Sunday, June 20, 2010

नारी स्वतंत्रता की बात करने वालों ने, अभिवक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटा------------------ अमित शर्मा

मेरी पिछली पोस्ट मैंने सुलझे मन से कुछ महिला अधिकारवादियों के अति हाहाकारी प्रलाप के विषय में की थी जिसके अंतर्गत वे लोग नारी समाज की सारी समस्याओं  और परेशानियों के लिए बेधड़क सारे पुरुष समाज को दोषी ठहरा देते  है. ऐसा करने में वे अपने आप को नारी स्वतंत्रता का बिगुल फूंकती से महसूस करते है.  पुरुष समाज पर लानत-मलालत करते हुए वे अपने विचार वक्त करने की आज़ादी का पुरा ख्याल रखते है. कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जब फिर कोई अपनी सहज वृत्ति से इनसे कुछ नम्र शब्दों में पूछ ले तो फिर वही अभिवक्ति की आजादी ना जाने  कहाँ बंदिनी बना ली जाती है मेरी पोस्ट पे आदरणीय मिश्राजी ने निम्न कमेन्ट की थी -----

 Arvind Mishra said...
अमित जी ,कुछ महिलाओं ने दुर्भाग्यवश अपनी निजी जन्दगी के दुखद तजुर्बों को पूरे ब्लॉग जगत पर लाद दिया है !
Anonymous said...
waah arvind mishra kaa kament nahin delte kiya aur mera kar diya yae hii purush vaadi maansiktaa aakthu arivnd mishra aur tum dono par jo mhila blogger ki nij ki ziandgi par aaaye kament ko chhaptey ho

Anonymous said...
pataa nahin arvind mishra kitnii mahilaa blogger ki nij ki zindgi ko jaantey haen aaku thu haen aese kament par aur tum par bhi
प्रिय डॉ मिश्र
आप का ये कमेन्ट यहाँ देखा । जानने कि बड़ी इच्छा हैं कि कितनी महिलाओं ने जो हिंदी मे ब्लॉग लिखती हैं आप से अपनी निजी जिन्दगी के अनुभवों / दुखद तजुर्बों को बांटा हैं


मेरे ब्लॉग पे बेनामी की टिपण्णी के शब्द और नारी पे अरविन्द जी को लिखे इए पत्र के यह शब्द    
इन शब्दों को पढने से पता चल रहा है की दोनों जगह एक ही शख्श  ने एक ही भावना से लिखा है क्या यही है नारी उत्थान का तरीका जो बेनामी बनकर थूंका जाये !!!!!!!!!!!!!!!!  किसी भी संवाद को संवाद ही क्यों नहीं रहने दिया जाता है. हाहाकार क्यों मच जाता है, मैंने भी तो आप सभी महिला वर्ग के लिए कुछ नहीं कहा था, सिर्फ "कुछ नारी अधिकारवादियों" का उल्लेख किया था, तो इसमें स्त्री विरोधी लेखन कहाँ से हो गया यह. इतना ही तो कहने की कोशिश की थी की सारे वर्ग को लपेटे में क्यों लिया जाता है. इस "नारी" ब्लॉग की अधिकतर पोस्टों को ही अगर दूसरे ग्रह से आया कोई प्राणी पढ़ ले तो, धरती के पुरुष समाज को कितना क्रूर जानवर मानकर अपने ग्रह लौटेगा भगवान मालिक है. और इस ब्लॉग पर मेरे द्वारा की गयी टिपण्णी को भी डिलीट कर दिया गया है.  और जब इस ब्लॉग पर जाने की कोशिस कर रहा हूँ तो यह सन्देश मिल रहा है -----

यह ब्लॉग मात्र आमंत्रित पाठकों के लिए है


http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/


लगता है आपको इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है. अगर आपको लगता है कि कोई गलती हुई है, तो आप ब्लॉग के लेखक से संपर्क कर एक आमंत्रण के लिए अनुरोध कर सकते हैं.

