Saturday, July 24, 2010

"एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति " "अल्लाह एक है उसके सिवा और कोई नहीं है" क्या फर्क पड़ता है ---------- अमित शर्मा

अरबी सभ्यता जब धर्म से दूर होकर जंगलीपने की हद तक जा पहुंची तब श्रीमोहम्मदसाहबजी ने इस्लाम के माध्यम से अरबी सभ्यता को धर्मानुकुल बनाने की कोशिश की थी.  पर श्रीमोहम्मदसाहबजी के स्वर्गगमन के बाद उनके अनुयायियों ने अपने देश की सभ्यता की प्रीत में इस्लाम को ही अपनी सभ्यता का दास बना लिया, अरबी सभ्यता लड़ाई झगडे को विशेष सम्मान देती है, इसी कारण इस्लाम के अनुयायी बन जाने पर कई बार टालें जाने पर भी इस्लाम में युद्ध का प्रवेश हो गया,
श्रीमोहम्मदसाहबजी के बाद जब इस्लाम अरबी सभ्यता का अनुयायी हो गया, तब जेहाद ही उन नए इस्लामवादियों द्वारा विशेष कर्त्तव्य मान लिया गया. इसी विश्वास के के चलते अरबो ने इरान और अफगानिस्थान को अपनी धुन में मुस्लिम बना लेने के बाद भारत पर भी धावा बोल दिया, अब अरबो को भारत में शारीरिक जीत तो मिल गयी पर धार्मिक रूप में नए इस्लाम की पुराने इस्लाम से टक्कर हुयी. पुराने इस्लाम के वेदानुकुल सिधान्तो के सामने नए इस्लाम को हार माननी पड़ी. (हजारों सालो तक सैंकड़ों विजेताओं ने चाहे वह शक, हूण, मंगोल, हो या अरबी सबने भारतीय संस्कृति पर घातक से घातक वार किये पर इसके जड़ों को काटते-काटते इनकी तलवारे भोंटी हो गयी, पर भारतीय जीवन-धारा अजस्र प्रवाहित रही.  अगर भारतीय संस्कृति इतनी ही ख़राब है, हिन्दूओं के अचार विचार इतने ही सड़ें हुयें है तो, अब तक हिन्दू जाती मर क्यों नहीं गयी ? )
वह दीने हिजाजीका बेबाक बेडा
निशां जिसका अक्क्साए आलममें पहुंचा
मजाहम हुआ कोई खतरा जिसका
न अम्मआन में ठिटका न कुल्जममें झिझका
किये पै सिपर जिसने सातों समंदर
वह डूबा दहानेमें गंगा के आकर
(श्री मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली--  मुसदिये हाली )
अरबी सभ्यता भारत में आकर यहाँ के रंग में घुलने मिलने लगा था, इस्लाम पर भारतीय संस्कृति का इतना प्रबल प्रभाव पड़ा था की आम जनता के आचार विचार में कोई विशेष भेद नहीं रह गया था. यदि मुस्लिम विद्वान् उलेमा वर्ग द्वारा  भी बिना किसी भेद भाव के अरबी फ़ारसी की जगह भारतीय भाषा को इस्लामी विचार का साधन बना लिया जाता और सिर्फ अरबी संस्कृति को ही इस्लाम न मान लिया जाता तो कम से कम भारतीय इतिहास के माथे पर हिन्दू मुस्लिम मारकाट का कलंक न लगा होता. क्योंकि वास्तव में दोनों एक ही तो हैं.
बस मौलवियों के इन्ही सिधान्तों और बर्तावों ने हिन्दू मुसलमानों को पराया बनाने का काम किया था ,जिसका भयानक परिणाम आज सबके सामने है. जबकि पवित्र कुरआन में किसीसे भी विरोध नहीं है.
"केवल अल्लाह ही पूजनीय है, और सब अच्छे नाम उसी के लिए है"
क्या राम उसका नाम नहीं हो सकता (सर्वर्त्र रमन्ति इति राम - जो सभी के लिए रमणीय है वह राम है)
लोग एकता की बात तो खूब करतें है. पर उस एकता में भी स्वधर्म छोड़ने की बातें है. एकता की बात करते है तो एक ही होइए, उस एक होने में भी यह आग्रह क्यों करते है की अरबी संस्कृति से ही उस की इबादत की जा सकती है, क्या फर्क पड़ता है जो तोहीद "अल्लाह एक है उसके सिवा और कोई नहीं है", कहने से पूरी होती है
वही अद्वैतवाद "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति " कहने में भी पूरा होता है.

