Wednesday, June 30, 2010

सजन




इतनी दिल्लगी सजन यूँ किया ना किजिये
दिल लगाया है आप से  दुखाया ना कीजिये

कब चाहा है हमने पहलू में ही बैठा कीजिये
बस नज़रें इनायत उडती सी  ही कर दीजिये

मर्जी  जो है आपकी नाम ना लेंगे कभी जुबां से 
क्या करियेगा जब लोग सुनेंगे कब्र की फिजां में

साखी क्या दूँ  इस बात की  बिन तुम्हारे ना जियेंगे 
अमित प्रेम हमारा दास्ताँ कियामत तक लोग कहेंगे  

Thursday, June 24, 2010

"मर्द को दर्द नहीं" वाली मानसिकता ने समाज का सबसे ज्यादा अहित किया है.

क्या कभी ऐसे भी सोचा जा सकता है की "मर्द को दर्द नहीं" वाली मर्दानगी की मानसिकता ने समाज का सबसे ज्यादा अहित किया है. और अब महिला शशक्तिकरण  के कर्ण मधुर नारे से समाज में विद्रूपता फ़ैलाने की कोशिश की जा रही है.
ईश्वर ने जीव को उत्पन्न किया तो इस स्रष्टि का एक भी तत्व ऐसा नहीं जो जीव के स्वाभाव में ना हो. सद्गुण-दुर्गुण, प्रेम-कटुता, साहस-दुर्बलता,  आदि सारे गुण-कर्म नर-मादा दोनों में समान रूप से विद्यमान है. हाँ शारीरिक रूप से अनेक तत्व ऐसे हैं जी प्राकृतिक रूप से नर-मादा को भिन्न बनाते है. और समाज में कठोर और सरल कार्यों के विभाजन के लिए भी उत्तरदायी हुए है.
आदि काल में जीवन प्रवाह सहज रूपेण गतिशील था, समाज में अधिकारवादी मानसिकता का उदय नहीं हो पाया था, सो शासक-शोषित अबल-सबल का तो प्रश्न ही नहीं. फिर जब कालप्रवाह  में समाज का गठन हुआ कुछ सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के नियम बने. समाज स्त्री या पुरुष प्रधान ना होकर परिवार प्रधान बना, परिवार को ही समाज की प्राथमिक इकाई माना गया है. ना की स्त्री या पुरुष वर्ग को.
प्राकृतिक कारणों से नर को मिले सबल कठोर शारीरिक संरचना के कारण उसे श्रम साध्य कार्यों में प्रवृत्त होना पड़ा. जंगल साफ़ करके खेती लायक जमीन तैयार करना, खेती करना, आदि सारे कठोर कार्य उस पर आरोपित कर दिए गए और इस  जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक कठोरता को बनाये रखने के लिए पुरुष को हर समय यही  सिखलाया गया की एक पुरुष या शक्तिशाली पुरुष को  क्या करना चाहिये और क्या नहीं. समाज द्वारा यह निर्धारित कर दिया गया की पुरुषों को बलिष्ट, आक्रामक, हिम्मती, कठोर, ना झुकने वाला होना चाहिये. पुरुष को शारीरिक  और मानसिक रूप से सबल होना ही चाहिये, कमजोर तो कतई नहीं. उन्हें अपना अस्तित्व ऐसा निर्मित करना होता ही की दूसरे उनसे डरें. उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर होना होता है, और येन-केन प्रकरेण परिवार के भरण-पोषण के लिए आर्थिक सुरक्षा के साधन जुटाने होते है.  मर्द रोते नहीं हैं। मर्दों को दर्द नहीं होता। मर्द शर्माते नहीं हैं।
अगर हम निष्पक्ष भाव से विचार करें तो कुछ समझ में आ सकता है की इन सब बातों का दबाव बनाकर पुरुष का कितना शोषण सदियों से किया जा रहा है. पुरुष की प्राकृतिक रचनात्मकता और कोमलता को जबरदस्ती कुचलवाकर इस कदर मर्द बनने के लिए प्रेरित किया जाता है पुरुष अपने जीवन के सारे व्यवहारों को आक्रामकता और  लड़ाई-झगडे से ही पूर्ण करने की कोशिश करते है. 
अपनी सहज प्राकृतिक संवेदनाओ से परे पुरुष को केवल दिमाग से सोचने वाला एक मशीनी पुर्जा या एक कूकर बना दिया गया है जिसे जो सिखलाया जाता है वही करता है. जो पुरुष  अपने जीवन के सभी छोटे-बडे फैसलों में अपनी दिल की बात नहीं सुनते, केवल दिमाग से ही काम लेते हैं. क्योंकि आदमी इतनी क्रूरता से अपनी भावनाओं को कुचलते हैं वे असंवेदनशील व पत्थरदिल हो जाते हैं.  जाहिर है वे दूसरों की भावनाओं की भी परवाह नहीं करते.
अब पुरुष को इस झूंठी मर्दानगी से निकालकर सहज प्राकृतिक गुणों की और प्रेरित करने की बजाये नारी को भी भुलावे में डालकर उसी राह पर ज़बरदस्ती धकेला जा रहा है.
सच्चाई कडवी ही होती है समाज ना पुरुष प्रधान था ना स्त्री प्रधान.  समाज परिवार प्रधान समाज था, और अभी भी है. लेकिन  विकारों को आजादी का नाम देकर जिस तरह से अपनाये जाने की घिनोनी भेडचाल मची उससे सारा ढांचा ही भरभरा रहा है. विकार सब जगह मौजूद होते है. सहज प्राकृतिक गुणों से  विचलन के ही परिणाम है यह सब. शायद लड़ाई अपने को एक अलग इकाई मानकर प्रभुत्व स्थापित करने मात्र की है.

