँ ये भी की हमारा इतिहास ही संग्रहालयों में मौजूद होने के बावजूद ठीक से दिखाया नहीं जाता [ये तो लगभग रोज जल ही रहा है, होते हुए भी ना होना , जलना ही है ना ! ] उज्जवल अतीत तो हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हमारा [भारतीयों का ] कहाँ है ?? , आज के पाठ्यक्रम में तो वो सच्ची घटनाएं भी नहीं है को मानव मन का ठीक से विकास करे| हैं भी तो उनको सिखाने पर जोर नहीं दिया जाता | आप हर बार इतने आसान सवाल पूछते हैं मैं हमेशा हैरान रह जाता हूँ |
    इस बात से आपको सारे उत्तर मिल जायेंगे
    "मैं श्री कृष्ण द्वारा महाभारत के युद्द में अर्जुन को दिए उपदेश को अर्जुन का [और उसके के रूप में सम्पूर्ण मानवता का] अब तक का सबसे बेहतरीन साइकोलोजी सेशन [cognitive behaviour therapy ] मानता हूँ, जैसा ना कभी हुआ और ना अब कभी होगा

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  33. आज की युवा पीढी [कथित] "वैज्ञानिक सोच" का [टूटा फूटा] झुनझुना पकड़ा दिया गया है | वो शायद उससे निकली आवाज को ही सही सुर मानते हैं | और बस बजाते रहते हैं :))

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  34. अपनी बात सुनाने के लिए मुझे भी उस झुनझुने की आवाज का सहारा लेना पड़ता है ......

    ...... धीरे धीरे सब समझ जायेंगे

    Science without religion is lame, religion without science is blind.

    Albert Einstein, "Science, Philosophy and Religion: a Symposium", 1941
    US (German-born) physicist (1879 - 1955)

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  35. जीभ के लिए जीव हत्या पाप , अन्य वस्तु के लिए पुण्य है ?
    प्रयोग के नाम पर जीव हत्या पुण्य?
    ये आखिर जीव किस प्राणी का नाम है ?
    अगर जीव उसे कहते हैं जिसमे जान हो प्राण हो , तो जीव हत्या पर आंसू बहाना अज्ञानता का कारण है,
    ऐसे तो हम दिन रात जीव हत्या जाने अनजाने में कर रहे हैं,और करा रहे हैं ,
    क्योंकि हम ऐसे कई पशु व पक्षी पालते हैं जो अपने भोजन हेतु तथा जो उनको पसंद है के लिए कई प्रकार के जीव खाते हैं
    मार्ग में चलते हुए , भोजन करते हुए सांस लेते हुए छोड़ते हुए , हम न जाने कितने जीवों की हत्या कर देते हैं ,
    ये पुण्य का काम है ?
    या केवल बड़े शरीर वाले जीव के दया है अन्य छोटे एवं सुष्म जीवों के लिए कोई दया नहीं, कोई मानवता नहीं ?
    ऐसे तो हम दूध न पियें , पानी न पियें , अंडे भी न खाएं
    ये प्रश्न इतना बड़ा है की एक पुस्तक क्या कई पुस्तक बन जाये इसपर

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  36. सबसे पहले तो मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि ये लेख किसी धर्म विशेष के लोगों के संदर्भ में न होकर हर उस व्यक्ति के संदर्भ में हैं जो मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या करते हैं और उसे सही ठहराने के लिए तरह-२ कुतर्कों का इस्तेमाल तर्कों के रूप में करते हैं. वो लोग किसी भी धर्म या समुदाय के हो सकते हैं.


    दूसरी बात, मेरी नज़र में ऐसा करना एक बुराई है और इसके अलावा भी जो दूसरी बुराईयाँ हैं उन बुराईयों के प्रति भी मेरी कोई सहानुभूति नहीं है. इसलिए इस लेख से ये मतलब कतई न निकाला जाए कि दूसरी बुराई के ख़िलाफ़ नहीं लिखा केवल इसके ख़िलाफ़ क्यों लिखा? मेरी नज़र में बुराई, बुराई होती है. और हर बुराई के ख़िलाफ़ सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है.

    पिछले दिनों मांस भक्षण के कारणों से जानवरों की हत्या या धार्मिक कारणों से की जाने वाली वली/ कुर्बानी के संदर्भ में लिखे कुछ ब्लोग्स के लेखों पर आई टिप्पड़ियों में कुछ ब्लोगर्स ने बड़े अजीब तर्क दे-देकर उसे सही ठहराने की कोशिश की है. शाकाहारियों पर तो और भी ज़्यादा हत्या करने का आरोप लगाया है. उनके मुख्य तर्क कुछ इस तरह से हैं .







    1. क्या मृत शरीर के साथ करोड़ों जीवाणुओं का जला देना हत्या नहीं है?
    २. पेड़-पौधों की हत्या क्यों करते हों?
    ३. अनजाने में हमें हानि पहुचाने वाले लाखों कीड़े-मकोड़ों की हत्या की बात क्यों नहीं करते?
    4. मेरे धर्म के लोगों के बारे में ही क्यों, दूसरे धर्म के लोगों के बारे में क्यों नहीं?
    ५. वैज्ञानिक युग में भी कुर्बानी या वली का विरोध क्यों करते हैं?
    ६. दूसरी बुराइयों का ज़िक्र क्यों नहीं करते?
    ७. वैज्ञानिक जानवरों की हत्या करते हैं उसके बारे में क्यों नहीं लिखते हो?