53 comments:

  1. लोग एकता की बात तो खूब करतें है.पर उस एकता में भी स्वधर्म छोड़ने की बातें है

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  2. मुझे एक बात समझ नहिं आ रही कि यह धार्मिक रूप से एकता पर क्यों बल दिया जा रहा है,क्या एक ही तरह की धार्मिक सोच से हम में एक मुस्त संगठन हो जायेगा? ईश्वर अल्लाह एक मानने से सभी सिद्धांतो पर सहमति बन जायेगी?
    एकता बेशक महत्व पूर्ण है, और वह है सामाजिक एकता,राष्ट्रीय एकता
    धर्म मान्यता को अलायदा रखकर सामाजिक व राष्ट्रीय एकता पर ही भार देना चाहिये।
    हमने इस धार्मिक एकता में ही राष्ट्रीय एकता को गड्ड मड्ड कर दिया है। इसि कारण राष्ट्रीय एकता में धर्म बाधक रूप में उभर आता है।
    भले वैदिक और इस्लाम 'ईश्वर एक है' सूत्र पर सहमत हो,लेकिन बेसिक सिद्धांतो में बहुत ही अन्तर है,धार्मिक एकरूपता असम्भव है।
    और राष्ट्रीय एकता के लिये आवश्यक भी नहिं।

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  3. चाहे गीता बछिए या पढ़िए कुरान ........ तेरा मेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान !

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  4. बहुत खूब अमित भाई !
    मगर क्या यह डॉ अनवर जमाल के अलावा किसी और की समझ में आएगा ? सलीम खान समझेंगे मुझे शक है ?
    यह अंदाज़ पसंद आया !
    "ताबंदा रहे ईमान शकील, इसको ही इबादक कहते हैं ,
    सजदे के लिए कोई कैद नहीं काबे में हो या बुतखाने में !

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  5. एक धार्मिक कट्टर हिन्दू भी दूसरे धर्मों का सम्मान करता है. महाराज शिवाजी से बढ़कर इसकी मिसाल दूसरी नहीं हो सकती, लेकिन दूसरा सामान्य व्यक्ति भी हिन्दू को लतियाने का कोई मौका नहीं छो़ड़ता. हमें अपने लतियाने वाले को कम से कम उसी की भाषा में जबाव देना सीखना होगा.

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  6. बहुत खूब अमित भाई ! यह अंदाज़ पसंद आया !

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  7. मैंने तो समझा भाई आप आल्हा की बात करे हैं -वीर रस का काव्य जो बरसात के आस पास गाया जाता है!चलिए आपने वीर रस की ही बात की मगर दुसरे परिप्रेक्ष्य की ....बाकी अपने बिलकुल दुरुस्त लिखा है मेरी अल्प समझ से क्योकि मैं जरा धार्मिक विवेचनों में कम रूचि रखता हूँ ! !

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  8. मैं भी आल्हा ही समझ लिया था।

    एक बात पूछता हूँ - यदि अल्लाह एक है और उसी ने सबको बनाया है (थोड़ी देर के लिये मान भी लें तो) इतनी मारा-मारी क्यों है। क्यों मोहम्मद आजीवन बेगुनाहों का खून बहाते रहे?

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  9. सत्यमेव जयते!
    जो विचार सही है वह सनातन है और वही टिकेगा भी, ज़ाहिलियत में भी और सभ्यता में भी, भूत में भी भविष्य में भी. सत्य को न तर्कों की ज़रूरत है और न तलवार की.

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  10. जय भीम धर्म के नाम पर बहाया हमारा खून भी उत्तर माँग रहा है

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  11. @ हजारों सालो तक सैंकड़ों विजेताओं ने चाहे वह शक, हूण, मंगोल, हो या अरबी सबने भारतीय संस्कृति पर घातक से घातक वार किये पर इसके जड़ों को काटते-काटते इनकी तलवारे भोंटी हो गयी, पर भारतीय जीवन-धारा अजस्र प्रवाहित रही. अगर भारतीय संस्कृति इतनी ही ख़राब है, हिन्दूओं के अचार विचार इतने ही सड़ें हुयें है तो, अब तक हिन्दू जाती मर क्यों नहीं गयी ?

    बहुत विचार करने वाली बात लिखी है आपने, शायद अरविन्द जी के अनुसार वीर रस की हुंकार याही है

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  12. अमित जी ब्रेक के बाद दुबारा स्वागत है आपका. आपकी बात से १००% सहमत हूँ कि इस्लाम और वैदिक दोनों ही धर्मों का मूल सिद्धांत एक ही है कि ईश्वर एक है जो कि निराकार है. वैसे सभी धर्मों का मूल सिद्धांत यही है बस समझने में लोगों से भूल हो जाती है और यही भूल सभी मतभेदों कि जड़ है. बहुत बढ़िया लिखा अपने.