Tuesday, June 22, 2010

नारी मुक्ति का प्रतीक

मेरा पिछले पोस्टें  लिखने का मंतव्य किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाना नहीं था. सिर्फ सामाजिक विकृति के लिए एक वर्ग विशेष को ही समूल दोषी सिद्ध किये जाने की मानसिकता के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज करवाना चाहता था.
मेरा इस बात से बिलकुल इनकार नहीं है की भारत या पूरे विश्व में महिलाओं के साथ अनाचार किया जाता है .  लेकिन स्त्री-पुरुष समानता के विषय में मेरा मत है की स्त्री पुरुष को प्रकृति ने अपनी अपनी जगह सम्पूर्ण बनाया है. इनमें बड़े छोटे की बात निकालना मुर्खता पूर्ण कृत्य है . पुरुष को हमेशा पुरुष ही रहना चाहिये और नारी को अपने सम्पूर्ण  रूप में नारी ही. लेकिन पुरुष के कपडे पहनने से, उनके जैसे दुर्गुणों को अपनाने  शराब-सिगरेट पी लेने मात्र से ही तो समानता का दावा पूरा नहीं किया जा सकता है.(आज  स्त्री पुस्र्ष समानता का प्रतीक इन्ही चीजों को माना जाने लगा है)  अगर स्त्री ही पुरुष की वर्तमान सामाजिक स्थिति को श्रेष्ठ मानकर उसकी नक़ल को ही समानता का नाम देगी तो यह तो पुरुष का अनुकरण करना मात्र ही हुआ, फिर अगर पुरुष समाज की हेकड़ी को ही झुकाना है तो आन्दोलन पुरुषों को महिलाओं के क्रियाकलाप अपनाने, उनको महिलाओं के कपडे पहनाने का चलाना चाहिये.  लेकिन यह दोनों ही स्थितियां दुर्भाग्यपूर्ण है . स्त्री स्त्रीत्व में ही सम्पूर्ण है और पुरुष पुरुष रूप में. लेकिन स्त्री का स्त्री होना दयनीय होना नहीं है और पुरुष का पुरुषत्व  नारी को भोग्या मानकर उसका शोषण करना नहीं है.
स्त्री पुरुषों की बराबरी करने के नाम पर उसका अनुकरण ना करे, और स्त्रीत्व को ही बनाये रखकर समाज में पुरुष की अन्यायपूर्ण मानसिकता को  चुनोती दे तो बात समझ में आती है. और इसी का हिमायती मैं मेरे मन को पाता हूँ.
ना स्त्री शिक्षा का विरोधी हूँ, ना नारी के किसी भी तरीके से घर से बाहर निकल कर समाज के निर्माण में सहयोग देने  का विरोधी हूँ . और ना महिलाओं पर अन्याय का किसी भी रूप में समर्थन करता हूँ .
अगर फिर भी अपने मनोभांवों को साझा करने मात्र से ही भावनाए आहत होने लगे और विमर्श करना ही दुष्कर हो जाये. तो बात समझ से परे है. अगर किसी के विचार से असहमति है तो सादगी पूर्ण भाषा में संवाद किया जा सकता है.
अगर कोई विचार इस तरह का आता है की नारी समाज की सारी समस्याओं की जड़ एकमात्र पुरुष वर्ग ही है. तो यह विचार व्यक्त करना तो नारी मुक्ति का प्रतीक हो गया. और अगर कोई इस विषय से असहमति दर्शाते हुए सिर्फ इतना भर इंगित कर दे की नहीं सारी बुराई पुरुष वर्ग द्वारा ही प्रदत्त नहीं है तो इतना कहना मात्र स्त्री विरोधी हो गया. यह दोहरी मानसिकता क्यों कर अपनाई जाती है. इस बात को नारी समाज पर हमला क्यों मान लिया जाता है. 