आपने 28amitsharma@gmail.com के रूप में साइन इन किया है- किसी और खाते के साथ साइन इन करें

तो इस प्रकार की है स्वतंत्रता की आवाज़ उतने वालों की स्वतंत्रता के प्रति मानसिकता !!!!!!!!!!! कैसे इनके प्रति संदेह पैदा ना हो की ये सिर्फ फ्रस्टेशन के शिकार है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
ज्यादा ना लिख कर आज फिर पूछना चाहता हूँ की महिला अधिकारवादियों ने इस प्रकार छिप  कर गलियां क्यों निकाली  एक वरिष्ठ ब्लोगर को.......................... एक स्वस्थ चर्चा  में भाग ना लेकर कमेन्ट को डिलीट और ब्लॉग  को प्रतिबंधित क्यों बनाया!!!!!!!!!!!!!!!!

30 comments:

  1. Kya bat hai ,

    Dubai Main Mahilawo ne Salary per Husband rakh rahi hai

    Padhiye Firdaush ji ka le

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  2. अमित जी क्या बात है भाई मेरे साथ भी यही अन्याय हुआ है. मैं भी उस ब्लॉग का शत्रु हो गया. ऐसा पहली बार हुआ है मेरे साथ. ये सब आपकी बात का समर्थन करने की वजह से हो गया है. अगर मैं अपने विचार रख देता तो क्या होता? शायद मुझे तो ब्लॉग्गिंग से ही प्रतिबंधित कर दिया जाता. हा हा हा हा .....

    मैंने कहा था ना संवेदनशील मामला है? ये तो अति संवेदनशील मामला निकला.

    ये सारे पढ़े लिखे गुनी लोग हैं. हा हा हा........

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  3. अमित जी, मैं भी स्तब्ध और दुखी हूँ -मेरे ही नाम खुला पत्र है और मुझे ही कुछ कहने की पाबंदी है -नारी ब्लॉग बार बार दिखा रहा है की वह पंजीकृत पाठकों के लिए ही उपलब्ध है -इस ब्लागजगत में कितनी ही सम्माननीय /प्रतिभाशाली महिलायें हैं -मैंने कई आदरणीय महिलाओं को अपने ब्लॉग के चिट्ठाकार स्तम्भ में सम्मिलित किया है -बस यहे दो तीन लोग हैं जो परले दर्जे की पुरुष निंदक हैं और समाज में कटुता घोल रही हैं -इनका तिरस्कार ही किया जाना चाहिए -अब बैंड बैगन में कोई अन्गुलिमाला भी घुस आयी हैं और अंगुलिमाल की दहशतनाक यादें ताजा कर रही हैं !
    हे माहात्मा बुद्ध इन्हें सद्बुद्धि देना !

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  4. भवतां प्रयास: सफलीभूत: ।

    यावत् जना: दुराचरिष्‍यन्ति, तावत् एव भवत: उन्‍नति: इति मे कामना: ।।

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  5. भैये, इस सब से दूर ही रहो... इस तरह के वाद-विवादों से आपकी ऊर्जा निरर्थक ही व्यय होगी..

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  6. मैं थोडा सा Indian Citizen की बात से भिन्न मत रखता हूँ. यहाँ कोई व्यर्थ का बाद विवाद नहीं था. अमित ने सिर्फ अपने विचार रखे थे. अगर कोई इनसे सहमत नहीं है तो वो अपनी बात समझदार लोगों की तरह से प्रकट कर सकता है. ये भी क्या तरीका हुआ की खुला पत्र लिखा पर कोई उसे पढ़ ही ना पाए. आप अपनी बात तो खुल कर कह दें और जब दूसरा अपनी बात कहे तो बुरा मान जाएँ. अमित जी ने एक सही बात बहुत बेहतरीन ढंग से कही और मैं हमेशा उनका समर्थन करूँगा.