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  13. धर्म कोई भी हो, गलत नहीं हो सकता। गलत हैं उसका अंधानुकरण करने वाले और जबरन उसे दूसरों पर थोपने वाले। मैं जन्म से हिन्दु हूं और इसपर मुझे गर्व है, लेकिन मैं दूसरे मतावल्म्बियों को इसे मानने के लिये मजबूर नहीं कर सकता और ऐसे ही किसी दूसरे को मेरे धर्म पर कोई आरोप आक्षेप लगाने का कोई हक नहीं है। धर्म एक व्यक्तिगत मसला है और इसे व्यक्तिगत ही रहने देना चाहिये।
    आपने बहुत अच्छा लिखा है, लेकिन दुर्भाग्य यही है कि जो आपसे सहमत हैं वे पहले से ही यह बात मानते हैं और जो नहीं मानते वो कभी भी सहमत नहीं होंगे।
    बहरहाल, अमित जी, मैं आपसे सहमत हूं और आपके ज्ञान का, लेखन का कायल हूं।

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  14. एकम् ब्रह्म द्वितीयो नास्ति , नेह , ना , नास्ति किंचन ।

    अर्थात ब्रह्म एक है दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है, किंचित भी नहीं है।




    पवित्र कुरआन के सार को कलिमा ए तय्यिबा कहा जाता है -




    ला इलाहा इल्-लल्लाह

    अर्थात परमेश्वर के सिवा कोई अन्य उपासनीय नहीं है।




    वेद और कुरआन दोनों के मानने वाले ईश्वर की इच्छा से इस मुल्क में इकठ्ठे हो चुके हैं।

    वेदों के बारे में वैदिक विद्वान भी एकमत नहीं हैं। कोई इनमें इतिहास बताता है और कोई इनमें इतिहास को सिरे से नकारता है। कोई इन्द्र का अर्थ राजा करता है और दूसरा कोई उसका अर्थ ईश्वर बताता है।

    कोई ब्राह्मण ग्रंथों को वेदों का भाग बताता है और दूसरा वर्ग उसे मात्र व्याख्या बताता है। कोई उन्हें चार-पांच हज़ार साल पूर्व ऋषियों द्वारा रचित बताता है और कोई इन्हें तिब्बत में लगभग दो अरब वर्ष पूर्व का ज्ञान बताता है।

    यही हाल जाति के अनुसार कर्म की है। नारी और शूद्रों के अधिकारों की है। विधवा नारियों की समस्याओं के समाधान की है। 100 वर्ष की आयु मानकर चार आश्रमों के पालन की है, यज्ञ और हवन की है। स्वर्ग और नर्क के विभागों की नाम सहित ऐसी व्याख्या भी यहां मिलेगी कि आदमी पढ़ते हुए समझेगा कि सारा दृश्य उसकी नज़रों के सामने है और फिर वहीं यह भी लिखा मिलेगा कि स्वर्ग नाम सुख का और नर्क नाम दुख का है दोनों वास्तव में अलंकार हैं।

    ग़र्ज़ यह कि हज़ारों साल के दौरान बहुत से कवि और दार्शनिक पैदा हुए और उन्होंने अपनी अपनी बुद्धि से बहुत सा साहित्य रचा। उनमें कुछ बातें बहुत उच्च स्तर की हैं और बहुत सी ऐसी हैं जिनमें अत्याचार और अश्लीलता है।

    अपनी इच्छाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिये महापुरूषों और ऋषियों के चरित्र को ऐसा विकृत कर दिया गया कि महाभारत में अपने बाप से उत्पन्न आदमी को ढूंढना मुश्किल हो जाता है।

    श्री रामचन्द्र जी और श्री कृष्ण जी समेत बहुत से महापुरूषों के जीवन चरित्र के साथ खिलवाड़ किया गया है। मानवता के सामने आज आदर्श का संकट है । वह किसे सही माने और किस के जीवन के अनुसार अपना जीवन ढाले। दोनों ही महापुरूष भारतीय जनमानस में अति लोकप्रिय है परंतु दोनों के ही जीवन चरित्र को लीला कह दिया गया।




    पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस जगत में आने मानवता का सबसे बड़ा संकट उस दयालु ईश्वर ने हल कर दिया है। मुहम्मद साहब सल्ल. के अंतःकरण पर अवतरित ईश्वरीय वाणी ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित है। उनकी जीवनी भी सुरक्षित है। उनके बताये गये नियम पूर्णतः वेदानुकूल हैं, आज के समय में सरलतापूर्वक पालनीय हैं। उनके द्वारा बतायी गयी उपासना पद्धति भी सहज सरल और पालनीय है। कटते जंगल, बढ़ते ग्लोबल वॉर्मिंग और घटते घी के दौर में आज जब हवन




