Friday, April 30, 2010

ईश्वर प्रदत्त जीवन पद्दति सिर्फ और सिर्फ एक ही है प्राणिमात्र का कल्याण करते हुए उस परमात्मा का ध्यान करना

किसी चीज को समझने के लिए काफी अन्दर जाना पड़ता है.  और ना समझना हो तो अपने खोखले दिमाग से कुछ भी कहा जा सकता है किसी भी धर्मग्रन्थ की,उपासना पद्दति की बुराई  की जा सकती है. क्योंकि बुद्धि तो हमारी है ना. 
कुछ लोग वेद और उनके विस्तार रूप अन्य ग्रंथों को अपनी ओछी मानसिकता से ना समझ पाने के कारण उटपटांग लिखे जा रहे है. बल्कि यह माना जाना चहिये की ऐसा वे जान बूझ कर कर रहे है. क्योंकि जैसा की शास्त्रों में ही बताया गया है की इस सारे संसार में दो ही प्रकार के मानव है पहले सज्जन जो की हर एक प्राणी की कुशलता की कामना रखते हुए अपना जीवन जीते है और दूसरे दुर्जन जो की येन-केन प्रकरेण मानवता का अहित करने की जुगत में लगे रहते है .
अब इनका क्या किया जा सकता है, की ये पूरे स्तरों को बिना समझे हर स्तर को अलग-अलग करके उसका अपने ही नजरिये से आंकलन करते है . जब किसी चीज को आप ठीक से समझ ही नहीं पा रहे हो तो क्या मतलब . और शायद इनका मकसद भी नहीं है समझना . क्योंकि अगर समझना ही चाहते  तो फिर इतना गलीचपना भी ना दिखाते .

ज्यादा नहीं पर इतना तो समझने की कोशिश हम कर ही सकते है की वैदिक धर्म-ग्रंथों में जीवन के हर प्रकरण को, काल के हर प्रकरण को अलग -अलग विभाजित करते हुए उनका तारतम्य बनाया गया है .
इसके तीन मुख्य विभाग हम देख सकते है
१. दार्शनिक भाग -  इसमें मानव धर्म का सारा विषय अर्थात मूलतत्व , उद्देश्य और पारमार्थिक लाभ के उपाय निहित है.
२. पौराणिक भाग - यह स्थूल उधारनो से दार्शनिक भाग को स्पष्ट करता है . इसीमें मनुष्यों के दैनिक क्रय-कलापों की विवेचना के लिए महापुरषों के जीवन को उधारण द्वारा समझाया गया है. इसी भाग के अंतर्गत सारी स्मृतियाँ, पुराण आदि आते है .
३.अनुष्ठानिक भाग - यह धर्म का स्थूल भाग है. इसमें पूजा-पद्दति , अचार, जीवन चर्या, अनुष्ठान-पद्दति आदि आते है .

जीवन के कर्त्तव्य-अकर्तव्य के निर्धारण के लिए समय विशेष अपेक्षित है. धर्मशास्त्रीय पद्दति के अनुसार "भविष्य में धर्म का प्रतिपादन कठिन होगा"   इस तथ्य को समझकर आचार्यों ने कुछ बातें दूसरे और तीसरे  भाग को चार भागों में निरुपित किया है . तप, ज्ञान, यज्ञ, और दान .

जिस तरह कर्त्तव्य-अकर्तव्य के चार भाग है. उसी तरह पूर्ण वैज्ञानिक रीति से सृष्टि क्रम के भी चार विभाग चार युगों के रूप में  किये गए है . सत, त्रेता, द्वापर, और कलियुग.

 प्रत्येक पदार्थ के ह्रास की एक सीमा होती है, उस सीमा पर पहुँच कर वह परिवर्तित होता है. और वह वापस अपने मूल रूप में आ जाता है. इसी तरह इस संसार के पतन की भी एक सीमा है उस सीमा पर पहुँच कर, वापस आदियुग क्रम चलता है.

सतयुग - आदि युग को शास्त्रों ने सतयुग कहा है.इस समय सत्वगुण सृष्टि में प्रधान था . मनुष्य में त्याग,तप,एकाग्रता,सत्य, आदि स्वाभाविक गुण थे. मानव परम ज्ञानी था (आज का भौतिकता प्रधान ज्ञान नहीं) . मानव में कोई दुर्गुण ना होने से और तपस्या में ही स्वाभाविक रूचि होने से वेद का दार्शनिक भाग ही प्रचलित था दूसरे विधि-निषेधों की आवश्यकता नहीं थी. वेदत्रयी अनादी होकर भी वेद के तप और ज्ञानकाण्ड ही व्यहवार में आते थे .

त्रेतायुग - प्रकति के दूसरे तत्वों ने भी अपना काम करना शुरू कर दिया था. और मनुष्य रजोगुण प्रधान होने लगा था. मनोबल कुछ कम हुआ तप की शक्ति कम हुयी तो संकल्प सिद्धि  के लिए यज्ञ की आवश्यकता हुयी. रजोगुण के प्रभाव से जनसँख्या भी बढ़ने लगी. मनुष्यों में प्रकृति के थपेड़े सहने की शक्ति  नहीं बची थी. सो नगर-गाँव बसे संग्रह की वृत्ति भी बढ़ी. समाज बने समाज बनने पर नियम भी बनाये गए .