    पहली नज़र में ये सभी तर्क बड़े दमदार दिखाई देते हैं.
    लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आईये देखते हैं. ज्ञानवान और सर्वगुणसंपन ब्लोगर्स के इन तर्कों में कितना दम हैं !

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  37. पहला तर्क .........मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या करने वालों का कहना है कि मरे हुए शरीर के साथ लाखों-करोड़ों जीवाणुओं को जिंदा जला दिया जाता इसका दर्द तुम्हें क्यों नहीं होता? इसे तर्क कहें या कुतर्क इसका फैसला आप पर है.


    सबसे पहला सवाल तो ये उठता है कि क्या जीवाणु और विषाणु को उसी श्रेणी में रखा जा सकता है जिस श्रेणी में इंसान या कुर्बान कर या वली चढ़ा कर खाए जाने वाले जानवर को रखा जाता? क्या इनमें कोई अंतर नहीं हैं ? आपको इसके लिए बहुत ज़्यादा दिमाग़ लगाने की ज़रुरत नहीं क्योंकि सच्चाई आप जानते हैं. हक़ीक़त में तो जीवाणुओं और विषाणुओं की तुलना उन जानवरों से की ही नहीं जा सकती जिनका ज़िक्र हम कर रहे है. अंतर इतना अधिक है कि उनके बारे में चर्चा करना ही अपने ब्लॉग पाठकों का मूल्यवान समय ख़राब करना है. एक सुई की नोक पर करोड़ों-अरबों जीवाणुओं और विषाणुओं को नंगी आँखों से देखना तक असंभव है. इनमे से कई पृथ्वी पर वास करने वाले अपने से अरवों गुना बड़े जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरा है. जाहिर है कम से कम मनुष्य जैसा चिंतनशील प्राणी अपने ऊपर मंडराते हुए इस ख़तरे से हर संभव बचेगा. ठीक वैसे ही जैसे मैं और आप बचते हैं. जैसे कि बिना किसी वाजिब कारण के यदि कोई हमारे लिए ख़तरा बने तो हर वैध या अवैध तरीके से हम उस ख़तरे से बचने का प्रयास करते हैं.

    लेकिन मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से कुर्बानी या वली के लिए जिन जानवरों की हत्या की जाती है उन जानवरों से मानवजाति को कौन सा ख़तरा उत्पन होता है. ये समझ से बाहर है.

    फ़िर भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि इंसान के अंदर रहने वाले इन जीवाणुओं को इसलिए जलना पड़ता है क्यों कि ये मृत शरीर को छोड़कर नहीं जा पाते और न ही इन्हें व्यवाहरिक रूप से बाहर निकालना संभव है. अगर ये मृत शरीर से अलग हो पाने में सक्षम होते तो लोग इनको पकड नहीं जलाया करते कि भई आओ तुम्हें भी जलाना है. तुम्हें भी कुर्बान करना है या तुम्हारी भी वली चढ़ानी है. भले ही ये हमारे लिए ख़तरनाक हैं. मृत शरीर को ज़लाते वक़्त इन्हें ज़लाने कि भावना कतई नहीं होती बल्कि मृत के अंतिम संस्कार की भावना होती है. ज़ाहिर है इस प्रक्रिया में मरने वाले जीवाणुओं की हत्या का सवाल ही पैदा नहीं होता. फ़िर दर्द होने या न होने का सवाल ही नहीं उठता. वयाव्हारिक द्रष्टि से इसे जीवाणुओं की हत्या कहना बेतुका है और कुछ भी नहीं.

    इनका दूसरा तर्क ...कि पेड़-पौधों कि हत्या क्यों करते हों?


    पूछ सकता हूँ कि आप पेड़ -पौधों की कुर्बानी या वली क्यों नहीं देते? या केवल उन्हीं का भक्षण क्यों नहीं करते ? यक़ीन मानिए इसमें किसी को कोई ऐतराज़ नहीं होगा. लेकिन आप ऐसा कभी नहीं कर सकते क्योंकि आप पेड़ -पौधों और जानवरों में अंतर अच्छी तरह जानते हैं. क्या ये सही नहीं है ? भई ...पेड़ पौधों और इन जानवरों में धरती आसमान का अंतर है ये सारी दुनिया जानती है. अगर नहीं होता तो पेड़ों को काटने से भी खून बहा करता. फ़िर शायद पेड़ हत्या और पौधें हत्या जैसे शब्द आम होते जैसे कि जीव हत्या. फ़िर इनको भी कुर्बानी और वली के लिए इस्तेमाल किया जाता. लेकिन नहीं की जाती क्योंकि अंतर है. एक पेड़ से अगर एक टहनी तोड़ ली जाए या किसी पौधे की हरी-भरी पत्तियों को उस पौधे से अलग कर दिया जाए तो नई टहनी और पत्तियां जल्द ही जा जाती हैं. लेकिन अगर किसी बकरे की टांग तोड़ अलग कर दी जाए तो खून की धारा बह निकलती है. उसकी टांग कभी नहीं आती. ये अन्तर तो सभी को पता है. ज़ाहिर इस कुतर्क में भी कोई दम नहीं है. वैसे तो और भी अंतर हैं. लेकिन इतने ही काफ़ी हैं.

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  38. गौरव जी,
    Science without religion is lame, religion without science is blind.

    यह सूत्र तो हमारे शास्त्रों में युगो पहले से मौजुद है।

    ज्ञान के बिना क्रिया अंध समान है और क्रिया बिन ज्ञान अपंग!!