    करना लगभग साढ़े छः अरब मनुष्यों के लिये संभव नहीं है तब भी नमाज़ अदा करना आसान है, हरेक के लिये , ग़रीब के लिये भी और अमीर के लिये भी।

    धर्म वह ईश्वरीय जीवन पद्धति है जिसके बिना कल्याण संभव नहीं है। वह सदा से एक ही है। अलग अलग भाषाओं में उसके बहुत से नाम हैं। एक ही धर्म आज केवल विकारों के कारण बहुत से मतों की भीड़ में दब गया है लेकिन ‘तत्वदर्शी‘ उसे अपनी ज्ञानदृष्टि से आसानी से पहचान लेता है और मान भी लेता है।

    विश्व के परिदृश्य में भारत एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। अगर हमने समझदारी से अपने मनमुटाव दूर कर लिये तो फिर यह विश्व की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति भी होगा। विश्व नेतृत्व पद हमारे सामने है लेकिन हमें खुद को उसके योग्य साबित करना होगा।

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  15. चाहे गीता बछिए या पढ़िए कुरान ........ तेरा मेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान !

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  16. धर्म तो ईश्वर ने पुरे विश्व के लिए एक ही बनाया है, लोगो ने अवश्य अपने-अपने स्वार्थ के लिए उसमें तमाम तरह के बदलाव कर दिए ताकि उनकी दुकाने चलती रहें. आज भी वेद और कुरआन मौजूद है, लेकिन कितने लोग उसके हिसाब से चलते हैं?



    @ अनुनाद सिंह
    एक बात पूछता हूँ - यदि अल्लाह एक है और उसी ने सबको बनाया है (थोड़ी देर के लिये मान भी लें तो) इतनी मारा-मारी क्यों है। क्यों मोहम्मद आजीवन बेगुनाहों का खून बहाते रहे?


    अनुनाद जी क्या अपनी बात साबित कर सकते हो? या आप भी केवल बिना सर-पैर की पढ़ी-पढाई बात पर ही विश्वास करते हो?

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  17. एकम् ब्रह्म द्वितीयो नास्ति है तो फिर एक हजार आठ देवी देवता वाला क्या किस्सा है। धर्म तो असल में सब जगह एक ही बात कहते हैं मगर धर्म के ठेकेदारों की नीयत ठीक नहीं रहती। वे ही जिहाद और धर्मयुद्ध का आह्वान करते हैं। धर्म संकट में है। धर्म सिर्फ तब संकट में होता है, जब आदमी आदमी के खून का प्यासा होता है।

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  18. एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति --------- यह ब्रह्म सर्व समर्थ है और सब जगह रम रहा है, तो इस बात का हौव्वा खड़ा करना बेतुका है की इतने देवता क्यों ................ उसकी शक्ति का प्रकटीकरण उसीके द्वारा उसीके इच्छा से सर्वत्र होता है ................. अगर ब्रह्म सर्वत्र प्रकट होने में असमर्थ है तो फिर वह ब्रह्म हम सबका स्वामी नहीं हो सकता है................... जीतने भी स्वरूपों की उपासना व्यक्ति अपनी भावना अनुसार करता है वह उसी ब्रह्म का स्वरुप मानकर करता है ............................. ब्रह्म,अल्लाह की एकरूपता का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है की उपासना करने योग्य अखिल ब्राह्मांड नायक ब्रह्म एक ही है........................ लेकिन उपासना पद्दत्ति के धरातल पर कभी एक नहीं हो सकता और ना कभी किसी को जबरन किसी एक उपासना पदात्ति अपनाने को मजबूर करना उस परमात्मा की सच्ची उपासना हो सकती है ......................... उपासना पद्दतियों का नाम धर्मं कदापि नहीं है .............. धर्म तो केवल एक ही है मानवता की राह पे चलते हुए सदाचारी जीवन का निर्वाह करना.................. हाँ उपासना पद्दतियां अनेक है और अनेक ही रहेंगी ........................ उपासना पद्दतियों को धर्म का नाम देकर किसी पद्दत्ति विशेष को उत्कृष्ट बतलाकर उसका अनुयायी बनाने के लिए किसी भी तरह का जबरिया उपाय अपनाना निक्रष्ट्ता की पराकाष्ठता है ................