द्वापरयुग - द्वापर शब्द का अर्थ है संदेह. तमोगुण का प्रवेश हुआ मनुष्य में संदेह ,अविश्वास का बीज आ बसा . मनष्य में शारीरिक सुख की वासना आ गयी. भोग-भौतिकता बड़ी. जनसँख्या भी बढ़ी. परिणाम लडाई-झगडे भी बढे . 
इसलिए द्वापर में शास्त्रकारों ने नियम कठोर किये. मनुष्य में श्रधा बाकी थी इसलिए भगवद -आराधना का पूजा विधान प्रचलित हुआ.

कलियुग - कलिका अर्थ है कलह --युद्ध . इस युग के लिए यह नाम कितना सटीक है. सबके सामने है. कलह सिर्फ स्वार्थ से प्रेरित है. धर्म ,सिधांत,जाती,देश,समाज,आदर्श  ये सब बहाने बनाये जाते है .  आज मानव का मनोबल जिसके दम पे पिछले तीनो युगों के नियमों को व्यवहार में लाता था बिलकुल खत्म हो गया है . शास्त्रीय अचार-नियम गए, श्रधा-विशवास गए . न्याय अन्याय का तो प्रश्न ही उठ गया है .

किसका दोष है ??? युग प्रकृति का जहाँ स्वार्थ ही सबसे बड़ा लक्ष्य हो गया है .तो धर्मशास्त्रीय नियमों को किस तरह आदमी निभाने की सोच सकता है . दूरदर्शी ऋषियों ने कलियुग के इसी वातावरण को ध्यान में रखते हुए, सर्वजन कल्याण की भावना रखते हुए मन को ज्यादा से ज्यादा निर्मल रखने का उपदेश देते हुए दान और भगवान् नाम स्मरण को कलियुग का उपासनीय साधन बताया है .

दान भी अपनी सामर्थ्य हो तो आवश्यक है नहीं तो प्रत्येक  प्राणी में उस सर्वव्यापी परमात्मा का दर्शन करते हुए उसके स्मरण की आज्ञा है. कोरे नाम स्मरण से काम नहीं चलता परहित की भावना रखते हुए सात्विक जीवन जीना मूल है .इसका मतलब यह नहीं है की इस युग में पुराने उपासना साधन या नियम निष्फल है. लेकिन सार्वजानिक रूप से यह व्यवहार आजके समाज में मुश्किल है. इसलिए उसी परम धर्म के निर्वाह के लिए जो की सर्वकल्याण की योजना से आत्मकल्याण का साधन करता है को प्राप्त करने के लिए . 
शास्त्रों ने यथा शक्ति नियमों का पालन करना बताया है .
चार आश्रमों के निभाने की जहाँ तक बात है.  आज भी सात्विकता और प्रेम भरा जीवन जिया जाता है . वहाँ बड़ा आसन है घर में  रहते हुए ही. की पिता अपने आपको धीरे धीरे पीछे करते हुए अपनी औलाद को घर की सारी जिम्मेदारी सौंप देता है . शास्त्रों में ग्रहस्त आश्रम को ही सर्वश्रेष्ट बताया है . 
अब अधूरी बात का पल्ला पकडे रहने वाले क्या समझेंगे . उनका तो राम ही मालिक है . 

ईश्वर प्रदत्त जीवन पद्दति सिर्फ और सिर्फ एक ही है प्राणिमात्र का कल्याण करते हुए उस परमात्मा का ध्यान करना .
अपने व्यवहार से हमसे ऐसा कोई काम नहीं हो जाये जिससे किसी जीव की आत्मा दुखे.

आज टाइम काफी कम है और पोस्ट भी काफी लम्बी हो गयी है, आगे की बात कल करेंगे की वेद या दूसरे शास्त्रों का कैसे मनमाना अर्थ करके  दुष्ट उनमे मॉस भक्षण जैसे आरोप लगा रहे है .

Thursday, April 29, 2010

मासूम परिंदों की प्यासी पुकार सुनिए, एक बर्तन पानी का भरकर रखिये ---- अमित शर्मा



इन दिनों भयंकर गर्मी पड़ रही है, और  इस गर्मी में अगर सबसे ज्यादा शामत किसी की आ रही है तो वे है बेजुबान पक्षी.
पेड़-पौधे, नदी-पर्वत की तरह  पशु-पक्षी भी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं।बेजुबान पक्षियों की रक्षा हमारा कत्र्तव्य है, धर्म है।

बदलते पर्यावरण के बीच पक्षियों के लिए यह दौर चिंताजनक हो गया है। सबसे बड़ी चुनौती पक्षियों को गर्मी के मौसम में पीने के पानी की होती है। गावों में तो हालत फिर भी ठीक है पर शहरों में तो इन मासूमों को पीने को पानी ही नसीब नहीं हो रहा है. और इसकी जिम्मेदारी किसी सरकार की नहीं हमारी खुद की है. 

