Thursday, June 24, 2010

"मर्द को दर्द नहीं" वाली मानसिकता ने समाज का सबसे ज्यादा अहित किया है.

क्या कभी ऐसे भी सोचा जा सकता है की "मर्द को दर्द नहीं" वाली मर्दानगी की मानसिकता ने समाज का सबसे ज्यादा अहित किया है. और अब महिला शशक्तिकरण  के कर्ण मधुर नारे से समाज में विद्रूपता फ़ैलाने की कोशिश की जा रही है.
ईश्वर ने जीव को उत्पन्न किया तो इस स्रष्टि का एक भी तत्व ऐसा नहीं जो जीव के स्वाभाव में ना हो. सद्गुण-दुर्गुण, प्रेम-कटुता, साहस-दुर्बलता,  आदि सारे गुण-कर्म नर-मादा दोनों में समान रूप से विद्यमान है. हाँ शारीरिक रूप से अनेक तत्व ऐसे हैं जी प्राकृतिक रूप से नर-मादा को भिन्न बनाते है. और समाज में कठोर और सरल कार्यों के विभाजन के लिए भी उत्तरदायी हुए है.
आदि काल में जीवन प्रवाह सहज रूपेण गतिशील था, समाज में अधिकारवादी मानसिकता का उदय नहीं हो पाया था, सो शासक-शोषित अबल-सबल का तो प्रश्न ही नहीं. फिर जब कालप्रवाह  में समाज का गठन हुआ कुछ सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के नियम बने. समाज स्त्री या पुरुष प्रधान ना होकर परिवार प्रधान बना, परिवार को ही समाज की प्राथमिक इकाई माना गया है. ना की स्त्री या पुरुष वर्ग को.
प्राकृतिक कारणों से नर को मिले सबल कठोर शारीरिक संरचना के कारण उसे श्रम साध्य कार्यों में प्रवृत्त होना पड़ा. जंगल साफ़ करके खेती लायक जमीन तैयार करना, खेती करना, आदि सारे कठोर कार्य उस पर आरोपित कर दिए गए और इस  जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक कठोरता को बनाये रखने के लिए पुरुष को हर समय यही  सिखलाया गया की एक पुरुष या शक्तिशाली पुरुष को  क्या करना चाहिये और क्या नहीं. समाज द्वारा यह निर्धारित कर दिया गया की पुरुषों को बलिष्ट, आक्रामक, हिम्मती, कठोर, ना झुकने वाला होना चाहिये. पुरुष को शारीरिक  और मानसिक रूप से सबल होना ही चाहिये, कमजोर तो कतई नहीं. उन्हें अपना अस्तित्व ऐसा निर्मित करना होता ही की दूसरे उनसे डरें. उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर होना होता है, और येन-केन प्रकरेण परिवार के भरण-पोषण के लिए आर्थिक सुरक्षा के साधन जुटाने होते है.  मर्द रोते नहीं हैं। मर्दों को दर्द नहीं होता। मर्द शर्माते नहीं हैं।
अगर हम निष्पक्ष भाव से विचार करें तो कुछ समझ में आ सकता है की इन सब बातों का दबाव बनाकर पुरुष का कितना शोषण सदियों से किया जा रहा है. पुरुष की प्राकृतिक रचनात्मकता और कोमलता को जबरदस्ती कुचलवाकर इस कदर मर्द बनने के लिए प्रेरित किया जाता है पुरुष अपने जीवन के सारे व्यवहारों को आक्रामकता और  लड़ाई-झगडे से ही पूर्ण करने की कोशिश करते है. 
अपनी सहज प्राकृतिक संवेदनाओ से परे पुरुष को केवल दिमाग से सोचने वाला एक मशीनी पुर्जा या एक कूकर बना दिया गया है जिसे जो सिखलाया जाता है वही करता है. जो पुरुष  अपने जीवन के सभी छोटे-बडे फैसलों में अपनी दिल की बात नहीं सुनते, केवल दिमाग से ही काम लेते हैं. क्योंकि आदमी इतनी क्रूरता से अपनी भावनाओं को कुचलते हैं वे असंवेदनशील व पत्थरदिल हो जाते हैं.  जाहिर है वे दूसरों की भावनाओं की भी परवाह नहीं करते.
अब पुरुष को इस झूंठी मर्दानगी से निकालकर सहज प्राकृतिक गुणों की और प्रेरित करने की बजाये नारी को भी भुलावे में डालकर उसी राह पर ज़बरदस्ती धकेला जा रहा है.
सच्चाई कडवी ही होती है समाज ना पुरुष प्रधान था ना स्त्री प्रधान.  समाज परिवार प्रधान समाज था, और अभी भी है. लेकिन  विकारों को आजादी का नाम देकर जिस तरह से अपनाये जाने की घिनोनी भेडचाल मची उससे सारा ढांचा ही भरभरा रहा है. विकार सब जगह मौजूद होते है. सहज प्राकृतिक गुणों से  विचलन के ही परिणाम है यह सब. शायद लड़ाई अपने को एक अलग इकाई मानकर प्रभुत्व स्थापित करने मात्र की है.