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  19. जमाल साहब हिन्दुओं के ग्रंथों ने तो इस्लाम से भी सस्ती, सस्ती क्या जी बिलकुल फ्री की उपासना पद्दत्ति इस युग के लिए बतलाई है ----- नामसंकीर्तन --------- इस उपासना में एक कौड़ी भी खर्च नहीं होती है ----------- आप परछिद्रान्वेषण की अपनी गलीच मानसिकता से क्यों नहीं उबर पायें है अभी तक ????????? बी.एन.शर्मा जी जो प्रमाण सहित बघियाँ उधेड़ रहें है उसके समाधान में अपनी उर्जा खर्च कीजिये, आपको तो उनका सामना जरूर करना चाहिये क्योंकि आपको तो दूसरी उपासना पद्दतियों का इतना ज्ञान है तो फिर जो उपासना पद्दति आपको जन्मजात मिलि है उसका तो आप तथ्य सहित निराकरण करेंगे ही ............. शर्मा जी को दोष ना देना शुरुवात आप ही की की हुयी है आप ही का बोया वृक्ष है जिसके फल आप के साथसाथ एक आम सदाचारी मोमिन को भी अपने उपासना प्रतिमानों के लिए प्रतिकूल पढना पढ़ रहा है

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  20. जरा से भी उदार बनो कि नुक्स निकाल कर 'दावत' शुरू !!
    मक़सद जानकारियां देना नहिं,अश्रद्धा पैदा करना है। खालिस प्रचार है।

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  21. एक अबोध जान का नश्वर शरीर,खाक सुपुर्द हो रहा था,तब प्रशंसा लोभी
    सहानुभुति की टिप्पणियां गिन रहा था,पोस्टें लगा रहा था। मुर्दाखोर!!!

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  22. यह लो एक नई तफ्री!!!!!!!!!!!!!!

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  23. यह लो एक नई तफ्री!!!!!!!!!!!!!!

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  24. यह लो एक नई तफ्री!!!!!!!!!!!!!!

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  25. यह लो एक नई तफ्री!!!!!!!!!!!!!!

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  26. यह लो एक नई तफ्री!!!!!!!!!!!!!!

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  27. @ प्रिय बंधु अमित ! इतने सारे देवताओं का हौव्वा खड़ा हमने नहीं बल्कि आपने किया है और फिर खुद ही ब्रह्मा जी की पूजा का निषेध भी कर दिया। इन्द्र की पूजा श्री कृष्ण जी ने रूकवाई। जिसके कारण इन्द्र ने उनकी गर्भवती स्त्रियों की हत्या कर दी और उनके अनुयायियों को भी डुबाने की पूरी कोशिश की। देवी भागवत में भी देवताओं की पूजा से रोका गया है और उनकी पूजा करने वालों को जो कुछ कहा गया है वह भी आपसे छिपा नहीं है।
    देवता खुद अपने सिवा दूसरों की पूजा होते देखकर रूष्ट होते माने जाते हैं। यदि सभी कुछ ब्रह्म की इच्छा से हो रहा है तो ब्रह्मा का सिर क्यों काटा गया ?
    ऋषियों ने दारू वन में शाप देकर शिव जी का लिंग क्यों गिरा दिया ?
    परमेश्वर ने कहीं लिंग पूजा करने का आदेश दिया हो या मात्र अनुमति ही दी हो तो कृपया हमें दिखायें ?
    गौतम बुद्ध को स्वयं विष्णु जी ने ही पापावतार घोषित कर दिया है। नर्क के ख़ाली रह जाने की शिकायत सुनकर उन्होंने कहा कि मैं लोगों को पापी बनाकर नर्क में भेजूंगा जबकि अवतार का उद्देश्य तो धर्म की और वह भी वर्णाश्रम धर्म की स्थापना बताया गया है ।
    सदाचारी बनने के लिए भी उसके विधान का पालन करना पड़ता है। समाज को चलाने के लिये ईश्वर द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना पड़ता है। शूद्र को सम्पत्ति संग्रह और ईशवाणी के अध्ययन और उपनयन से रोक देना सदाचार नहीं कदाचार है।
    नारी के लिए विवाह को हिन्दू धर्म में एक संस्कार घोषित किया गया है। नारी के लिए सदाचार यह है कि पति की मृत्यु के बाद वह या तो सती हो जाए या बाल मुंडवाकर ऐसे ही रूखा सूखा खाकर मौत से बदतर जीवन जिए और मर जाए।
    शूद्र और नारी समाज का अधिकांश भाग हैं। वे सदाचारी बनने के लिए ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं।
    उपासना और सदाचार के बारे में गोल मोल बातें करना भ्रमजाल बनाना है। आपने जो कुछ कहा , उसका प्रमाण हिंदू धर्म की पुस्तकों से दीजिये , वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता और व्यवहारिकता सिद्ध कीजिये। मैं जो कुछ कहता हूं सप्रमाण कहता हूं , जहां प्रमाण न दिया हो आप मांगिये मैं देने को बाध्य हूं।
    और रह गई बात बी. एन. शर्मा जी की , तो वह मेरी ज्ञान वाटिका के ख़रगोश हैं, उनकी उछल-कूद से हमारा दिल भी बहलता है और कुरआन पर बहस भी हॉट में रहती है। उनको जवाब देने वाले सदा वहां मौजूद रहते हैं। कभी कभी मैं खुद भी पहुंच जाता हूं ताकि शर्मा जी लगे रहें और उन्हें देखकर दूसरे भी प्रेरित हों।
    केवल मानने के लिये तो मोटे तौर की जानकारी से भी काम चल जाता है लेकिन जिस विचार में कोई कमी न हो उसमें दोष ढूंढने के लिये बहुत गहराई तक जाना पड़ता है । जब आदमी गहराई में उतर जाता है तो सत्य देर सवेर उसपर प्रकट हो जाता है । मेरे मिलने वालों में कई लोग ऐसे हैं जो इस रास्ते पर चले मगर वे सत्य को देर तक अस्वीकार न कर सके। उन्हीं में से एक
    ‘कान्ति‘ मासिक व सात्ताहिक , डी-314, अबुल फ़ज़्ल एन्कलेव , नई दिल्ली - 110025 के संपादक डा. मुहम्मद अहमद साहब हैं
    आप चाहें तो उनसे मिल सकते हैं या फिर इस पते पर पत्र भेजकर उनकी पत्रिकाओं की नमूना कॉपी मुफ़्त मंगा सकते हैं।
    हे समय समय पर अपने धर्म में प्रभुत्वशाली जातियों की संस्कृति के अनुरूप आमूल चूल परिवर्तन करने वालों ! बदलते बदलते आप वही बनेंगे जिससे बचने के लिये यह सब प्रपंच किया जा रहा है।
    यदि मेरी बात ग़लत लगती है तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार हिन्दू समाज को जीने के लिये तैयार करके दिखाइये।
    आप सदाचार के लिये किस का अनुसरण करना चाहेंगे ?
    अपने आदर्श पुरूष का नाम बताइये ?
    क्या उनके आदर्श पर चलना संभव है ?
    बी. एन. शर्मा जी की छोड़िये , हमें तो आपसे उम्मीद है क्योंकि आप एक विचारशील आदमी हैं ।