Sunday, June 20, 2010

नारी स्वतंत्रता की बात करने वालों ने, अभिवक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटा------------------ अमित शर्मा

मेरी पिछली पोस्ट मैंने सुलझे मन से कुछ महिला अधिकारवादियों के अति हाहाकारी प्रलाप के विषय में की थी जिसके अंतर्गत वे लोग नारी समाज की सारी समस्याओं  और परेशानियों के लिए बेधड़क सारे पुरुष समाज को दोषी ठहरा देते  है. ऐसा करने में वे अपने आप को नारी स्वतंत्रता का बिगुल फूंकती से महसूस करते है.  पुरुष समाज पर लानत-मलालत करते हुए वे अपने विचार वक्त करने की आज़ादी का पुरा ख्याल रखते है. कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जब फिर कोई अपनी सहज वृत्ति से इनसे कुछ नम्र शब्दों में पूछ ले तो फिर वही अभिवक्ति की आजादी ना जाने  कहाँ बंदिनी बना ली जाती है मेरी पोस्ट पे आदरणीय मिश्राजी ने निम्न कमेन्ट की थी -----

 Arvind Mishra said...
अमित जी ,कुछ महिलाओं ने दुर्भाग्यवश अपनी निजी जन्दगी के दुखद तजुर्बों को पूरे ब्लॉग जगत पर लाद दिया है !
Anonymous said...
waah arvind mishra kaa kament nahin delte kiya aur mera kar diya yae hii purush vaadi maansiktaa aakthu arivnd mishra aur tum dono par jo mhila blogger ki nij ki ziandgi par aaaye kament ko chhaptey ho

Anonymous said...
pataa nahin arvind mishra kitnii mahilaa blogger ki nij ki zindgi ko jaantey haen aaku thu haen aese kament par aur tum par bhi
प्रिय डॉ मिश्र
आप का ये कमेन्ट यहाँ देखा । जानने कि बड़ी इच्छा हैं कि कितनी महिलाओं ने जो हिंदी मे ब्लॉग लिखती हैं आप से अपनी निजी जिन्दगी के अनुभवों / दुखद तजुर्बों को बांटा हैं