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  39. तीसरा तर्क .....कि अनजाने में हमें हानि पहुचाने वाले लाखों कीड़े-मकोड़ों की हत्या की बात क्यों नहीं करते?

    हत्या का सवाल ही पैदा नहीं होता. जब भी हम सड़क पर चलते हैं तो कीड़ों-मकोड़ों का मारना या कुचलना हमारा उदेश्य कभी नहीं होता. ये सब इंसान से अनजाने में ही मारे जाते हैं. जिस वक़्त हमे ये अहसास हो जाता है कि हमारे पैर के नीचे कोई जीव है तो हम तुरंत अपना पैर उठा लेते हैं ताकि वह जीव बच सके. अगर व्यवहारिक रूप से बिना किसी कीड़े -मकोड़े को मारे वगैर हम जी सकें तो ज़रूर जीना चाहिए . यहाँ पर ये बताना भी उल्लेखनीय होगा कि जानबूझकर कीड़े मकोड़ों को मारना भी पाप है जब तक की उनसे आप के जीवन को कोई ख़तरा हो या आप इनकी हत्या से बच सकते थे लेकिन नहीं बचे.

    चौथा तर्क..... मेरे धर्म के लोगों के बारे में ही क्यों, दूसरे धर्म के लोगों के बारे में क्यों नहीं?

    बिल्कुल बेकार और निराधार तर्क .........इस तरह की बुराई में जो लोग भी सम्मिलित हैं इस तरह के लेख उन सबके लिए हैं न कि किसी धर्म विशेष के लोगों के लिए ही. बुराई, बुराई होती हैं. इसका धर्म से लेना देना नहीं. हमें बुराइयों का ज़िक्र धर्म के आधार पर नहीं करना चाहिए. मेरा ऐसा मानना है.

    ५ वाँ तर्क.... वैज्ञानिक युग में भी कुर्बानी या वली का विरोध क्यों करते हैं?

    भई ......एक तरफ़ तो आप वैज्ञानिक युग की बात करते हो दूसरी और धार्मिक कारणों से कुर्बानी और वली चढाने की बात का समर्थन करते हो, ये विरोधाभास क्यों ? क्या आप ये नहीं जानते कि वैज्ञानिक सोच कुर्बानी और वली चढ़ाने की घटनाओं का समर्थन नहीं करती. मांस खाने से होने वाले फ़ायदों को लेकर वैज्ञानिक आज तक एक मत नहीं हैं . आए दिन शाकाहार के फ़ायदों का ज़िक्र भी उतना ही होता है जितना की मांसाहार के फ़ायदों को लेकर. ज़ाहिर है इस तर्क में भी कोई दम नहीं है.
    ६ वाँ तर्क ........दूसरी बुराइयों का ज़िक्र क्यों नहीं करते?

    क्या इस तर्क को मांस भक्षण, धार्मिक कारणों से कुर्बानी या वली के लिए जानवरों की हत्या को सही ठहराने के लिए प्रयोग किया जा सकता है. आप ख़ुद फ़ैसला करें. मेरे हिसाब तो हरगिज़ नहीं . भला ये भी कोई बात हुई. क्या आप चाहते हैं कि इस बुराई पर पर्दा पड़ जाए. आप देख सकते हैं कि हम सब अलग -बुराइयों पर अपनी राय रखते हैं. कुछ लोगों का विषय एक भी हो जाता है. लेकिन ऐसा तो कभी नहीं कि केवल इसी बुराई पर चर्चा होती है. आपके इस तर्क में कोई दम नहीं है .

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  40. ७ वाँ तर्क..... वैज्ञानिक जानवरों की हत्या करते हैं उसके बारे में क्यों नहीं लिखते हो?

    सबसे पहले तो ये जान लो कि मांसभक्षण, जानवरों की कुर्बानी या वली चढ़ाने का विरोध करने वालों ने इसे कहीं भी सही नहीं ठहराया. इसलिए इस तर्क का उनका ख़िलाफ़ प्रयोग होना ही नहीं चाहिए.

    दूसरी बात वैज्ञानिक जानवरों की हत्या मानव समुदाय के व्यापक हित में निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही करते हैं. ऊपर से अक्सर उनका जानवरों को मारने का तरीका भी कम दुखदाई होता है. इसलिए वैज्ञानिकों पर जानवरों की हत्या का इल्ज़ाम डालना थोड़ा ज्यादयती होगा.

    देश कि भलाई के लिए जैसे सैनिक शहीद होते हैं लेकिन उन पर फक्र किया जाता है. क्योकि वो सैनिक देश, समाज और लोगों के व्यापक हित में शहीद होते हैं. ठीक वैसे ही मानवजाति के व्यापक हित के कारण मरने वालों जानवरों को स्वीकार किया जा सकता है लेकिन केवल जीव के स्वाद और धार्मिक अंधविश्वासों के कारण जानवरों की हत्या को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. मेरा ऐसा मानना है .


    फ़िर भी अगर आपको ये ग़लत लगता है तो आप भी वैज्ञानिकों के संदर्भ में लिख सकते हैं अपनी बात रख सकते हैं. लेकिन इस तर्क का उपयोग आप मांसभक्षण, जानवरों की कुर्बानी या वली चढ़ाने का विरोध करने वालों के विरुद्ध करोगे तो एक तरह से उन्हीं की बातों का समर्थन करोगे.