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  28. @ अनवर जमाल साहब
    एक बात, केवल नवें अध्याय को छोडकर कुरान के शेष सब अध्याय "बिस्मिल्लाह अर्रहमाने रहीम" इन शब्दों से आरम्भ होते हैं. जो कि जरदुश्तियों के इस सूत्र का रूपान्तरण है, जिसको वे अपनी पुस्तकों के प्रारम्भ में लिखते हैं. "बनाम यजदां बखशिशगरदादार" (साथ नाम यजदाँ के जो बखिशिश करने वाला और देने वाला है)

    मुसलमानी मत नें अपने समस्त धार्मिक विचार और शिक्षाएं अधिकाँशत: यहूदियों और कुछेक अंश में जरदुश्तियों से ग्रहण की हैं. अतएव कुरान का धर्म कोई नवीन ईश्वरीय ज्ञान अथवा ईश्वर की किसी विशेष आज्ञा के प्रचार का दावा नहीं कर सकता. मुसलमान जहाँ एक ओर एकेश्वरवाद(केवल अल्लाह ही पूजनीय है, और सब अच्छे नाम उसी के लिए है) की बात करते हैं, वहीं शैतान को प्राय: ईश्वर के समान मानकर अपने अद्वैतवाद की शुद्धता को कलंकित करते हैं.

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  29. हाहाहाहाहा जमाल साहब ज्ञानी हैं पर अपने ही धर्म के। वो भी पूरा नहीं। औऱ दूसरों की पद्धतियों में दोष ही ढूंढंगे.....जिसे बह्म और बह्मा के बीच का अर्थ ही नहीं मालूम वो क्या समझेंगे। द्वैत और अद्वैत का सिद्धांत क्या समझेंगे। मुसलमानों और उससे पहले उनके पूर्वजों हुण आदि के लगातार आक्रमण के बाद जो कुरितियां आईं . जैसे सति प्रथा, शुद्र को ज्ञान न देने की बात करना, समुद्र की यात्रा करना उसी को लेकर जमाल जी सिर्फ लकीर के फकीर बन बैठे हैं। ये वो बुराईंयां हैं जो सनातन धर्म काफी बाद में आईं। औऱ उसी को दूर करने का प्रयास काफी सालों से चल रहा है। पर क्या करें। इन अरबियों ने पिछले एक हजार साल से जो मारकाट मचा रखी है पूरी दुनिया में उससे निजात मिले तो ही न दोबारा धर्म की बुऱाईंयां दूर कर सकें।