मेरे ब्लॉग पे बेनामी की टिपण्णी के शब्द और नारी पे अरविन्द जी को लिखे इए पत्र के यह शब्द    
इन शब्दों को पढने से पता चल रहा है की दोनों जगह एक ही शख्श  ने एक ही भावना से लिखा है क्या यही है नारी उत्थान का तरीका जो बेनामी बनकर थूंका जाये !!!!!!!!!!!!!!!!  किसी भी संवाद को संवाद ही क्यों नहीं रहने दिया जाता है. हाहाकार क्यों मच जाता है, मैंने भी तो आप सभी महिला वर्ग के लिए कुछ नहीं कहा था, सिर्फ "कुछ नारी अधिकारवादियों" का उल्लेख किया था, तो इसमें स्त्री विरोधी लेखन कहाँ से हो गया यह. इतना ही तो कहने की कोशिश की थी की सारे वर्ग को लपेटे में क्यों लिया जाता है. इस "नारी" ब्लॉग की अधिकतर पोस्टों को ही अगर दूसरे ग्रह से आया कोई प्राणी पढ़ ले तो, धरती के पुरुष समाज को कितना क्रूर जानवर मानकर अपने ग्रह लौटेगा भगवान मालिक है. और इस ब्लॉग पर मेरे द्वारा की गयी टिपण्णी को भी डिलीट कर दिया गया है.  और जब इस ब्लॉग पर जाने की कोशिस कर रहा हूँ तो यह सन्देश मिल रहा है -----

यह ब्लॉग मात्र आमंत्रित पाठकों के लिए है


http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/


लगता है आपको इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है. अगर आपको लगता है कि कोई गलती हुई है, तो आप ब्लॉग के लेखक से संपर्क कर एक आमंत्रण के लिए अनुरोध कर सकते हैं.

आपने 28amitsharma@gmail.com के रूप में साइन इन किया है- किसी और खाते के साथ साइन इन करें

तो इस प्रकार की है स्वतंत्रता की आवाज़ उतने वालों की स्वतंत्रता के प्रति मानसिकता !!!!!!!!!!! कैसे इनके प्रति संदेह पैदा ना हो की ये सिर्फ फ्रस्टेशन के शिकार है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
ज्यादा ना लिख कर आज फिर पूछना चाहता हूँ की महिला अधिकारवादियों ने इस प्रकार छिप  कर गलियां क्यों निकाली  एक वरिष्ठ ब्लोगर को.......................... एक स्वस्थ चर्चा  में भाग ना लेकर कमेन्ट को डिलीट और ब्लॉग  को प्रतिबंधित क्यों बनाया!!!!!!!!!!!!!!!!

Friday, June 18, 2010

क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ????

मैं यहाँ स्त्री बुरी या पुरुष भला का राग अलापने नहीं बैठा हूँ. सिर्फ पिछले दिनों में कुछ नारी अधिकारवादियों के लेख ज्यादा पढ़ लिए, जिन पर हर जगह पुरुष समाज को शोषक वोह भी क्रूरतम शोषक बताया जा रहा है,
हमारे ब्लॉग समाज में भी कई जगह  महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक बहस चल रही है. पर इस आन्दोलन के थोथेपन  से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है. आम परम्परावादी समाज में ऐसी कोई भी चर्चा अपना अस्तित्व नहीं बना पाई है. क्यों क्योंकि समाज का शुद्ध स्वरुप परम्परावादी समाज में ही मिलेगा जहाँ स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता है, प्रतिद्वंदी नहीं. और यह बात बार बार नहीं दुहराई जाती, सहज भाव से जीवन प्रवाह गतिमान रहता है.
नारी अधिकारों और समानता का हल्ला मचाने वाले हमेशा पुरुष को एक खतरनाक किस्म के क्रूर जानवर की भांति प्रस्तुत करने में लगे हुए है, और नारी को सदियों की महाबेचारी जो हर समय हर जगह हर एक पुरुष द्वारा प्रताड़ित की जा रही है. 
क्या वास्तव में यह शत-प्रतिशत सही है ? क्या वास्तव में हमें निरंतर ऐसी परिस्थितियां दिखलाई देती रहती है.?
बात सीधी सीधी मानवीय दुर्गुणों की है जिन्हें हमेशा स्त्री-पुरुष संघर्ष का नाम देकर सारे पुरुष समाज को शोषक घोषित किया जा रहा है. अगर कही भी शोषक -शोषित की बात आती है तो मानवीय दुर्गुणों के कारण ही आती है. क्या कोई पुरुष सिर्फ और सिर्फ नारी का ही शोषण करता है ?
क्या कोई भी पुरुष कभी भी अपनी पत्नी, मान, बहन, या दूसरी किसी भी के प्रति हमेशा ही झूंठा प्रेम या सन्मान दिखाता है.  क्या कोई भी नर हर मादा को दबा कर रखने की भावना रखता है ?