27 comments:

  1. बेशक मर्द को दर्द है होता,
    नामुराद जिन्दगी ऐसी कि,
    दिखला ही नहिं पाता,
    हिम्मत कर गर रो भी ले,
    कम्बखत कोई मरहम नहीं लगाता।

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  2. are baap re hamen to aaj hi pata chala मर्द को दर्द होता है

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  3. " मर्द को दर्द नहीं होता "
    ये बिलकुल सही है अमित भाई
    लेकिन एक शर्त है इसमें..... स्त्री का पूरा सहयोग ( मित्र की तरह) हो तो

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  4. समाज ना पुरुष प्रधान था ना स्त्री प्रधान. समाज परिवार प्रधान समाज था, और अभी भी है.

    बिलकुल सही है
    .. हर परिवार सौर परिवार की तरह होना चाहिए
    सूर्य की तरह अनुभवों उजाला देतें हैं माता पिता ( दादा दादी )
    पुत्र ,बहुएं ,पुत्रियाँ आदि ग्रहों की तरह उनके चारों और चक्कर लगाएं
    उनके पोते पोती चाँद की तरह अपने अपने ग्रहों ( माता पिता ) के चारों और घूमें तो कितना अच्छा हो

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  5. Apne apni baat prabhavi dhang se rakhi. bahut had tak sahmat.jahan tak baat samaaj ke swaroop ki hai to samaaj pariwar pradhan tha lekin pariwaar khud purush pradhan yani pitrasattatmak the isliye baat ek hi hai.aur iska nuksaan purush aur mahila dono ko hi hua hai.

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  6. सही अमित जी शब्द दर शब्द ..एक बार फिर आपने तुमुल घोष किया है -लोगों को इस परिप्रेक्ष्य में सोचना चाहिए ...

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  7. "....लेकिन विकारों को आजादी का नाम देकर जिस तरह से अपनाये जाने की घिनोनी भेडचाल मची उससे सारा ढांचा ही भरभरा रहा है...."


    इस बात से तो कोई भी असहमत नहीं होगा!असल बहस का मुद्दा भी यही होना चाहिए!क्यों हम विकारों को आज़ादी का नाम देने पर तुले हुए है!

    श्रेष्ठ कौन है? इसका उत्तर हम किस से ले रहे है और किसे दे रहे है?भगवान् श्री ने अर्धनारीश्वर का रूप सम्भवतः इसी असमंजस के नाश के लिए ही धरा होगा,पर हम जब भगवान् के इशारों को भी अनदेखा कर रहे है तो भला किसी ओर के बताने से तो क्या समझेंगे!

    हमारी ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो आज़ादी सिर्फ विकारों को ही मानते जा रहे है!क्या सच में कोई पीड़ित वर्ग है जो आज़ाद हो ही जाना चाहिए,या फिर यह कोई मानसिक विकृता भर है!मुझे लगता है हमें ऐसे विकारों से आज़ादी की जरुरतहै!