    मांस भक्षण के कारणों से जानवरों की हत्या या धार्मिक कारणों से की जाने वाली उनकी वली/ कुर्बानी को आप चाहे छोड़ दें या ज़ारी रखें, आप के जैसे भी विचार हों मुझे कुछ नहीं कहना.
    लेकिन आपको इसे ग़लत मानने वालों के ख़िलाफ़ कुतर्कों का सहारा नहीं लेना चाहिए.

    वैसे तो इन सभी (कु)तर्कों की काट में और भी तर्क हैं चूँकि समझदार के लिए इतना ही काफ़ी है इसलिए मैं अपनी बात यहीं खत्म करता हूँ .


    अगर मेरी बातों से किसी को ठेस लगी हो तो मुझे उसके लिए खेद है. क्योंकि मेरा मक़सद किसी का दिल दुखाना तो कभी भी नहीं है .

    आप मेरे तर्कों के समर्थन में या फ़िर विरोध में अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र हैं.

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  41. .@ श्री प्रतुल वशिष्ठ,
    इससे पहले कि मैं बात को आगे बढ़ाऊँ, मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं और मेरा परिवार माँसाहार तो क्या, प्याज़ लहसुन तक जैसे तामसिक भक्ष्य का प्रयोग नहीं करता.. जो कि एक तरह से अतिरँजित शाकाहार की श्रेणी में आयेगा । शाकाहार को प्रचारित करने वाली कई सँस्थाओं से भी अपुन जुड़े हैं । माँसाहार की अपेक्षा शाकाहार को प्रचारित करने की मेरी मुहिम कुछ व्यवहारिक स्तर की है, माँसाहार की भर्त्सना करने के साथ साथ उसकी उपयोगिता प्रचारित करना ही मेरा उद्देश्य है । मेरी दृष्टि में माँसाहार का अँधविरोध ज़ायज़ नहीं है, क्योंकि अपनी विशद यात्राओं के दौरान मैंने उनकी मज़बूरियों को देखा, परखा और उन्हें समझने की चेष्टा भी की है ।
    परिवर्तन की मुहिम को थोपने की जँग में बदलना सदैव कुपरिणाम ही देता आया है ।
    अँग्रेज़ों या पाश्चात्य लोगों द्वारा हमारे इतिहास को तोड़ने मरोड़ने का दोषी मानने वाले गौरव जी को मैं यह बताना चाहता हूँ, उस युग में भारतवासी इतने असँगठित थे ( जो कि अब तक हैं ) कि विदेशियों ने अपनी चला ली.. हमें आख़िर किसने रोका था । प्रसँसगतः केवल इतना ही बतलाना पर्याप्त रहेगा कि ऑस्ट्रिया से आयी मिस कैथराइन नें 68 वर्ष की आयु में राजगृह ( कोडरमा बिहार ) से वर्द्धमान तक की पगयात्रा कर प्रसिद्ध कृति ’ बाणभट्ट की आत्मकथा ’ के पाँडुलिपि को प्रकाश में ला पायीं थीं । और हम उन्हें भुला उस युग की अपनी साहित्य-समृद्धि पर गाल बजा रहे हैं !
    किसी अन्य को न हो, पर मुझे यह बातें कचोटती हैं, मैं कोई प्रतिटिप्पणी करने से आइँदे अपने को बचाना चाहूँगा, इसके लिये और भी हैं ब्लॉग महज़ कुछ गिनतियों के सिवा...

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  42. " माँसाहार की भर्त्सना करने के साथ साथ उसकी उपयोगिता प्रचारित करना ही मेरा उद्देश्य है ।"

    के स्थान पर इस सँशोधित पँक्ति को पड़ें
    माँसाहार की भर्त्सना करने के साथ साथ शाकाहार की उपयोगिता प्रचारित करना ही मेरा उद्देश्य है ।

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  43. @ प्यारे भाई अमित शर्मा जी ! आप लहसुन प्याज नहीं खाते , क्यों ?
    2, क्या मैं जान सकता हूँ कि आप आलू टमाटर खाते हैं ?
    या वह भी नहीं खाते ?

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  44. @विरेन्द्र सिंह चौहान
    हम पशुओं की कुर्बानी अल्लाह के हुक्म से देते हैं
    अपने जीभ के स्वाद मात्र के लिए नहीं ,
    आप अपने मुर्दे को जलाते हो या नहीं अगर जलाते हो तो क्यों?

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  45. @विरेन्द्र सिंह चौहान
    और ये कैसा पशु प्रेम है जो देश के सिपाही के लिए तो आँख मूंद लेने को कहता है तथा वैज्ञानिक प्रयोग के लिए भी आंख बंद करने को कहता है
    हमारा केवल ये कहना है की , प्राण तो प्राण होता है , शरीर छोटा हो या बड़ा
    आप बताइये प्राण का महत्व है या शरीर का ,
    चाहे प्राण किसी भी शरीर रूपी वस्तु में हो जैसे पेड़ पौधे , जीव जंतु ,
    या मनुष्य में सब बराबर हैं ? ये प्रश्न है
    अगर बराबर हैं तो भेद भाव कैसा आप तो पढ़े लिखे हैं ? या अज्ञानी है ,?
    आपको क़ुरबानी से ऐतराज़ है या कम ,अधिक दर्द होने पर
    अगर हत्या अनजाने में हो तो क्या माफ़ी के काबिल है ,
    और अगर वही कार्य बार बार दुहराया जाये तो भी माफ़ी के काबिल है