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  7. आप सभी का आभार व्यक्त करते हुए एक बार फिर यह निवेदित करना चाहुंगा की मैंने ये पोस्ट लिखते हुए पहले ही साफ़ कर दिया था की "मैं यहाँ स्त्री बुरी या पुरुष भला का राग अलापने नहीं बैठा हूँ." सारी बुराई मानवता के पतन की है, किसी एक विषय नारी शोषण, बाल मजदूरी या शोषण, दहेज़, भ्रष्ठाचार, या देश द्रोह किसी भी एक समस्या के लिए किसी भी एक वर्ग मात्र को दोषी नहीं ठराया जा सकता है. जो दुर्गुण सार्भौमिक है, उन्ही के विरुद्ध आवाज़ उठनी चाहिये. किसी एक समाश्या के लिए सारे वर्ग को दोषी ठहरा देना नयोचित नहीं कहा जा सकता है.
    जिस प्रकार आतंकवाद के लिए सारे मुश्लिम समाज को, या फिर नक्सलवादी हिंसा के लिए सारे आदिवाशियों को दोषी नहीं बताया जा सकता है .
    लेकिन जब किसी भी एक समाश्या के लिए काम करने वाले, लेखन करने वाले सारी समस्या के लिए विपरीत वर्ग को समूल दोषी ठहरा जाते है तो बात मन को कचोटती है.

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  8. @विचारीजी मामले को सहज ही ना लेकर पता नही क्यों हायतौबा मचाकर संवेदनशील बना दिया जाता है,फिर विवादों से संवेदनशील मुद्दों से दूरी बनाये रखने की प्रकृति भी सहजता को निगलने का काम कर जाती है. आपके समर्थन की लाज रख पाऊं हमेशा यही आशीर्वाद दीजियेगा.

    @ मिश्राजी ना दुखी होइए ना स्तब्ध कुछ अतिवादियों की मानसिकता इसी तरह उजागर होती है. मेरे ब्लॉग पर कोई आप के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर गया, इस बात के लिए दिल से माफ़ी चाहता हूँ.
    @ नागरिक जी आपका बहुत आभारी हूँ की आपने मेरे अपने बुजुर्ग की भांति समझाया है, अनुसरण करने की भरसक कोशिश करूँगा. और जैसा की विचारी जी ने भी कहा व्यर्थ का वाद-विवाद खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं थी सिर्फ कुछ अतिवादियों के प्रलाप के विषय में कहना चाहा था.

    @ गिरी जी , आनंद जी आपका आभार की आपने मेरे मन की बात समझी

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  9. अमित जी,
    समस्याओं को एक दूसरे पह्लू से,दृष्टिकोण से समझने का प्रयास ही करने से इन्कार कर देना दुखद है,कुछ लोगों ने महिला अधिकारों की समस्या को भी साम्यवादी हठ बना लिया है।

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  10. Amit bhai,mujhe nahi lagta unhe apse koi dikkat thi.apse to kewal asahmati thi. jahan tak baat hai arvind ji ki to mahilaon ke bare me wo rudhiwadi soch hi rakhte hai.upar aaye cmnt. me to unhone shaleenta ki sari haden paar kar di hai.ise kya kahenge? h

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  11. virodh,asahmati,alochna,bahishkar aadi to samajh me bhi aate hai.lekin agar mahilayen apse asahmat ho to unka tiraskaar???? wah bhaiya.dhanya hai aisi soch. g

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  12. अमित जी ,ऐसा मामला तो पहले भी कई बार हो चुका है कि इसी तरह की खास पोस्टों पर प्रतिक्रिया देने से आम पाठकों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है , बल्कि कहूं कि ये एक खास शैली ही अपनाई जाती रही है , इसलिए आश्चर्य की कोई बात नहीं है । आपने महिला पुरूष को विषय के रूप में चुना , और ये प्रतिफ़ल मिला तो ये तो अपेक्षित ही था कुछ कुछ । कहने को तो बहुत कुछ था आपकी पिछली पोस्ट पर भी और इस पर भी मगर छोडिए । आप बेनामी विकल्प को बंद कर लें तो ठीक रहेगा , वो जमाने लद गए जब बेनामी टिप्पणियां कुछ सार्थकता लिए होती थीं अब सिर्फ़ दूसरों को गलियाने के लिए की जाती हैं ।

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  13. I have gone through the amit sharma,s blog and comments of others as well. What i think in this issue is - Husband/ father / Son is giving love and affection to their family and wife / mother / daughter getting love or affection depends on the understanding and SANSKAR of these family members, with they are getting from their family, friends or society. The moral values in the heart of that prson is the deriving the persons behaviour.