    हम ब्लॉग लिख-पढ़ रहे है तो स्वभावतः ही बुद्धिजीवी तो होने ही चाहिए.....और बुद्धिजीवियों में असहमति हो जाए किसी बात पर तो इस से भी सकारात्मक परिणाम ही आने चाहिए!एक सार्थक,निष्पक्ष और निर्णायक बहस के रूप में!लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की यदि आपने मेरी बात नहीं मानी तो मै आपके प्रति कटुता पाल लूँ,और एक निरर्थक बहस को जन्म दे दूँ!


    हमें कम से कम अपने प्रति जिम्मेवार तो होना ही चाहिए!और मेरे हिसाब से जो अपनी जिम्मेवारी को इमानदारी से निभा रहा है वो ही श्रेष्ठ हैमब चाहे वो पुरुष है या नारी,ये महत्त्व नहीं रखता!

    आप सभी शुभकामाए स्वीकार करे...
    कुंवर जी,

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  8. सटीक और सार्थक आलेख, आभार !

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  9. अमित जी बहुत ही अच्छा लिखा आपने. इससे ज्यादा क्या कहूँ. बढ़िया है.

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  10. और हाँ कुंवर जी और गौरव ने आपने कमेन्ट से अमित के लेख को विस्तार दिया है. ऐसे कमेन्ट किसी भी लेख पर कई सारे चाँद लगा देते हैं.

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  11. समाज परिवार प्रधान समाज था..... सच्ची बात.... बहुत अच्छी और सार्थक पोस्ट....

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  12. बहुत अच्‍छा आलेख, ऐसा लग रहा था कि मेरा ही कोई आलेख है। एक बात जोड़ना चाहूंगी कि प्रकृति ने स्‍त्री और पुरुष में सारे ही गुण डाले हैं लेकिन कुछ गुण की प्रखरता स्‍त्री में अधिक होती है और किसी की पुरुष में। जैसे ममता स्‍त्री में अधिक होती है और काम भाव पुरुष में। पुरुष को हमने इतना कठोर बनाकर पेश किया है कि वह बेचारा तो रो भी नहीं सकता। इसी कारण यह देखने में आता है कि कुछ लोग बात-बात में रोते हैं और लोग कहते हैं कि क्‍या औरतों की तरह रोता है?

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  13. अमित जी, आपके कथन से अक्षरश: सहमति है..
    समस्या का मूल कारण सिर्फ इतना है कि आधुनिक समाज में चाहे स्त्री हों या पुरूष दोनों अपनी मूल प्रकृ्ति को भूलकर एक दूसरे की नकल करने में लगे है. एक छोटा सा, और चन्द शब्दों में, इसका हल यही है कि पुरूष-पुरूष बना रहे और नारी- नारी । स्त्री स्वतंत्रता की घोषनाओं और अपनी सम्पूर्ण वाग्मिता के बीच आज की नारी पुरूष का अनुकरण-मात्र है । वह एक ओर तो अपने व्यक्तित्व की रक्षा की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर नारी से पुरूष बनने की राह पर बढती चली जा रही है । उसकी दृ्ष्टि अपनी अन्त:गरिमा पर नहीं वरन पुरुष के आचरण,क्रियाकलापों, उसकी उच्छृंख्लता पर है । और इसका अर्थ उसने यह समझा कि वह भी पुरूष के पथ पर अधिकाधिक तीव्र गति से भागने लगी है । वो ये नहीं जानती कि ये अंधी दौड उसे एक ऎसी दिशा में लिए जा रही है, जहाँ आगे चलकर उसका स्वयं का अस्तित्व ही लुप्त हो जाने वाला है । पुरूष बनने के चक्कर में वो अपने स्त्रीत्व को ही समाप्त करने पर तुली हुई है । शायद उसने यह मान लिया है कि पुरूष की नकल करने से ही उसकी दशा में सुधार हो सकता है।
    नारी जब तक यह नहीं समझती कि वह सिर्फ "रमणी" नहीं है, रमणी से कहीं पहले एक "माता" है, जिसने युगों से सभ्यता का दीपक लेकर उसे बुझने से बचाते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है, उसने मानव जाति को दया, ममता, मृ्दुलता और स्नेह का दान दिया है, तब तक नारी मुक्ति के नाम पर किया जा रहा ये सारा प्रपन्च ही हेय है......