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  46. आप धर्म के कारण विज्ञान की बातों को मानते हो या विज्ञान के कारण धर्म की बातो को मानते हो
    अगर धर्म के कारण नहीं मानते तो
    कोई बात नहीं विज्ञान की बातों को आप ले भी सकते हैं नहीं भी
    अगर मानते हैं तो
    मुर्दे को जलाना, खतना न कराना, आवागमन में विश्वाश ( बार बार पुनर्जन्म ) रखना , करोड़ों देवी देवता को मान ना , हर साल खरबों रुपया धर्म के नाम पर मूर्ति बनाने में उनको नदी में विसर्जित करके प्रदूषित करने में , कौनसा विज्ञान का तर्क छुपा है ,
    प्रश्न और भी है सबसे अहम् प्रश्न है आप किस धर्म को मानते हो ?
    मुझे आशा है आप मेरे प्रश्नों का उत्तर अति शीघ्र देंगे
    @विरेन्द्र सिंह चौहान

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  47. ब्लॉग युद्ध - अमित बनाम अनवर जमाल

    ये ब्लॉग युद्ध लड़ा जा रहा है उस देश में जहाँ 45 लाख का एक बकरा बिकता है, बकरों का 3-4 लाख में बिकना भी यहाँ कोई बड़ी बात नहीं है, ध्यान दीजिये उस देश में जहाँ आज भी हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है !

    पात्र परिचय -


    हिंदी ब्लॉग एक आसमान पर चमकते हुए एक सितारे का नाम है डा. अनवर जमाल !

    http://meradeshmeradharm.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

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  48. Read full post @

    http://meradeshmeradharm.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

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  49. .

    विभाजन के समय माँसाहारी बकरे जिन्ना साब के साथ उधर ही रवाना कर दिए गए थे। बाकि के हमारे हैं। इतना ज्यादा कुर्बानी दोगे तो एक दिन सभी चौपाये ख़तम हो जायेंगे । फिर क्या होगा ? अल्लाह को क्या मुह दिखायेंगे आप लोग ? रिसेशन के जमाने मैं इतनी मेहेंगाई है और आप लोग हैं की पशु-मॉस में हमारे शाकाहारी मसाले भी खाए जा रहे हैं। एक ऊंट पकाने में पाच घरों का महीने भर का शाकाहारी मसाला consume कर रहे हैं आप लोग। ये घोर अन्याय है।

    अरे बकरी-ईद मनाइए । आइसक्रीम खाइए ।
    ठंडा-ठंडा , कूल-कूल ।

    .

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  50. @ प्रिय अनुज ! मेरे प्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं , क्यों ?
    @ ऐ साहिब अ देश धर्म ! यहाँ कोई धर्म युध्ह नहीं बल्कि धर्म वार्ता चल रही है .
    क्या दो भाई आपस में धर्म चर्चा भी नहीं कर सकते ?
    मत भिन्नता अलग बात है , कोई बैर नहीं है हमें .
    शुभकामनायें .
    अच्छे उद्गार के लिए आभार .
    वन्दे ईश्वरं . ॐ शांति .

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  51. तर्क : सब्जी और फल भी जिन्दा होते हैं

    answer :

    पशुपक्षी में चेतना जागृत होती है उन्हें मरने से भय भी लगता है [सब्जी फल में नहीं]
    जब आप पेड़ से फल तोड़ते हैं तब भी पेड़/पौधा जीवित रहता है | लेकिन पशु पक्षियों के साथ ऐसा नहीं होता

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  52. अमित मैं आज की आपकी पोस्ट के विषय में इतना ही कहूँगा की आप अपने दिल की बात पूरी सच्चाई के साथ अपने ब्लॉग पर रखें. इसके बाद क्या होता है इसकी चिंता करने की या इससे परेशान होने की कोई जरुरत नहीं है. देखो अगर आप सही हैं तो जमाना आपका साथ देगा और अगर आप गलत हैं तो आप खुद पहचान जायेंगे . वैसे मैंने अपने अभी तक के जीवन में ये अनुभव किया है की इस दुनिया के अंतिम सत्य जैसी कोई चीज नहीं है. हम जिस चीज को सही समझते हैं कोई दूसरा उसे सबसे बड़ा झूट मानता हैं और जिस बात को कोई दूसरा सबसे बड़ा झूट कहता हैं हम उसे अंतिम सत्य मानते हैं पर दोनों ही आराम से इस दुनिया में रह रहे होते हैं. इस स्थिति का क्या किया जाय.

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  53. Meat-eaters: have claws
    Herbivores: no claws
    Humans: no claws

    Meat-eaters: have no skin pores and perspire through the tongue
    Herbivores: perspire through skin pores
    Humans: perspire through skin pores

    Meat-eaters: have sharp front teeth for tearing, with no flat molar teeth for grinding
    Herbivores: no sharp front teeth, but flat rear molars for grinding
    Humans: no sharp front teeth, but flat rear molars for grinding

    Meat-eaters: have intestinal tract that is only 3 times their body length so that rapidly decaying meat can pass through quickly
    Herbivores: have intestinal tract 10-12 times their body length.
    Humans: have intestinal tract 10-12 times their body length.