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  14. राजन जी अगर मुझसे कोई दिक्कत नहीं थी तो मेरे कमेन्ट को डिलीट क्यों किया गया था वहाँ, और फिर उसके बाद ब्लॉग को ही बंद कर दिया गया. आपकी कमेन्ट से पहले मेरी कमेन्ट थी सातवें नम्बर पर!!!!!!!!! और जो
    आपने कहा की बहिष्कार आदि तो ठीक है, पर तिरस्कार!!!!! तो मेरी जानकारी अनुसार बहिष्कार का अर्थ होता है--- बाहर करना, निकालना, अलग या दूर करना, हटाना.
    और तिरस्कार - वह स्थिति जिसमें उपयुक्त स्वागत सत्कार आदि न किये जाने के फलस्वरूप आपने को अपमानित समझता हो, भर्त्सना, आदि होता है. तो उस ब्लॉग पर मेरे विषय में कमेन्ट थी उसका भी यही भाव था और श्री अरविन्द मिश्रा जी का भी यही भाव था तिरस्कार से. मैं फिर से कहना चाहता हूँ की शब्दों का एक ही अर्थ रुढ़ क्यों किया जाता है, जो की सिर्फ खुद को पता हो जैसा की आपको शायद तिरस्कार का अर्थ "वह मनोबाव जो किसी को निकृष्ट या हेय समझने के कारण उत्पन्न होता है और उसका अनादर करने को प्रवृत्त करता है" जैसा ही कुछ समझ रखा होगा.

    @ सुज्ञ जी आप सही कह रहे है किशी भी विषय को "वाद" की मानसिकता से जैसे ही तौलना शुरू होगा वैसे ही उसके साथ विवाद अवशम्भावी हो जायेगा.

    @ झा जी आपके बहुत कुछ वाले विचारों को जानने की बहुत जिज्ञासा हो रही है. आप जैसे प्रबुद्ध मनीषियों से जितना सीखने को मिले उतना ही कम है इसलिए अगर को अभी समय की कमी हो तो जब भी समय मिले फुर्सत में मेल द्वारा अवगत करवाने का कस्ट करें. आपके बेनामी वाले सुझाव पर अमल करने की कोशिश करूँगा ,बस कुछ अटक जाता है मन में

    @ हेमंत जी अपने विचारों से अवगत करने के लिए धन्यवाद

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  15. अमित जी, हमें तो लगता है कि शायद आजकल कुछ तथाकथित सुधारवादियों द्वारा नारी के कष्टों,उसके अधिकारों की कथाएँ बाँचने का कोई फैशन ही बन गया है. जब कि पुरूष हो या स्त्री समस्याएं दोनों ओर हैं। जब तक दोनों की समस्याएं अलग अलग रहेंगी ओर नारी अपनी सुविधा,सुख और अधिकार की पुकार में पुरूष को भूली रहेगी ओर जब तक पुरूष नारी की उपेक्षा करता रहेगा, तब तक गृ्हस्थ जीवन और सामाजिक स्थिति दोनों ही निराशाजनक, निरानन्द और नि:सत्व रहने वाली है। चाहे कोई नारी मुक्ति के नाम पर लाख चीखते चिल्लाते रहें । एक की कठिनाईयों को अतिरंजित करके, दूसरे को गाली देने से समाज सुखी नहीं हो सकता ओर न ही नारी की ही दशा में कुछ सुधार हो सकता है । होगा तो दोनों की समस्याओं को समझने ओर एक दूसरे के प्रति उदार दृ्ष्टि रखने से ही।
    दरअसल इन सब के पीछे असली दोष है हमारी शिक्षा और पश्चिम परस्ती का. पश्चिम जो कुछ हमारे कानों में डालता जाता है, उसे हम तोते की तरह से रटते और उगल देते हैं । कुछ रटी शब्दावलियाँ, कुछ ढले हुए तर्क और कर्तव्यों को भूलकर सिर्फ अपने अधिकारों की बातें----बस ले देकर यही हमारी पूंजी है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि नारी मुक्ति का झंडा उठाए फिरने वाली ये सुधार(प्रपंच)वादी स्त्रियाँ न सिर्फ दाम्पत्य जीवन को बर्बाद करने पे तुली हुई हैं वरन परिवार एवं समाज के बीच की कर्तव्यश्रृंखला भी शिथिल की जा रही है।