पक्षियों का यूं प्यासा रहना हमारे लिए अशुभ है। संसार के लिए भी और समूचे पर्यावरण के लिए भी।  इनकी पुकार को सुनें और इनके लिए जलपात्र घर की छतों पर रखें ताकि ये प्यासे न मरें। इन्हें जीवन मिले, संरक्षण मिले, मान मिले। यह सब हमारे ही हित में है। इन पक्षियों के सुरक्षित जीवन के लिए जल का प्रबंध जरूर करें।
मेरे आप सभी से अपील है  की कि पात्र में जल भरकर घर की छत या बालकनी में रखें ताकि पक्षी अपनी प्यास बुझा सकें। गर्मी में प्यास से सैंकड़ों पक्षियों की मौत हो जाती है या उन्हें काफी भटकना पड़ता है। परिंदों की इस तडफ़ को रोका जा सकता है महज एक जलपात्र रखकर।
आइये संकल्प लें और जलपात्र की व्यवस्था करके ओरों को भी प्रेरित करें.

Monday, April 26, 2010

आज का भौतिक विकास क्या धूप-छाँव की तरह नहीं है ? ---- अमित शर्मा

क्या वास्तव में हम विकसित हो रहें है, या हकीकत में विनाश के गर्त में डूबते जा रहे है ?
इस विषय पे खूब माथा-पच्ची की है, किसी एक बात पे मन ठहर ने को राजी नहीं हो पाता. लेकिन जब एक कहानी पढ़ी तो दिमाग की बत्ती जल उठी और एक झटके से दिमाग ने निर्णय सुना दिया की हम गर्त में जा रहे है. उसी टाइम मेरे मित्र प्रतुल जी ने भी ठीक इसी तरह के सवाल मेल से पूछ लिए. तो सोच क्यों ना आप से भी बाँट लूँ  ये मन की बात .
आप खुद विचार करें पहले व्यक्ति की आवश्यकता कितनी सी थी रोटी कपडा और मकान. आज के हिसाब से तो ये बिलकुल बाबा आदम के ज़माने की जीवन शैली है, लेकिन  क्या हम दावा कर सकते है की उनकी तुलना में हम ज्यादा सुखि है. सिर्फ आज की चकाचौंध ही असल विकास है या संतोषी जीवनशैली में सुख से जीवन यापन करना . क्या हर चकाचौंध के पीछे गहरा अन्धकार नहीं है, क्या पा लिया है हमने साइंस के विकास से जबकि हमारी शांति ही खो गयी है.    

एक किसान था वह अपनी छोटे  से खेत में खेती करता और अपना गुजरा चैन से करता था. एक दिन वह अपने खेत में बनी झोपडी के बाहर अपने बीवी बचों के साथ आराम से बैठा हंसी-मजाक कर रहा था. उसी टाइम  वहाँ से उसका एक दोस्त निकला जो अब एक सफल बिजनेसमैन बन गया था . दोनों में  राम-राम हुई आपस में हाल-चाल पूछा .
दोस्त ने किसान से पूछा गुजारा कैसा चल  रहा है.
किसान बोला बरसात होती है तो खेती करता हूँ.साल भर का अनाज पैदा हो जाता है और मौज करते है बस और क्या .
अरे.....! इसमें पूरी जिन्दगी...! थोडा और काम करो . थोड़ी सिंचाई करो, थोडा अंग्रेजी खाद डालो ऐसा करो वैसा करो ....
किसान----- फिर क्या होगा ?
दोस्त -------साल में तुम दस -पंद्रह हजार अलग कमा लोगे . दो-चार बीघा जमीन और ले लेना.
किसान ----- फिर ??
दोस्त ------- फिर ज्यादा खेती होगी ज्यादा पैसा बचेगा, फिर थोडा पैसा किसी धंधे  में लगा देना .
किसान------- अच्छा फिर.........!!!!
दोस्त--------- फिर पक्का मकान बना लेना, एक स्कूटर ले लेना.
किसान ------- फिर!!!!!!!!!!
दोस्त ---------- फिर धंदे को और फैलाना,काफी इनकम होगी अच्छा घर बनाना, अच्छी गाडी में घूमना.
किसान -------- फिर!!!!!!!!!!!!!!!!
दोस्त ---------- फिर क्या फिर तो काफी पैसे वाले हो जाओगे बैठकर आराम से मज़े करना बीवी बच्चों के साथ .
किसान बोला राम तेरा भला करे अभी क्या कर रहा हूँ ???  , जो इतना चैन बर्बाद करके फिर चैन की तलाश में मारा-मारा फिरूँ ??????