    Meat-eaters: have strong hydrochloric acid in stomach to digest meat
    Herbivores: have stomach acid that is 20 times weaker than that of a meat-eater
    Humans: have stomach acid that is 20 times weaker than that of a meat-eater

    Meat-eaters: salivary glands in mouth not needed to pre-digest grains and fruits.
    Herbivores: well-developed salivary glands which are necessary to pre-digest grains and fruits
    Humans: well-developed salivary glands, which are necessary to pre-digest, grains and fruits

    Meat-eaters: have acid saliva with no enzyme ptyalin to pre-digest grains
    Herbivores: have alkaline saliva with ptyalin to pre-digest grains
    Humans: have alkaline saliva with ptyalin to pre-digest grains
    Based on a chart by A.D. Andrews, Fit Food for Men,

    (Chicago: American Hygiene Society, 1970)


    http://www.celestialhealing.net/physicalveg3.htm

    मेरे विचार नहीं है , चाहे जितना विरोध कर सकते हैं :))

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  54. जीव जीवस्य भोजनम् के अनुसार कोई जीव किसी का भक्षण करता है तो कोई दूसरा जीव उसका भक्षण कर जाता है। सभी समुचित संख्या में पृथ्वी पर उत्पन्न होते रहें, ताकि खाद्य श्रं=खलाएं सुचारू रूप से चलती रहें, इसके लिए समस्त जीवों का सरंक्षण करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। मनुष्य के लिए जीव हत्या पाप है। मनुष्य अप्राकृतिक रूप से तो सर्वभक्षी है। वह सभी श्रेणी के जीव- जंतुओं को खा सकता है, लेकिन शारीरिक संरचना और प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार वह शुद्ध शाकाहारी है।

    http://www.indiacsr.in/environment/environment-day-special294.jsp

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  55. प्रिय अमित जी,
    मैं भी स्मार्ट इन्डियन जी के शब्द ही कहना चाहूँगा कि आप व्यर्थ में बेभावों को भाव दे रहे हैं. आपकी अन्तर्रात्मा भी जानती है और हम सब भी, कि आप जिस मार्ग पर हैं,वो सही है. आप अपने कर्तव्य एवं "ब्लगिंग धर्म" दोनों का बखूबी निर्वहण कर पा रहे हैं. इसलिए अडिग रह पथ पर बढते चलिए...बिना किसी प्रतिक्रिया की परवाह किए.
    *********
    "भारत-भारती-वैभवं" ब्लाग की सदस्यता का आमन्त्रण भेजिएगा.

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  56. @ प्रिय अमित जी, क्या बात है भाई ?
    क्या जवाब नहीं देंगे ?

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  57. यदि आप को "अमन के पैग़ाम" से कोई शिकायत हो तो यहाँ अपनी शिकायत दर्ज करवा दें.

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  58. @ आदरणीय अमर जी
    ये टिपण्णी आपके विचारों के प्रति सहमति और सम्मान हेतु

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  59. @ आदरणीय अमर जी
    [ये टिपण्णी मेरे स्पष्टीकरण के लिए]

    आपको लगता है तो मेरे विचारों से ऐसा ही लगता होगा की मैं पाश्चात्य लोगों को इतिहास तोड़ने मरोड़ने का दोषी मानता हूँ , लेकिन मुझे मूल परेशानी आज के युवाओं से है जो अपने आप को आधुनिक और विकसित कहने से नहीं चूकते , बिना इस बारे में सोचे की हमने प्रगति के नाम पर ठंडा और गरम करने वाली एवं अन्य स्वचालित मशीनों से ज्यादा कुछ नहीं पाया है [नैतिकता तो बिलकुल नहीं , मानसिक शांति भी नहीं ]

    मैं कम से कम इस बारे में तो मैं कुछ बोल ही सकता हूँ ना :)
    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/09/blog-post_19.html

    अब ये बात तो हमें माननी होगी ना की भूलना एक प्रतिक्रिया है [किस मानसिकता से ऐसा हुआ होगा मुझे पता नहीं ] और मेरे इस दुनिया में आने से पहले/ मेरे इस बारे में जागरूक होने से पहले ये प्रतिक्रिया दी जा चुकी थी , मैं तो उसी गाल को बजा रहा हूँ जिस पर सारी दुनिया स्नेह और सम्मान से चुम्बन देती रही है [चाहे वो गीता का ज्ञान हो या चाणक्य की सामरिक नीति का युद्द में भारत द्वारा प्रयोग] .. जब लोग इन सीधी समझ में आने वाली बातों से ही बड़ी मुश्किल से कन्वेंस होते हैं तो बाकी बातों के बारे में क्या कहूँ ???

    ये भी पढ़ें

    http://kkyadav.blogspot.com/2010/07/blog-post_08.html

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  60. @सुज्ञ जी

    अब आप समझे ? ...... की मैंने बात का अंत आइन्स्टाइन की बात से क्यों किया था ? :)

    क्योंकि मुझे आदरणीय अमर जी की इसी प्रतिक्रिया का पूर्वाभास था :)

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  61. vishya vishyantar na ho........

    bahut hi gyan-wardhak rachna...


    sabhi ko pranam.

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  62. ..

    मित्रो !
    मेरे मस्तिष्क में एक विचार कौंधा है :

    — क्या आटे को दोबारा चक्की में डालकर पीसना समझदारी कहा जाना चाहिए ? ..... निकलेगा क्या ....... आटा ही ना !
    — क्या तेल को पुनः कोल्हू में डालकर पेरना समझदारी कहा जाना चाहिए ? ......... निकलेगा क्या ......... तेल ही ना !
    — एक दुधारू पशु को उसका ही दूध पुनः पिला दिया जाये .. तो होगा क्या ? .... वह क्या मक्खन देने लगेगा? ......... देगा तो दूध ही ना !
    — क्या किसी के मांस को अपने मांसल शरीर में डालना [खाना] समझदारी कहा जाना चाहिए ? ......... क्या वह मांस दूसरा रूप अख्तियार कर लेगा? ........... बढ़ेगा/ रहेगा तो मांस ही ना !