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  16. amit bhai,
    maine bhi apka comment wahan dekha tha.jise baad me hata liya gaya.yah bhi galat hai.sabhi ko apni baat kahne ka hak hona chahiye.lekin jo prashan uthaye gaye the wo apni jagah sahi the.
    mishra ji ke sath dikkat ye hai ki we bhasha par adhikar hi khatam kar dete hai.aur galiyon par utar aate hain.afsos ki apne bhi 'tiraskar'jaise mudde par unka sath diya apse aisi ummeed nahi thi.
    anshumala ji ne to koi galat baat bhi nahi kahi thi phir bhi unhe ungali-mala kaha jaa raha hai.ab is shabd ka kya arth nikalenge aap.

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  17. @दरअसल इन सब के पीछे असली दोष है हमारी शिक्षा और पश्चिम परस्ती का. पश्चिम जो कुछ हमारे कानों में डालता जाता है, उसे हम तोते की तरह से रटते और उगल देते हैं । कुछ रटी शब्दावलियाँ, कुछ ढले हुए तर्क और कर्तव्यों को भूलकर सिर्फ अपने अधिकारों की बातें----बस ले देकर यही हमारी पूंजी है।
    पंडितजी यही तो समस्या का मूल है. एक समझोता हो जाना चाहिये, स्त्री-पुरुष के लिए निर्धारित कार्यों का हस्तांतरण हो जाये आपस में. लेकिन फिर भी कोई समाश्या बनी रहेगी तो किसे दोष देंगे ये ??? जो व्यवस्था निर्धारित है उससे विचलन का ही परिणाम है यह सब.

    @ राजन जी, मुझे इस बात का बिलकुल अनुमान नहीं है की अन्शुमलाजी को ही अन्गुलिमाला नाम से संबोधित किया गया है. इस बारे में तो मिश्राजी को ही स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये की जिन अन्गुलिमाला का उन्होंने संकेत किया है, क्या वोह अन्गुलिमालाजी के लिए है.
    बाकी निजी अनुभवों को लड़ने वाली बात से तो मैं यही समझ पाया हूँ की उन्होंने किन्ही महिलाओं द्वारा अपने ऊपर हुए घरेलु(दम्पत्याजिवन) के अनुभवों को आधार बना कर यह तानाबाना ज्यादा बुना है.
    इस बात में कुछ भी किन्तु-परन्तु की कोई गुन्जायिश नहीं है की महिलाओं के साथ ज्यद्द्ती नहीं होती है. लेकिन सास-बहु, देवरानी-जेठानी, ननद-भाभी के रूप में ही ज्यादा मामले सामने आते है, पति तो माँ और पत्नी के बीच एन ही संतुलन साधने में अपनी समग्र उर्जा प्रवाहित करता रहता है. फिर सारा दोष पुरुष का ही क्यों. दोष तो अधिकारवादी मानसिकता का है जो सास बहु को सता पाती है वही बुढ़ापे में बहु से दुःख भी पाती है. अध्यन इस का क्यों नहीं होता की अत्याचार किस वर्ग द्वारा होता है, समाश्या समाज की है ना की वर्ग विशेष की.

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  18. Conditioning of Mind Do you have any idea what it is ??