    अरब में कबीले के लड़ाकों की नजर में औरत भोगने की वस्तु थी, इसलिए उसे बुर्का पहना दिया गया। यहां औऱत के सामने रहने पर भी अपने पर काबू रखने की शिक्षा दी जाती थी। लोग ईमान के साथ रहते थे। पर क्या जाने जमाल साहब। सिर्फ कुरितियों को बार बार कह कर पोस्ट करना लगता है उनकी आदत औऱ नियति बन गई है। हद है.......

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  30. ज्ञान की बातें..थोड़ी और बड़ी हो जाऊं ..
    ___
    'पाखी की दुनिया ' में बारिश और रेनकोट...Rain-Rain go away..

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  31. werifikeshan hatane ka prayas krunga.
    computer ke chaetra me abhi naya hun.
    aap ke sujhaw par nai racana post kar diya hu
    "ako bramha dwitiyo nasti" ke liye badhai

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  32. bhai sahab mera bhi blog dekhakar aashirvad den

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  33. बहुत सुंदर बात कही आपने, लेकिन लोगों कोसमझ में आए तबतो।
    …………..
    पाँच मुँह वाला नाग?
    साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

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  34. सलीम जी का तर्क मज़बूत है. और सुज्ञ भी सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से एकता पर चिंतन कर रहे हैं.
    @ कई चीज़ें प्रथम द्रष्टया सही और मज़बूत प्रतीत होती हैं. नमक-चीनी का घोल [एकता] किसी बीमार के लिए औषधि हो सकता है. फिर भी घोल बनाने से पहले नमक और चीनी में मिली गंदगी साफ़ कर लेना घोल तैयार करने वाले के ध्यान [स्वभाव] में रहता है. पीने वाला भी एक नज़र घोल को देख लेता है कि गंदगी तैर तो नहीं रही यह मानवीय स्वभाव है.
    # "सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के प्रयास पहले होने चाहिए. धार्मिक एकता के प्रयास में काफी-कुछ हाथ से गँवाना पड़ जाएगा. शायद सुज्ञ यहाँ यही कहना चाहते हैं कि 'आधी छोड़ पूरी को धावे, पूरी मिले ना आधी पावे.' " — सुज्ञ
    @ यहाँ सुधार और एकता के दो सूत्रों पर विचार किया जा सकता है. पहला, 'ज़मीनी' जिसमें शुरुआत व्यक्ति से होती हुई परिवार, बिरादरी, समुदाय, समाज, भाषा, राष्ट्र और फिर धर्म पर जाकर समाप्त होती है. दूसरा सूत्र है, 'शास्त्रीय अंकुश' या 'आकाशीय' जो लोग हवा हो चुके हैं, जो लोग आकाश-भ्रमण पर हैं उनके कथनों के अनुसार चलना. इन कथनों में जीवनानुभवों का सार निहित होता है.
    ## "भले वैदिक और इस्लाम 'ईश्वर एक है' सूत्र पर सहमत हो, लेकिन बेसिक सिद्धांतो में बहुत ही अन्तर है,धार्मिक एकरूपता असम्भव है। और राष्ट्रीय एकता के लिये आवश्यक भी नहिं।" — सुज्ञ
    @ बेसिक सिद्धांत 'ईश्वर एक है' है जो दोनों का ही सामान है, लेकिन इस सिद्धांत पर खड़े किये गए पिलर सिद्धांत भिन्न-भिन्न हैं. इसलिए धार्मिक एकता संभव नहीं हो पा रही. दोनों धर्मों में बाह्य-आडम्बरों का काफी समावेश हो चुका है. इसलिए दोनों ही एक-दूसरे पर छींटाकशी करते दिख रहे हैं. वैदिक सनातन धर्म अपने शुद्ध रूप में सभी के लिए अपनाने योग्य है. इस्लाम के विषय में अमित जी और जमाल जी बेहतर बता सकते हैं.

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  35. यदि कुछ लोग प्रमाणों के साथ सिद्ध कर दें कि कुरआन नाम की कोई किताब ही नहीं थी वह तो बाद में जबरन गढ़ी गयी मुल्लाओं की कोशिश का नतीज़ा है.................. तो हंगामा हो जाए.
    यदि कुछ शोधकर्ता साबित कर दें की 'राधा' नाम की कोई कृष्ण-प्रेमिका हुई ही नहीं, वह तो भक्त कवियों की वासनात्मक उपज-भर है तो भी भक्त-समुदाय में क्रान्ति खडी हो जाए.
    तथ्य जानने का दोनों में ही साहस नहीं रहा, दोनों ही अविवेकी आस्था के साथ धर्म-यात्रा किये जा रहे हैं.