    यदि
    — एक वस्तु एक प्रक्रिया से गुजर कर दूसरा रूप पाती है तो उसे विकास कहते हैं.
    — एक वस्तु एक प्रक्रिया से निकलकर अपने अवशिष्ट छोड़ती हुई दूसरा रूप ग्रहण करती है तो उसे उन्नति कहते हैं. इसे ही ऊर्जा की सार्थकता भी कहते हैं.
    अन्यथा
    — घृत से घी का निर्माण करना मूर्खता है.
    — दुग्ध से दूध बनाना बनाना मूर्खता है.
    — आटे से आटा बनाना मूर्खता है.
    — मांस से मांस बनाना मूर्खता है.
    ....... मूर्खता मतलब निरर्थक प्रयास करने वाला.
    ....... द्वितीयक पदार्थों की पुनः प्राप्ति के लिये वही क्रिया बार-बार दोहराना सरासर वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं.
    — यह एक पिछडापन कहलायेगा.
    — इसे शिक्षा की कमी भी कह सकते हैं.
    — गंवारूपन भी.

    अन्य दृष्टिकोणों से विचार बाद में .........

    ..

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  63. @ Tausif Hindustani

    सबसे पहले तो मैं ये बता दूँ कि तुम्हारे सवालों का ज़बाव देना कोई ज़रूरी तो है नहीं क्योंकि तुम ये सवाल इसलिए पूछ रहे हो कि ये सिद्ध कर सको कि तुम कितने होशियार हो .ठीक वैसे ही जैसे भ्रष्टचारी लोग अपने पक्ष में तरह -तरह के कुतर्क रखकर अपने आप को सही साबित करने की कोशिश करते हैं वैसे ही तुम कर रहे हो . वरना वो सवाल जिसके उत्तर कई पोस्ट में और मेरे कॉमेंट्स हैं, उनको फिर से न पूछते.
    दूसरी बात मैंने सिर्फ अपनी बात रखी है किसी से कोई ख़ास सवाल तो नहीं पूछे, तुम भी अपनी बात रखो सवाल क्यों पूछते हो जो भी पढेगा अपने हिसाब से उत्तर दे ही देगा. यहाँ बहुत से लोगों के पास इतना समय नहीं कि सुबह से लेकर शाम तक लोगों के कुतर्कों का जबाव दिया.

    फिर भी जिस बात को को लेकर बहस चल रही है वो है कि कुछ ख़ास जानवरों को कुर्बानी या वली और खाने के लिए मारना कितना उचित है. लोग ये कहते हैं कि
    जब शाकाहारी जीवाणुओं को जला देते हैं और पेड -पौधों कि हत्या करते हैं तो उन्हें कोई दर्द नहीं होता.
    मैं ये कहता हूँ कि कुर्बानी या वली और खाने के लिए मारे जाने जानवरों की तुलना जीवाणुओं और पेड़ -पौधों से करना गलत है. उन सवालों का यहाँ क्या मतलब जो तुम पूछ रहे हो? कि खतना न कराना, आवागमन में विश्वाश ( बार बार पुनर्जन्म ) रखना , करोड़ों देवी देवता को मान ना , हर साल खरबों रुपया धर्म के नाम पर मूर्ति बनाने में उनको नदी में विसर्जित करके प्रदूषित करने में , कौनसा विज्ञान का तर्क छुपा है , ...इन बातो का यहाँ क्या मतलब ? इन मुद्दों का ज़िक्र यहाँ करने का क्या मतलब ?

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  64. ..

    देवी मंदिर में भक्तों से बकरा दियो कटाय.
    उस बकरे को धूर्त पुजारी बड़े स्वाद से खाय.
    दुनिया बावरी रे .......

    ..

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  65. @ Tausif Hindustani

    जब भी मांस - भक्षण और वली या कुर्बानी के लिए जानवर को मारा जाता है तो वो अपने बचने के लिए हर संभव प्रयत्न करता है ..इतना कि उसका मल-मूत्र तक निकल जाता है इतने पर भी उसको मार दिया जाता है ...........

    कभी जीवाणु और पेड़ -पौधों के सम्बन्ध में ऐसी बात सुनी है किसी ने?

    "और ये कैसा पशु प्रेम है जो देश के सिपाही के लिए तो आँख मूंद लेने को कहता है तथा वैज्ञानिक प्रयोग के लिए भी आंख बंद करने को कहता है"- ausif Hindustani

    कौन कहता है कि ऑंखें मूँद लो ...मेरे कमेंट्स को ध्यान से पढो और और उसे समझने कि कोशिश करो. तुम्हारे सारे सवालों का ज़बाव है. लेकिन जब उन्हें समझने कि कोशिश करोगे तब. और हाँ ये सवाल पूछने की बाजाय सीधे से अपनी बात रखो जैसे कि दुसरे लोग रख रहे हैं ताकि कोई भी उसका उत्तर दे सके. यहाँ मेरे से भी बड़े -बड़े ब्लोगर हैं. मेरा पास वक्त होगा तो मैं भी अपनी बात रखूंगा .

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  66. ..