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  19. अनाम ने केवल और केवल एक सच कहा और जो वो करता / करती उसको शब्द दिया यानी आक थू , और आपने पूरी पोस्ट बना दी । आप को उसमे अरविन्द मिश्र के लिये अपशब्द भी दिख गए , आप ने माफ़ी भी मांग ली वाह
    लेकिन कितनी आसानी से आप ने अंशुमाला के लिये दिये हुए अपशब्दों को डॉ मिश्र के कमेंट मे ना समझने का अभिनय भी लिया जिसको राजन ने आप को बतलाया भी हैं । यही हैं डॉ मिश्र कि सोच जो दूसरो को जब चाहे गाली दे सकते हैं । नारी ब्लॉग खुला था तब भी परेशानी थी बंद हो गया तब भी परेशानी हैं । वाह !

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  20. ये सब बहसें ऐसी हैं जहां अपनी सोच के अनुसार जितने चाहिये उससे दोगुने तर्क जुटा सकते हैं बहस करने वाले लोग। स्त्री समाज और पुरुष समाज के कोई आंकड़े हीं हैं मेरे पास लेकिन अपनी आज तक की जिन्दगी के अनुभव के आधार पर यह तय करने में मुझे कोई दुविधा नहीं है कि स्त्री की स्थिति (कम से कम अपने देश में) दोयम दर्जे की ही है। महिलायें असुरक्षित हैं। उनकी जिंदगी पुरुषों के जीवन मुकाबले कठिन है।

    जो महिलायें आगे आ रही हैं उसमें उनका, समाज का और अच्छी सोच वालों का योगदान है।

    दो-चार , घर-परिवार ,आस-पास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां महिलायें खुशहाल दिखें लेकिन इन चन्द उदाहरणों को पूरे समाज पर समाकलित( इंट्रीग्रेट ) करके देखना कुछ ऐसा ही है कि स्थिति चाहे जैसी हो लेकिन परिणाम वही है जो हम मानते हैं।

    ब्लॉग जगत में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। यहां भी इसी समाज के ही लोग आते हैं। अपने पांच साल से अधिक के ब्लॉग जगत के अनुभव के आधार पर मेरा मानना है : ब्लॉगजगत में महिलाओं को तब तक बड़ी इज्जत और सम्मान के भाव से देखा जाता है जब तक अपनी सीमा में रहें। सीमा से बाहर निकलते ही उनके साथ लम्पटता शुरू हो जाती है। मजे की बात यह है सीमा तय करने की जिम्मेदारी भी लम्पट लोग ही निभाते हैं।

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  21. .....to 'naari' blog band ho gaya.chokherbali aur naari jaise blog bahut samay se blogjagat ki ankhon ki kirkiri bane hue hai.' naari' ki sutradhar rachna ji ne stree ko vastu samajhne wali mansikta ko hamesha danke ki chot par chunoti di hai.fir samne chahe arvind mishra ji ho ya mithlesh dubey.wo kabhi jhuki nahi,kabhi dari nahi.aisi saahsi mahila yun hi apne kadam piche nahi kheench sakti.sujata ji,mukti ji,rekha ji aur bhi na jane kitne log inhe maan dete hai.in sabke samne main to unka adna sa prashanshak hu.'naari' ke band hone se mujhe dukh pahuncha hai.@rachna ji, main janta hu ki pure blnogjagat me kewal aap hi aisi mahila hai jise purush kabhi sahan hi nahi kar sake.kaaran hai apki saafgoi.aap kai baar jab kadua sach{apki dusri aurat wali kavita} kahti hai to wo mahilaon ko bhi chubh jata hai.jahir hai aap mahilaon ka samarthan bhi kfewal isliye nahi karti ki wo mahilayen hai.lekin kam se kam itna to bata dijiye 'naari' ko jari rakhengi ya nahi?.......qs

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  22. amit bhai, aap mere cmnt. ko yahan bane rahne de plz.kyoki kuch sawal to hai hi.main naam lekar kuch nahi kahna chahta tha par kahna pada.jo kuch bhi j maine upar likha hai vah mahaj bhavavesh nahi tha.yah sab to maine dekha hai.agar aap naari jaise blog ko regular padhte to samajh pate ki mahilaon ka purusho ke prati akrosh bina vajah nahi hai.rachna ji jaisa sochti hai kah deti hai bina lag lapet ke.phir bhi blog apka hai.aap chahe to mera cmnt. hata bhi sakte hai.aur agar unhone apatti jatai to main khud inh e delete kar dunga. thanx