क्या स्त्री में मानवीय दुर्गुण नहीं पाए जाते ? क्या महिलाये अत्याचारी नहीं होती ? क्या महिलाये अपने दब्बू पति पर थानेदारी नहीं दिखाती ? दहेज़ कानूनों कि आड़ में पति शोषण कौन करता है. आपसी सहमती से बनाये गए संबंधों को बलात्कार का नाम कैसे दे दिया जाता है . आप कहेंगे की घरवालों के दबाव में जो की पुरुष प्रधान है. तो मैं पूछना चाहता हूँ की क्या पुरुष की बराबरी करने के लिए अनीति जायज है ?????

अपने को आजाद घोषित करने के लिए नैतिक वर्जनाये किसके द्वारा धुल-धूसरित की जारही है ?????  
कितने प्रतिशत लोग स्त्री शिक्षा के विरोधी है ???? कितने प्रतिशत लोग स्त्रियों के कामकाजी होने के विरोधी है. और कामकाजी होने की बात भी एकल परिवारों की ही आवश्यकता है. संयुक्त परिवारों में ना इसकी ज्यादा आवश्यकता पढ़ी है, और जब जरुरत नहीं महसूस हुई है तो उन परिवारों की महिलाओं ने भी इसे दासता का नाम  नहीं दिया है. और जिन परिवारों में जरुरत है उनमें ऐसी कोई बंदिशें भी ज्यादा दिखाई नहीं आती है. जितना की हल्ला मचाया जाता है. सब सहज रूप से चलता है, अगर असहजता है तो उसमें घर की महिलाएं भी शामिल होती है, फिर अकेले पुरुष की ही क्यों मिट्टी-पलीद की जाती है. अदालतें खुद कई बार यह मान चुकी हैं कि कई बार महिलाएं बदला लेने के मकसद से झूठे केस दर्ज करवा देती हैं और महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून बेगुनाह पुरुष के उत्पीड़न के हथियार बन जाते हैं।

 ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री समाज से पूछना चाहुंगा की क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ???? 




 

Tuesday, June 15, 2010

अमित तेज दिगंत माही पसर्यो, महाराणा थारी करणी को ----- अमित शर्मा




धन तिथि तीज सुक्ल जेठा पन्द्रसै सोल्हा पावनी
धन-धन परतापी भौम मेवाड़ी,प्रताप जन्म दायनी 
बाप्पा कीरत पताका थाम्ही,थाम्ही टेक सांगा की
शौर्य धार्यो सूर्य सो प्रखर, निर्मलता धारी गंगा की
निज धरम की धारणा राखी,मान राख्यो वीर  धरणी को
अमित तेज दिगंत माही पसर्यो,महाराणा थारी करणी को  