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  14. @ सुज्ञ जी सारा मामला तो अपने इन पंक्तियों में ही बयां कर दिया !

    @ गौरव भाई आपकी कमेन्ट पोस्ट के अंतस में राह गयी बातों को भी बाहर निकल ले आने का काम कर रही है, धन्यवाद्

    @ राजन भाई महीन अध्यन से बात साफ़ हो जाएगी की पित्र्सत्तात्मकता जैसी बातें बाद में उत्पन्न हुयी थी. वैसे संयुक्त परिवारों में देखिये पुरुष प्रमुख ( पिता) की मृत्यु के बाद माता उस घर की प्रमुख हो जाती है. लेकिन जब सारे मानदंड ही गिरते जा रहे है किस किस का बखान किया जाये.

    @ अरविन्द मिश्रा जी लोग सोचने को तैयार हो तब ना.........

    @ मेरे हिसाब से जो अपनी जिम्मेवारी को इमानदारी से निभा रहा है वो ही श्रेष्ठ है........................ कुंवरजी बिलकुल सही कहा आपने

    @ शिवम् मिश्रा जी, विचारीजी, महफूज भाईजी कोशिश करूँगा की आपके अपने प्रति इन शिवमय ( कल्याणकारी ) विचारों को हमेशा महफूज़ रख पाऊ. धनयावाद

    @ ऐसा लग रहा था कि मेरा ही कोई आलेख है.............. मातोश्री बालक धन्य हुआ

    @ नारी जब तक यह नहीं समझती कि वह सिर्फ "रमणी" नहीं है, रमणी से कहीं पहले एक "माता" है, जिसने युगों से सभ्यता का दीपक लेकर उसे बुझने से बचाते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है, उसने मानव जाति को दया, ममता, मृ्दुलता और स्नेह का दान दिया है, तब तक नारी मुक्ति के नाम पर किया जा रहा ये सारा प्रपन्च ही हेय है............. पंडितजी अब तक के इस विषय पर रखे गए मेरे विचारों में कहीं ये छूट रहा था शायद आपने कमी पूरी कर दी. आभारी हूँ

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  15. अमितजी काफी दिनों तक ब्लॉगपुरी में नहीं आना हो पाया. आज आकर देखा तो काफी कुछ उठापठक दिखी. सबसे बड़ी बाट तो ब्लाग वाणी का बंद होना लग रहा है मुझे तो, सही कहते है मरने के बाद कुछ दिनों तक आदमीं याद अत है फिर सब भूल जाते है. ब्लोग्वानी को भी अब कोई याद करता नहीं दिख रहा है. सारा मजा ही कर्किरा हो गया है.
    और आप तो एक्सप्रेस गति से ही विचार परिकर में लगे है. ज्यादा ध्यान से तो रात में पढूंगा पर जितना समझ पाया हूँ उस हिसाब से आपकी बाट से सहमत हूँ की पुरुष प्रधान स्त्रिप्रधान कुछ नहीं है. एक बव्लापना है. परिवार अपने आप में एक यूनिट है जो स्त्री पुरस के मेल से बनती है फिर किसी आजाद होना और किसको निचा दिखाना काफी धमाकेदार लेख एक से बढ़कर एक लिखे है आपने मई इतने दिन नहीं पध्पाया अब करार निकालूँगा. महाराणा प्रतापजी पे तो क्या तेजस्वी कविता लिखी आपने. मजा आगया.

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  16. 'महिला सशक्तिकरण' पुरुषों को नीचा दिखाने के लिये है और कुछ नहीं. परिवार ही समाज की इकाई था, है और रहेगा. जो इसे नहीं मानेगा, विश्वास मानिए कि वह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है और एक दिन उसका ही अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.