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  23. अमित जी ,
    यह सही है कि अंशुमाला के नाम से मुझे अंगुलिमाल की याद आ गयी -जिसे वध किये किये गए लोगों की अंगुली माला में पिरो कर पहनने की आदत थी ...और बाद में महात्मा बुद्ध से मिलने के उपरान्त ह्रदय परिवर्तन के उपरान्त वह एक संत हुआ ..अंशुमाला जी पुरुषों को लेकर जिस तरह दुर्भावनापूर्ण लेखन कर रही हैं -यह उपमा स्वयमेव ही मेरे मन में आयी .अनजाने चूक मुझसे यह हुयी कि (संभव है भाव प्रबलता के कारण ) अंशुमाला की जगह मैं अंगुलिमाला लिख बैठा जिसके लिए मुझे खेद है और मैं अंशुमाला जी से व्यक्तिगत क्षमा मांगता हूँ ...मगर अंगुलिमाल प्रकरण के निहितार्थ को भी समझा जाना चाहिए ..यह भी कहना चाहता हूँ कि पुरुषों को लेकर इस तरह का दुर्भावानापूर्ण लेखन बहुत घटिया है -इन्हें चाहिए कि वे अपनी ऊर्जा और सृजनात्मक लेखन में प्रवृत्त करें -काश इन लोगों के ह्रदय परिवर्तन के लिए फिर से किसी बुद्ध का आविर्भाव हो जाता लेकिन जब तक अनूप शुक्ल जी जैसे नारी सलाहकार ब्लॉग जगत में मौजूद हैं ऐसा संभव नहीं दीखता जो अपने ही साथियों के लिए लम्पट जैसे अत्यंत आपतिजनक शब्द का प्रयोग करते हैं और ब्लॉग- नारियों के सामने खुद को ब्लॉग नर पुंगव (नर श्रेष्ठ ) के रूप में प्रस्तुत रखने की हास्यास्पद मानसिकता रखते हैं ...मैं उनसे आपके ब्लॉग पर नहीं अन्यत्र निपटता ही चलूँगा .....

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  24. कमेन्ट मोडरेशन ब्लॉग मालिक का अधिकार हैं और इसको वो जब चाहे उपयोग कर सकता हैं ।
    आप ने अनाम का आप्शन खुला रखा हैं आप का अधिकार हैं , मै अनाम कमेन्ट दूँ मेरा अधिकार हैं ।
    नारी ब्लॉग पर कभी नारी की स्वतंत्रता कि बात नहीं हुई हैं नारी की समानता कि बात हुई हैं वो समानता जो कानून और संविधान से सब को मिलती हैं । नारी स्वतंत्र हैं और हमेशा रहेगी पर ये बात आप नहीं समझ सकते क्युकी आप को नारी की परतंत्रता मे ही रूचि हैं ।
    अभ्यिव्यकी की स्वंत्रता का मतलब क्या हैं ?? नाम के भ्रम फैलाने वाले कमेन्ट दो ?? मिश्र जी के कमेन्ट से आप ने समझा "बाकी निजी अनुभवों को लड़ने वाली बात से तो मैं यही समझ पाया हूँ की उन्होंने किन्ही महिलाओं द्वारा अपने ऊपर हुए घरेलु(दम्पत्याजिवन) के अनुभवों को आधार बना कर यह तानाबाना ज्यादा बुना है."

    इस समझ के हिसाब किताब से चले तो जितनी भी महिला ब्लॉगर हैं क्युकी मिश्र जी का कमेन्ट महिला ब्लॉगर के लिये था , और उनमे जो विवाहित हैं , उन मे से कुछ का दाम्पत्य जीवन ख़राब हैं और इस लिये वो विषाक्त लिख रही हैं ??