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Monday, June 14, 2010

आने वाले भयानक संकट की पूर्वाभासी घटनाएँ घटने लगी है.---- अमित शर्मा



कहा जाता है कि ''पानी ही जीवन है'', लेकिन विडंबना देखिये कि पानी के कारण जीवन की हानि होना भी शुरू हो गया है, किसी ने सही ही कहा हैं कि तीसरा महायुद्ध पानी को लेकर ही होगा. हाल कि बनती हुयी परिस्थिति में हम देख सकते हैं कि इस महायुद्ध की पूर्व तैयारिया चालू हो गयी है और, छोटी छोटी घटनाओ से इसका आभास मिलने लगा है.
कल जयपुर के जयसिंहपुरा खोर इलाके में  टैंकर से पानी भरने की आपाधापी से उठे विवाद में एक महिला ने एक अन्य महिला और उसके बेटे पर तलवार से वार कर दिया जिससे उस महिला का अंगुठा कट गया और, उसके बेटे को भी कई जगह चोटे आयीं है.
पिछले दिनों इंदौर में एक व्यक्ति ने पानी के विवाद में 18 वर्षीय पूनम की हत्या कर दी. ये लड़की इंदौर के सर्राफ़ा क्षेत्र में नल से पानी भर रही थी, तभी पानी भरने को लेकर उसकी लड़ाई पड़ोसी हुकुस गौड़ से हो गई. विवाद इतना बढ़ा की गौड़ ने चाकू से पूनम की हत्या कर दी.

यह तो सिर्फ उल्लेख भर है पानी की लड़ाई का हालात इतने भयावह हो चुके है की अंदाजा लगाना मुश्किल है. करीब करीब रोज ही इस तरह की ख़बरें पढने सुनने को मिल रही है. जगह जगह पानी के लिए धरने प्रदर्शन और इन प्रदर्शनों के दौरान A.E.N., J.E.N. को बांध देना उनके साथ मार-कुटाई रोजमर्रा के काम हो गए है.

लेकिन क्या इस भयावह समस्या के लिए हम ही लोग जिम्मेदार नहीं है ?? इस संकट के 70 फीसदी कारण मानव निर्मित है. सूखे के लिए प्रारंभी तौर पर हम ही जिमेदार है क्योंकि सालों से हम पानी की अंधाधुन्द बर्बादी कर रहे है.नहाने में दो तीन बाल्टी ढ़ोलें बिना मजा नहीं आता, शॉवर  के नीचे खड़े-खड़े नहाते हुए पानी बहाने में व्यक्ति का अहम् संतुस्ठ होता है बहते पानी में उसे अपनी रहिसायी झलकती दिखती है, यूरोपियन कमोड पानी की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है, एक बार फारिग होने का मतलब गया 15-20 लीटर पानी खड्डे में. हम में से कितने ही लोग है जिन्हें पाइप की मोटी धार से गाड़ी धोये बिना चैन नहीं आता. राजस्थान जैसे सुखा-ग्रस्त राज्य में गोल्फ को बढ़ावा दिया जा रहा है, 18 होल वाले एक गोल्फ कोर्स में रोजाना इतने पानी का इस्तेमाल होता है, जितने से लगभग बीस हज़ार घरों की जरुरत पूरी की जा सकती है. जल के अत्यधिक दोहन से कुएं व नलकूप जवाब देने लग गए है। गहराते जलस्तर से धरती की कोख सूखती जा रही है। लोगों को पेयजल के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
लोगों को पानी के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ रहा है। आने वाले समय को देखते हुए हमें अभी से जल संरक्षण का प्रयास करना होगा। जल की बूंद-बूंद कीमती है। हमें जल के महत्व को समझना होगा।
* ब्रश करते समय नल को खुला नहीं रखे, मग में पानी लेकर ब्रश करें
* वाहन को पाइपलाइन से सीधे धोने के बजाय बाल्टी में पानी लेकर साफ करें 
* वाल्व से रिछते पानी को बंद करवाएं
* बाथ टब में नहाने के बजाय बाल्टी में पानी लेकर कम पानी से नहाएं
* बारिश के पानी का संरक्षण करें
* बगीचे में नल को खुला नहीं छोड़ें
(आजकल छत के पानी के संरक्षण के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अपनाने पर भी जोर दिया जा रहा है. लेकिन एक नजर यहाँ भी देख लेना उचित होगा. कहीं अनजाने में ही हम अनर्थ ना कर रहें हो. )

चेतना तो अब हमें पड़ेगा ही क्योंकि आने वाले भयानक संकट की पूर्वाभासी घटनाएँ घटने लगी है. इससे पहले की यह शमां बुझे चेत जाइये