क्या हमारी हालत बिलकुल उस दोस्त के बताये अनुसार नहीं हो रही है.
अरबों- खरबों के मालिक क्या एक दिन भी चैन की बंशी बजा पाते है आप और हम तो क्या अंदाजा लगायें वे भापडे खुद ही ज्यादा जानते होंगे .
क्या आपको नहीं लगता की आज हम गर्त में जा रहे है. क्या पुरानी जीवन शैली से जीने वाले हमारे बडगे इतनी बिमारियों से जूझते थे, क्या उनकी जीवन शैली से ग्लोबल वार्मिंग फैलती थी , क्या उनकी जीवन शैली से धरती का संतुलन बिगड़ पाया था.
अगर नहीं तो क्या हमें यह नहीं मानना चहिये  की हमारे पुरखे ज्यादा विकसित थे,ज्यादा उन्नत थे, अपने जीवन में.
और हम इस धरती-बिगाड़,  मनख-मार जीवन शैली को विकास समझ अंधे हुए इसके पीछे  भागे जा रहे है.
ठीक है की आज सिर्फ रोटी,कपडा और मकान से ही काम नहीं चलता . लेकिन ललित मोदी बनकर भी क्या हासिल हो जाता है.

Saturday, April 24, 2010

नई पीढ़ी का पीड़ा-पत्र बुजुर्गों के नाम

आखिर क्या कारण है कि हमारे समाज के कुछ बुजुर्ग नई पीढ़ी के किसी भी काम को सहजता से नहीं स्वीकार कर पाते है. हमारे कुछ बुजुर्ग  (सभी नहीं ) हमेशा से नौजवानों को कोसते  नज़र आते है कि जवान अपनी संस्कृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते ,अपने धर्म-संस्कारों से बिलकुल कटे हुए है. बड़ो का सन्मान नहीं करते आदि काफी शिकायते है. और काफी हद तक यह सभी शिकायते बिलकुल सही है. 
लेकिन क्या आप बुजुर्ग ही इस बात का जवाब दे सकतें है कि हमें इस गर्त में धकेलने वाला कौन है. कितने परिवारों में इस नई पीढ़ी को अपने संस्कार हस्तांतरित करने का फ़र्ज़ निभाया जाता है . कितने परिजन खुद अपने धर्म-संस्कारों को ठीक-ठीक समझ सकें है और हमें उनकी तार्किक व्याख्या करके समझा पायें है . 
कितने परिवार में  माता पिता हम बच्चों को सच बोलना सिखाते है, और अगर सिखाते है तो सिर्फ इतना कि केवल अपने माता-पिता से झूंठ ना बोले कि कहाँ जा रहे है, कहाँ से आ रहे है .
कितने माता पिता हमे पैसे के बारे में सच्चाई पे चलना सिखाते है, अगर सिखाते है तो सिर्फ इतना कि बच्चा कहीं घर कि अलमारी से रूपये निकालकर दोस्तों के साथ मजे ना करे .
कितने बुजुर्ग हमें अपने इतिहास नायकों कि कहानिया सुनते है और हमारे अन्दर देश गौरव के भावना भरतें है, बजाये टाटा,बिडला और अम्बानी की  वैभव गाथाओं को सुनाने के
कितने बुजुर्ग हमें  सिर्फ 100 में से 100 नंबर लाने की होड़ में धकेलने की बजाये, सिर्फ अच्छी शिक्षा पाने का प्रबंध देखतें है .
कितने बुजुर्ग हमें समाज के लिए सोचने की प्रेरणा दे पाते है. 
जहाँ होना यह चहिये की हमारे बड़े हमें यह सिखाये की सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में ही मत सोचो समाज का भी ध्यान रखो. हर बात के लिए सरकारी तंत्र को ही मत कोसो, कभी खुद भी तंत्र का हिस्सा बनो. 
कौन सिखाता है की अपने घर की सफाई करके कचरा बहार गली में डाल दो. और अगर बाहर कोई गंदगी पड़ी है तो उस से जरा बचके निकला करो. क्यों हमें यह नही  सिखा रहे हमारे बुजुर्ग की बच्चो अगर कही भी गंदगी पढ़ी देखो तो उसे अपना काम ही समझ कर सफाई करा करो इससे  अपनी गली ही साफ़-और सुन्दर दिखेगी .
लेकिन अगर कोई बच्चा इस तरह का काम करता है तो हमारे बुजुर्ग ही उसके गालों पे तड़ा-तड थप्पड़ बरसा रहे है की बोल तूने ऐसा काम क्यों किया, सारे कपडे गंदे कर लिए.
क्या बुजुर्गों का फर्ज नहीं बनता की अपने बच्चों को समझाए की बेटा ऐसा ही किया करो जब भी कोई जानवर कही गंदगी फैला जाये और उस टाइम तुम अगर उस गंदगी को साफ़ करने की हालत में हो तो जरूर किया करो.
लेकिन अब हम ज्यादा क्या कहें हम तो आज-कल के लपाड़े है.आप बड़े है आप ज्यादा समझते है.

Friday, April 23, 2010

इसे निहारिये और प्रकृति कि मन-भावनता को मन में बसाइए - अमित शर्मा


इसे देखिये और अंदाजा लगाइए क्या है ये ??????????????????