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  36. This comment has been removed by the author.

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  37. रोहित जी [बोले तो बिंदास] की टिप्पणी पढ़कर जो मन में है वह भी कह दूँ.
    बाद [आज] के पंडित लोगों ने भौगोलिक धर्म को ही शाश्वत धर्म का लबादा पहनाना शुरू कर दिया है. भौगोलिक और परिस्थितिवश अपनाए गए संस्कारों/ कार्यों को धार्मिक क्रिया-कलापों से जोड़कर देखना भी सर्वस्वीकृत धर्म के प्रति न्याय नहीं होगा.

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  38. yahan to kafi garma-garmi hai..behas chidi hui hai ..chaliye baat nikalegi to door talak jayegi :)soch ko ek naya aayam deti...post!

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  39. @प्रतुल
    सही कह रहो हो प्रतुल भाई..कारण कुछ भी हों.....अपने को स्वतंत्र रुप से उसे समझने और अपनाने की छूट है सनातन धर्म में.....कुछ रिवाज जुड़ जाते है भोगोलिक कारण से धार्मिक क्रियाकलापों में....इससे इनकार नही किया जा सकता। पर दुसरों के धर्म को गरियाना सिरे से ही गलत है। आपका इतिहास सही औऱ हम कहें तो पढ़ा पढ़ाया ..इसे मानने वाले सिरे से ही मूर्ख हैं। अपना सीधा सा धर्म है..उसमें अगर कुछ कुरतियां हैं तो उसे दूर करने के लिए सब संत प्रयास कर ही रहे हैं पिछले कई सदियों से....अनेक सदियों में जुटाए गए सुत्रों से धर्म बना....मगर फिर चिंतन की परिपाटी खत्म हो गई। अब धर्म के नाम पर जो चिंता है मारकाट है उसे दूर करना आवश्यक है...

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  40. स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

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  41. बहुत दिन से शांत हैं अमित ...स्वस्थ तो हैं ?

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  42. अमित भैया कहाँ हो ??

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  43. अमित, कहां हो भाई ? सतीश जी और गौरव की बात सुन कर भी नहीं बोल रहे ? मुझे चिन्ता हो रही है । ब्लॉग तो आगे पीछे लिखते रहना अभी अपना समाचार तो दो ।

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  44. आपको जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं अमित भाई

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  45. गौरव अग्रवाल को बहुत बहुत शुक्रिया कि उन्होंने तुम्हारी जन्मदिन के बारे में मेरे ब्लाग पर बताया, इससे उनका आपके प्रति स्नेह भी पता चलता है ! उम्र में बड़ा होने के कारण, मुझे तो इस क्षण आपके माता पिता याद आते हैं और लगता है वे बहुत सौभाग्यशाली हैं कि भगवान् ने उन्हें तुम्हारे जैसा पुत्र दिया !

    मैं बहुत कम आशीर्वाद शब्द प्रयोग करता हूँ ...अधिकतर स्थानों पर इस शब्द का उपयोग बेमानी ही होता है अतः महत्ता और शक्ति ही नहीं बची , मगर जितना मैंने महसूस किया, तुम्हें आशीर्वाद देकर मैं अपने आपको गौरव शाली समझ रहा हूँ !

    ईश्वर हमेशा तुम्हारे सहायक रहें बच्चे !

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  46. अब तो दर्शन दो महाराज

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  47. अमित जी,

    आपके ब्लोग पर कोई प्रतिक्रिया न देखकर आशंकाएं सर उठा रही है,
    कहिं और भी टिप्पणी से उपस्थिति दर्ज़ नहिं हो रही।
    कहां हो मित्र? दर्शन दो।

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  48. @अमित भाई
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जय श्री कृष्ण!

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  49. @ सतीश सक्सेना जी, गौरव अग्रवाल जी, विजय प्रकाश सिंहजी, पुष्पेन्द्र जी, सुज्ञ जी, विपुल जी ..... कुछ आपातकाल / विपदकाल घटनाओ की वजह से, कुछ व्यवसाय की व्यस्तता से आप लोगों से दूरी बन गयी है. जल्द ही आपकी सानिध्यता पूर्ववत प्राप्त करूँगा.

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  50. .
    सत्यमेव जयते!

    welcome back Amit ji.
    .

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  51. Welcome back Amit, we pray to God that you get all strength to overcome all the problems. It was heartening to get news about you, now I have no worries.

    Again wish you all the best.

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)