    शीघ्र 'एक बकरे की आत्मकथा' भारत-भारती वैभवं' ब्लॉग पर आने वाली है.
    अभी उसकी आत्मकथा को गोपीनाथ अग्रवाल जी सुनकर समझ रहे हैं. एक मित्र जो पिछले जन्म में बकरा था इस जन्म में एक इंसान रूप में उन्हें अपनी आपबीती सुना रहा है.

    ..

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  67. 'एक बकरे की आत्मकथा' की बहुत प्रतीक्षा रहेगी …

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  68. DR. ANWER JAMAL said...
    @ प्रिय अनुज ! मेरे प्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं , क्यों ?
    @ ऐ साहिब अ देश धर्म ! यहाँ कोई धर्म युध्ह नहीं बल्कि धर्म वार्ता चल रही है .
    क्या दो भाई आपस में धर्म चर्चा भी नहीं कर सकते ?
    मत भिन्नता अलग बात है , कोई बैर नहीं है हमें .
    शुभकामनायें .
    अच्छे उद्गार के लिए आभार .
    वन्दे ईश्वरं . ॐ शांति .
    ++++++++++++++++++++++++++++++

    जमाल साहब अब आप इतने भी गंवार नहीं है की - ब्लॉग युद्ध और धर्म युद्ध में अंतर भी न कर सके

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  69. ड़ा अमरकुमार जी प्रतिक्रिया तो न देंगे पर एक बार झांक भर लें तो यह कमेंट सार्थक हो जायेगा।

    सर्वप्रथम शाकाहार के व्यवहारिक उत्थान में आपके योगदान को नमन, वह प्रयास स्तुत्य है।

    यह सच्चाई है कि कई पाश्वात्य कार्यकर्ताओं ने भारतिय ग्रथो का उद्दार किया। लेकिन उनके इस योगदान से उन आकृमणकारियों का ग्रंथागार नष्ट करना अच्छा तो नहिं कहा जायेगा। या वह पाप धुल तो न जायेगा।

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  70. प्रश्न जो उठाता है उत्तर भी उसी से माँगा जाता है
    हाँ अगर आपके पास उत्तर नहीं है तो कोई बात नहीं

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  71. मित्रों,

    किसी भी बुराई पर चर्चा के समय, जो लोग भी सामने दूसरी बुराईयां धरते हैं वह वास्तव में तो उस बुराई को ढकने का प्रयास करते है।

    ऐसे कुतर्कों का उत्तर देना व्यर्थ है। ऐसी स्वस्थ चर्चा नहिं, बालक्रिडा मात्र है।

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  72. तू दो तो तर्क हम दें तो कुतर्क
    वह क्या इन्साफ है
    dabirnews.blogspot.com

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  73. तौसिफ़,

    मैं जानता हूं आप समझदार है। और जानकार भी। डाबीर न्युज पर अच्छा लिखते है।
    इन्साफ़ यह होता है कि विषय पर बात की जाय, और उसी पर सार्थक तर्क प्रस्तूत किये जाय।

    टिप्पणी में दूसरे विषय निकालना प्रपंच कहलाता है। यदि आपके भी तर्क व बुराईयां मज़बुत है तो उसे आपको विषय बनाकर अपने ब्लोग पर पेश करना चाहिए। तब सार्थक चर्चा सम्भव होगी।

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  74. विवाह संस्कार में वर के पैरपूजन पर मुंशी प्रेमचंद की एक कथा हम भी पढ़वाएंगे "बकरे की आत्मकथा" पढ़ने के बाद !
    एक बकरे से ज्यादा वैल्यू तो होगी ही मुंशी की आत्मकथा की !

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  75. @तौसिफ हिन्दुस्तानी
    प्रश्न जो उठाता है उत्तर भी उसी से माँगा जाता है
    हाँ अगर आपके पास उत्तर नहीं है तो कोई बात नहीं


    फिर से घमंड वाली बात ....
    मेरे कॉमेंट्स में तुम्हारे हर सवाल का उत्तर है. बस समझने वाला चाहिए.
    इतने सारे कॉमेंट्स और लेख पढ़कर जिस व्यक्ति को अब तक कुछ भी समझ नहीं ..अगर मैं उसके सवालों का उतार दे भी दूँ तब भी वह कुछ नहीं समझेगा.
    तुम्हारी सोच और तुम्हे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ. सलीम खान के ब्लॉग पर तुम्हारे सारे कॉमेंट्स पढ़ रखे हैं . जिस इंसान की सोच इस तरह की हो उसे किसी उत्तर से संतुष्ट नहीं किया जा सकता . ये भी मैं अच्छी तरह से जानता हूँ . जो लोग वली या कुर्वानी देते वक़्त तो सभी चीजों में फर्क करते हैं ..कि भाई इस जानवर की वली या कुर्वानी देनी है ..क्योंकि इसी की दी जा सकती है और ये नहीं सोचते कि चलो चलो कभी कभार अपने किसी प्रिय भाई की वली दे देतें हैं वो भी तो जीव ही है . या किसी पेड़ -पौधे की दे ते हैं... या किसी जीवाणु की दे देते हैं. लेकिन अपना बचाव करते हुए उनमें कोई फर्क नहीं करते. इस तरह के चालाक लोगों को मैं अच्छी तरह से समझता हूँ . उनके किसी सवाल/ कुतर्क का ज़बाव देना बिलकुल भी ज़रूरी नहीं है . मेरा ऐसा मानना है .

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  76. bhai amit ji jo vichar hai aap ke apne hai logo ko kiyu aappati hoti hai .
    yeh samajh nahi aaya .

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