अजी नहीं साहब ये कोई पानी का झरना नहीं है,और  ना ही पिघले सोने का झरना यह तो उस रेत का झरना है जिस रेत  के कारण यह धरती स्वर्ण-भूमि कहलाती है !!!!!!!!!!!!!

क्या चौंक  गए!!!!!!!! 

बिलकुल भरोसा नहीं हुआ. पर यह सच है ! रेतीले धोरों के लिए दुनिया भर में मशहूर राजस्थान के बाड़मेर जिले में लू के थपेड़ो के साथ टीलों से बहती रेत इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा दिखा रही है.
ये तस्वीर आज  राजस्थान पत्रिका में छपी थी. जिसे पत्रिका के फोटो जर्नलिस्ट ओम माली ने अपने कैमरे में कैद किया .

Thursday, April 22, 2010

हम अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को भी अपने मन कि सुविधा अनुसार छांटने लगे है - अमित शर्मा

अभी ब्लॉग-जगत में ताज़ा-ताज़ा धर्म युद्ध चल रहा था. कुछ  लोग बड़ी तैयारी से हिन्दू धर्म-ग्रंथों कि अपनी मनमानी से अनर्गल अर्थ-अनर्थ किये जा रहे थे . और ब्लॉग जगत में उनका जायज विरोध भी हो रहा था, काफी संभव है कि ऐसा उन्होंने किसी सुनियोजित भावनापूर्वक किया.  
लेकिन अब उनका क्या हो जो हिन्दू होकर भी धर्म-शास्त्रों को बकवास करार दे रहें हैं ?? और हम मोल्ये (बन्दर) से उनकी तरफ टुकुर-टुकुर देखे जा रहे है.
मैं बिना किसी हिचकीचाहट के  अपने इस अंधेपन को स्वीकार करता हूँ कि क्यों  किसी और के द्वारा किये जा रहे बकवाद को भी गलत नहीं कह पाया  . 
मैं तो  ब्लोगिंग करने ही जमाल साहब के अनर्थकारी अर्थों से आहात होकर आया था.  इसी लिए किसी और तरफ ध्यान नहीं दिया  . ये मेरी ही कमी है. (और शायद सभी की )

 आज  प्रचलन बन चुका है कि अगर अपने आपको आधुनिक,खुले विचारों वाला साबित करना है तो अपना जो भी परम्परागत है उसे बकवास करार दे दिया जाये. जिस तरह मेरे ही कई दोस्त कह जाते है कि "मेरा बाप तो सठिया गया है, कोई बात मानने को ही तैयार नहीं" बिना अपने पिता कि अनुभव-जन्य नाप-तौल को समझे बिना.

हरिशंकर परसाई जी ने जिस तरह आत्मा के फोल्डिंग कुर्सी कि तरह होने कि बात कही थी . उसी तरह हम भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं  को भी अपने मन कि सुविधा अनुसार छांटने लगे है . खुद को जो सुहाया ,खुद कि छोटी बुद्धि में जो समाया बस वोह तो अच्छा बाकी सब बकवास .

अब अगर उनसे सवाल-जवाब होंगे तो कोई कहेगा क्यों आपस में लड़ रहे हो दूसरे धर्म वालों का तो लक्ष्य ही यही था . लेकिन क्या सिर्फ इसी लिए आँख मूंद कर बैठ जाया जाये कि अमुक देश हित कि  बात ज्यादा  कहते है ,धर्मग्रंथो के लिए थोडा कुछ कह दिया तो कोई बात नहीं . या वे धर्मग्रंथो के बारे में कुछ बकवास कह रहे है तो उनकी देश हित वाली बातों का कोई मतलब ही नहीं है .

 
या फिर वे बंधु ही अपने को अति आधुनिकतावादी दिखलाने के लालच से उबर के अपनी लेखनी से ऐसा कुछ भी ना लिखने कि सावधानी बरतेंगे. 
बाकि तो सभी बड़े है ज्यादा जानते है .

Tuesday, April 20, 2010

श्रीमान जमाल साहब !

श्रीमान जमाल साहब,
जैसा की शाह नवाज़ भाई ने कहा था ----यह सब लिखने से बेहतर है, दोनों धर्मों में क्या समानताएं हैं, इस पर रौशनी डालते. शांति और भाईचारे की आज पुरे विश्व को ज़रुरत है."
मेरी भी आपसे यही कामना है की हम लोग इस्लाम को जानना चाहते है, हमे अपनी लेखनी से इस्लाम के बारे में अवगत कराइए, बिना आमंत्रण की भावना के, सिर्फ उपासना पद्दति मानने वालों की संख्या बढ़ने का लक्ष्य अपने दिमाग में ना रखिये, इस्लाम का प्रचार तो यूँ ही हो जायेगा जब उसकी सात्विक रौशनी में मानवता दिखलाई देगी.
इसके अलावा कुछ ऐसा भी लिखिए की मुस्लिम समाज में शिक्षा का स्तर बड़े, समाज के परिवारों में घूम-घूम के उन्हें समझाओ की सिर्फ एक पीड़ी को ग्रेजुएट बना दो पूरा समाज ग्रेट बन जायेगा. अपने लेखन कर्म से शिक्षा और सद्भाव का वातावरण बनाइये.  आखिरी प्रार्थना और है अपने इस संकल्प में थोडा परिवर्तन कीजिये अगर कर सकतें है तो ---------