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  17. जय भीम आपने बाबा साहब का साहित्य पढ़ा है

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  18. अमित जी, बहुत दिनो से ब्लॉग दुनिया से दूर था समयाभाव के कारण । आपका लेख पढ़ा , बहुत ही सामयिक और सही मुद्दा उठाया आपने , बधाई ।

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  19. Bhai ji Aaj to Khari kahri baat or itne sateek Head line ne dil jeet liya.

    Aage bhi yhu hi likthe rahe hamari subhkamnaye aapke sath hai.

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  20. समाज परिवार प्रधान समाज था, और अभी भी है.
    आज सारा ढांचा भरभरा रहा है, परिवार के प्रति जो समर्पण होना चाहिए (पुरुष और स्त्री दोनों का) इसकी कमी हो गयी है आज.
    किसी नए दिशा में उन्मुख हो चले हैं सभी. इतना तय है की उस नए दिशा में राहत और शान्ति मुश्किल है.

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  21. ...पुरुष की प्राकृतिक रचनात्मकता और कोमलता को जबरदस्ती कुचलवाकर इस कदर मर्द बनने के लिए प्रेरित किया जाता है पुरुष अपने जीवन के सारे व्यवहारों को आक्रामकता और लड़ाई-झगडे से ही पूर्ण करने की कोशिश करते है. ....

    purush athwa nari dono ki purnta 'komal' banne mein nahi...balki ,komal bhawon ko jaga dene mein hai..

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  22. @ पुश्पेंद्रजी आपकी व्यस्तता मैं समझ पा रहा हूँ, धन्यवाद

    @ राजीवजी , विजय प्रकाशजी, हेमंतजी, सुलभजी धन्यवाद

    @ दिव्याजी "पुरुष की प्राकृतिक रचनात्मकता और कोमलता" से आशय उसकी प्राकृतिक स्वरूपता से ही है जिसमें शारीरिक के साथ मानसिक भावनाए भी निहित है. आवश्यक निर्देशन के लिए धन्यवाद

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  23. सत्य और गौतम का आश्रय लेकर फिरने वाले आप महानुभाव गौतम की साक्षी में अपने सत्य को उद्घाटित करके संवाद करें तो बेहतर होगा.......

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  24. ये सही है कि आज भी नारी की दशा गाँवों मे बदतर है लेकिन इसका ये भी मतलव नही कि क्सूर सिर्फ पुरुश का ही है। मगर पुरुष का पति होने का दायित्व बनता है कि पत्नि की सहभागिता परिवार मे रख कर ही चले यहाँ ऐसा नही होता वहां ही झगडा होता है और झगडे मे तो पुरुष ही विजयी होता है। गहरे मे जा कर देखें तो परिवार मे औरत की सहभागिता न होना ही नारी मुक्ति या नारी सश्क्तिकरण का मार्ग बना । लेकिन ये भी तमाशा बन कर रह गया न कोई दिशा न ही दशा। सभी औरतें नही चाहती कि उन्हें नौकरी करनी पडे वो अपने बच्चों को सही तरीके से पालना चाहती हैं मगर उसकी घर मे सहभागिता न होने से उसे यही मार्ग दिखाई देता है{सब को नही} आपकी बात सही है औरतें तो रो कर भी अपना दुख कम कर लेती हैं मगर आदमी अन्दर ही घुट कर रह जाता है। अगर दोनो ही घर मे संतुलन बना कर और आदमी अपना अंह त्याग कर घर चलायें तो शायद दोनो की समस्या हल हो जाये। इस बात से कोई इन्कार नही कर सकता कि पुरुष के अंह ने नारी को सदा कुचला है-- बस यही जड है समस्या की। शुभकामनायें

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  25. इसी समस्या के समाधान को खोजने हेतु एक लेख लिखा है
    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/06/blog-post_29.html

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  26. kya main apne vichar yahan vyakt kar sakti hoon??

    Ritu Khetan, Guwahati

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  27. जी जरूर कर सकतीं है

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)