    प्रश्न वही रहा ना कौन हैं ?? क्यूँ इस भ्रम को उपजाया गया । क्या उन मे से हैं जिनका चित्रण मिश्र जी के ब्लॉग पर हैं ?? ऐसे निराधार कमेन्ट ही ब्लॉग जगत मे महिला के प्रति अनादर को जन्म दे रहे है और जिसके खिलाफ नारी ब्लॉग पर लिखा जाता हैं

    अब रही बात अनादर करके माफ़ी माँगने की तो क्या इससे कोई फरक पड़ जायेगा लोगो ने तो एक महिला ब्लॉगर को रेड लाईट एरिया खोल लो तक कहा और माफ़ी मांग ली बाद मे पर[इस से क्या उनका अपराध कम हुआ ।

    आप का ब्लॉग आप का हैं आप जो कमेन्ट चाहे रखे , चाहे छापे , चाहे डिलीट करे ये आप का अधिकार हैं पर मेरी आप से एक विनती जरुर हैं अगर आप के घर मे आप की कोई बहिन हैं तो एक बार प्रुरा प्रकरण उसको बताये और उस से पूछे क्या उसको लगता हैं की नारी की समानता की बात करना गलत हैं , क्या बुरे को बुरा कहना गलत हैं , बहिन ना हो तो अपनी माँ के साथ बैठ कर पुच्चाए माँ इस समाज मे क्या औरत बराबर हैं और क्या उसको होना चाहिये ।
    वो जो जवाब दे उसको निसंकोच पोस्ट कर दे ।

    नारी को देवी बना कर पूजने से बेहतर हैं की आप उसको इंसान समझान शुरू कर दे ।

    रही बात इस ब्लॉग जगत की तो समय आप को बता ही देगा की मिश्र जी कितने स्त्री- समानता विरोधी हैं और अपने ब्लॉग पर महिला ब्लॉगर की चर्चा इसी लिये करते हैं ताकि कोई न कोई नारी खोज ले जिसके कंधे पर बन्दुक चला सके । ये जिनके ऊपर लिखे वो सम्मानित हैं बाकी सब अंगुलिमाल और बैंड वैगन हैं ।

    शुक्रिया
    कमेन्ट रखना हो रखे मिटाना हो मिटा दे , आप तक बात पहुच गयी समझ आना या ना आना अपनी अपनी मानसिक परिपक्वता पर निर्भर हैं

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  25. एक वरिष्ठ ब्लोगर

    ये परिभाषा आपको किसने दी ब्लोगिंग मे कौन कनिष्ठ और कौन वरिष्ठ ?? क्या आयु से , क्या पहले आने से ?? गाली कहां दी हैं किस कमेन्ट मे दी हैं ?? केवल वो कहा जो महसूस किया , नाम से भी कह सकते थे पर जब बेनामी ऑप्शन खुला हैं तो क्यूँ नहीं ?? और नाम से अनाप शनाप लिख देने से क्या अरविन्द मिश्र सम्मानित हो गए ।

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  26. जो पुरुष अपने घर पर पत्नियों के जूते खाते हैं, वही लोग यहां-वहां महिलाओं के खिलाफ विष वामन करते फिरते हैं

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  27. चलिए आपने यह बात तो मानी की औरतें भी पुरुषों पर अत्याचार करतीं है. पुरुष भी घरेलु हिंसा के शिकार है !!!!

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  28. अर्विन्द मिश्र ने बिल्कुल थीक लिखा कि अनूप शुक्ल ब्लॉग- नारियों के सामने खुद को ब्लॉग नर पुंगव (नर श्रेष्ठ ) के रूप में प्रस्तुत रखने की हास्यास्पद मानसिकता रखते हैं .

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  29. अभि पिछले दिनो जूनियर ब्लोगर के नाम पर जो गन्दगि फैलाई गैइ बेनामि दवारा वह यहि रचना थि

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  30. शायद नारी ब्लॉग खोल दिया गया है क्यों की जितनी भी बार ब्लॉग पर जाने की कोशिश करी है सफलता ही हाथ लगी है !

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)