        "और अब जो भी दिल छलनी करने वाली पोस्ट आएगी................................................................... प्रश्नकत्र्ता को तो जवाब दिया ही जाएगा । "

आप जवाब दीजिये उन अक्ल के दुश्मनों को अपनी विद्वता से. वे जो प्रश्न उठाते है उनका समाधान कीजिये, लेकिन यह कहा का न्याय की उनको जवाब देने की आड़ में आप हमारे ग्रंथों का मनमाना अर्थ करें.

आप ही के साथ-साथ मेरी अन्य सभी बंधुओं से भी अपील है की अपनी आस्था के मंडन के लिए दूसरे की आस्था का खंडन ना करें.

ज्यादा क्या कहूँ आप सभी बड़ें है.

अमित शर्मा

Monday, April 19, 2010

वेदाग्या -- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि " (किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे)

कैसी अजीब दास्ताँ है यह कहा शुरू कहा खत्म. सिर्फ एक सज्जन की कार्यशैली का अध्यन कीजिये, आपको पूरी की पूरी परंपरा की  मान्यता का दर्शन हो जायेगा . इन सज्जन ने मानव मात्र के कल्याण का बीड़ा उठाते हुए ब्लॉग चालू किया और दुनिया को समझाने के लिए लेखन करने लगे, की सिर्फ इस्लाम ही भ्रान्तिहीन है; केवल कुरआन के शरण से ही मनुष्य का कल्याण हो सकता है. ये सारी मानव जाती के प्रति दयालु होकर उसे  अपने धर्म की शरण में लाने का पावन प्रयास कर रहे है .और इनकी यह दया की भावना इतनी तेज स्पीड से काम कर रही है की सिर्फ अपने पवित्र धर्म और पवित्र शास्त्र के शुभ उपदेशो से ही इनका काम नहीं चल पा रहा है. प्रलोभन, बलप्रयोग, छल-कपट और न जाने क्या क्या तरीके अपनाये जा रहे है. मनुष्य जाती का कल्याण जो करना है.
बलप्रयोग और प्रलोभनों का तो क्या बताया जाये,ऐसा कौन है जो मानव हित के लिए इनके द्वारा अपनाये गए बलप्रयोग और प्रलोभनों के बारे में नहीं जनता होगा.
छल-कपट कपट की कहानी भी दुनिया देख ही रही है . कैसे इन्होने धीरे धीरे अपने कदम बढाएं है पहले तो कपट फैलाया हिन्दू धर्मं ग्रंथों के अन्दर इस्लाम की प्रशंशा बताते हुए, २-४ पोस्टों के बाद ही धीरे धीरे हिन्दू शास्त्रों के ऊपर कीचड़ उछालने लगे.
अरे जिन विषयों को आपने अध्यन ही नहीं किया कैसे उनकी व्याख्या करेंगे आप, लेकिन व्याख्या करने की बात भी भ्रम ही है जब मकसद ही बैर फैलाना हो. खुद के धर्म ग्रंथो के बारे में तो तिल भर भी इधर उधर ना होने की कसम खाई है तो ,हमारे ग्रंथो  को क्या खालाजी का घर समझ रखा है जो धमाचोकड़ी मचा लो खालाजी कुछ नहीं कहेंगी क्यों जी !!!
बड़े विद्वान बनकर कभी वेदों के,कभी पुराणों के मन्त्रों का अर्थ का अनर्थ करते फिर रहे हो तो फिर खुद के सम्मानीय ग्रन्थ के चीर हरण के लिए भी तो तैयार रहना चहिये ना. 
खुद के ग्रन्थ का चीर हरण होते देख कैसे टांडने  लगे ? मैं व्यक्तिगत रूप से इस प्रकार के चीर हरण के पक्ष में नहीं हूँ . पर किसी को क्या दोष दिया जाये रास्ता ही आपने ऐसी ही चुना है तो ??? पर कोई  किसी के पागल पने पर ज्यादा क्या कहे.


जब विद्वान  इस बात पे सहमत है की वेद ज्ञान का भण्डार है. और ज्ञान उस चीज को कहते है जो हमें क्या करना चहिये और क्या नहीं करना चहिये का बोध करता है. क्या  करना अच्छा है, क्या करना बुरा है.इस विवेक का नाम ज्ञान है.  विवेक सम्मत रूप से परमार्थ करना धर्म है . तो जब कोई ना करने वाले दुर्जनीय काम करेगा और मानवता का अहित करेगा तो उन दुर्जनों को मारने का उपदेश धर्म होगा या अधर्म, या फिर जो आपकी उपासना पद्दति को ना माने उनका सफाया करना ही धर्म है. मानवता की नजरों में तो नहीं है चाहे आप की नजरों में हो. सज्जनता (सर्वकल्याण) धर्म है या दुर्जनता (स्वयंकल्याण ) धर्म है . 

वेदों में हो या गीता में या और कही गलत काम करने वाले के लिए तो सजा ही निर्धारित की जाएगी . 
पूरे मानव समाज में दो तरीके के प्राणी बताते हुए  ; वेद गीता और अन्य शास्त्रों में उनको दो भागो में विभक्त किया गया है--एक दैवी प्रकृति के और दूसरी आसुरी प्रकृति के ----भय का आभाव,मन की स्वच्छता ,तत्वज्ञान की जिज्ञासा,दान,संयम,स्वाध्याय,ताप,सरलता,अहिंसा,सत्य का पालन,क्रोध का आभाव,त्याग,शांति,चुगली ना खाना, सारे प्राणियों पे दया,अलोलुपता,मृदुता,लज्जा,अचंचलता ,क्षमा ,कहीं भी वैर भाव न होना --- ये सब दैवीय प्रकृति के लोगो के लक्षण बताये गए है. 
इनके ठीक उलट प्रकृति के लोगो को असुर बताया गया है.   लेकिन वे  यह कैसे समझेंगे जो आतंकवादियों को भी असमानता का शिकार बता कर उनकी पैरवी करते हो.
वेदों की तो यह स्पष्ट आज्ञा है की--- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि \" (किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे) लेकिन संसार के प्राणियों को कष्ट देने वाले आतातियों को और पापियों को दंड देना किस विधान से हिंसा है ? दंड अपराधी को ही दिया जाता है,निरपराधी को नहीं .
लेकिन  इस बात को वे लोग कैसे समझेंगे जो खुद दुर्गुणों से ही  भरे हो और अपने पंथ का अनुयायी बनाने के लिए मारकाट को उचित मानते हो , आतंकवादियों को भी सरकारी  तंत्र का पीड़ित बताते हुए उनका पक्ष लेते हो .

इन लोगो ने  अजब धमाचोकड़ी मचा रखी है वेदों और दुसरे शास्त्रों के प्रसंगों पर . वेद के द्वारा परमात्मा ने जीव मात्र के कल्याण की राह दिखाई है. सिर्फ किसी उपासना पद्दति के कल्याण की नहीं.सत्य से असत्य की  राह पे चलने का प्रकाश दिया है . इतने पर भी कुछ लोग वेदों के अर्थ जाने बगैर दोषारोपण कर रहे है , कभी विज्ञान विरोधी बताते है, कभी उनके मन्त्रों का कुअर्थ करते है (अर्थ कैसे करेंगे बिचारों में इतनी बुद्धि भी तो होनी चहिये) कभी उनमे मांस भक्षण का दोषारोपण करते है,कभी अश्लीलता का तो कभी हिंसा  और युद्दोंमाद  भड़काने का. 
पर इसमें इन बिचारों का क्या दोष. यह निर्विवाद सत्य है की प्रकाश (ज्ञान) में अन्धकार (अज्ञान) नहीं रह सकता . फिर भी जब हम प्रकाश में खड़े होते है तो वहां हमें अपनी ही छाया दिखाई देती है. अब अगर कोई  उस काली छाया को भी प्रकाश का ही अंग मान ले ये प्रकाश का दोष थोड़े है ये तो हमारी अज्ञानता का ही प्रदर्शन है .
ये लोग फिर भी किस तरीके से अपने ही अज्ञान के अंधे कीचड़ उछाल रहे है, ये पिछले  दिनों में सबको मालूम चल ही गया है.  
खुद तो अनपढ़ों  की तरह से किसी भी घटिया मैगजीन के लेखों से ज्ञान प्राप्त करके बकवादन कर रहे है और हम से हमारे गुरूजी का नाम जानना चाहते है. अब इनके इतनी ही मरोड़ उठ रही है तो इनको बता ही दूँ की आप जिन महानुभाव का कयास लगा रहे है, उनके वेद जिज्ञासु होने से मैं उनका आदर तो करता हूँ, लेकिन उनका अनुसरण नहीं करता हूँ . पिछली पोस्ट में बताए गए  मंत्रो के ये अर्थ तो मैंने जयपुर संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री कर रहे मेरे एक मित्र से पूछे थे. अब देखिये की एक शास्त्री कर रहे स्टुडेंट ने ही जो अर्थ बताये है, उनसे ही आपके पाप का भंडाफोड़ हो गया तो जब किसी वेद विद्वान् से आप का पाला पड़ जाये तो आप जैसों का क्या हाल हो हर कोई समझ सकता है .

ये लोग  वेद शास्त्र पढते ही इसलिए है की शास्त्र का मनमाना अर्थ करके अपने मत की पुष्टि कर सके.इसलिए शास्त्र से यथार्थ ज्ञान भी नहीं सीख पाते है. शब्दों को खेंच-तान के जो चाहे  अर्थ निकाल कर खुद को और दूसरों को भी धोखा दे रहे है .
वेद परम ज्ञान कहलाता है .ऋषियों ने वेदार्थ को समझने के लिए कुछ पद्दतियां निश्चित की है; उन्ही के अनुसार चल कर हम  श्रद्धापूर्वक वेदार्थ को समझ सकते है. 

सभीसे मेरी प्रार्थना है की भूलकर भी इन महानुभावो की बातों में ना आकर स्वधर्म में अटल विशवास रखते हुए . अपने धर्मशास्त्रों में पूर्ण विशवास रखें. उनमें कहीं भी दुराचार की शिक्षा नहीं है, कही भी अश्लीलता नहीं है, कहीं भी हिंसा का समर्थन नहीं है , कहीं भी अपनी बात मनवाने के लिए मारकाट का समर्थन नहीं है.
अगर कुछ है तो सिर्फ जीव मात्र के प्रति सद्भावना का भाव रखते हुए, सद्गुणों की सहायता से जीवन को सफल बनाने की रीति का वर्णन .






Friday, April 16, 2010

बताइए जमाल साहब दो पैमानों से कौन नाप रहा है, कौन बैर फैला रहा है ?

जमाल साहब अपना यह कमाल कब तक दिखाते रहेंगे आप ? एक सामान्य सी बात एक शब्द है - "गवाक्ष"  इसका मतलब  किसी से भी पूछो, सब कोई कहेंगे खिड़की, विंडो आदि. क्यों जी साहब गाय की आँख क्यों नहीं कहते. गवाक्ष का मतलब तो गाय की आँख  होता है.
अब पहले आप यह समझो की खिड़की को गवाक्ष क्यों कहतें है- इसलिए की पुराने समय में खिडकियों की डिजायन गाय की आँख की तरह बनायीं जाती थी. आपको  और कहीं नहीं दिखे तो जयपुर आजाइएगा  हमारे ही पुराने मकान में दिखा दूंगा.

अब दुहिता शब्द को लीजिये साफ़ साफ़ मतलब है  "दोहन करने वाली". भारतीय संस्कृति में कृषि व गौपालन का अति उत्तम स्थान रहा है। एक दो नहीं लाखों गांवो वाले इस देश में दूध दही की नदियाँ बहती थी। हर घर में स्त्रियाँ ब्रह्म मुहूर्त में उठकर आनंद से घर के काम शुरू करती थी जिनमें गोशाला का काम सबसे पहले होता था. अब बड़ी स्त्रियाँ ( माताएं) तो गोबर वगैरा फेंकने जैसे भारी काम करती और परिवार की कन्या दूध दोहती थी जिससे दुहिता यानी दुहने वाली कहलाई. कोई क्या कर सकता  अगर  दुहिता शब्द सिर्फ और सिर्फ बेटी के लिए ही रूढ़ हो गया है तो ?

अब लेतें है ऋग्वेद के दसवें मंडल के इकसठवें सूत्र के सातवें मंत्र  का जमाल साहब  द्वारा बतलाया गया अर्थ और वास्तविक अर्थ और सन्दर्भ भी . सन्दर्भ जरूरी है क्योंकि ये हर बात सन्दर्भ से हटाकर और अर्थ बदलकर प्रस्तुत कर रहें है.
साहब ने  ऋग्वेद 10-61-7 का अर्थ इस प्रकार लिखा है -
 जिस समय पिता ने अपनी कन्या ( उषा ) के साथ सम्भोग किया , उस समय पृथिवी के साथ मिलकर शुक्र का सेक किया अर्थात वीर्य सींचा , सुकृती देवों ने व्रतरक्षक ब्रह्म ( वास्तोष्पति वा रूद्र ) का निर्माण किया ।
ऋग्वेद 10-61-7

अब पहले तो यह मंत्र किस सन्दर्भ में आया है यह बता दूँ . इस 61वे सूक्त में वर्षा चक्र को समझाया जा रहा है की किस प्रकार सूर्य जल को अपनी किरणों से अवशोषित कर पुनः धरती पे बरसाता है.
इस सूक्त के पहले मंत्र से ही अर्थ पढ़ते चलते है फिर सातवें मंत्र जिसका अनर्थ जमाल साहब ने किया है, को और यथार्थ अर्थ को देखते हुए आगे के कुछ  और मंत्रो का भी अर्थ पढेंगे. 
मेरी सभी से प्रार्थना है की जिस मंत्र का उल्लेख जमाल साहब ने किया है को - अर्थ, सन्दर्भ और भाव सहित समझते हुए "दुहिता" शब्द के अर्थ को भी ध्यान में रखियेगा.
वेदवाणी का परिश्रम से अभ्यास करने वाला मनुष्य इस कठिन वेदज्ञान का कर्म और वाणी में बुद्धि द्वारा प्रयुक्त करके संघ आदि में उपदेश करता है. उसके माता पिता और पूजनीय जो कार्य करते है उस यज्ञ कार्य में वह पाक करने के दिन सप्त होताओं में  ब्रह्मा बनकर स्थित होता है. 10-61-1


वह वेदज्ञ पुरुष ऋत्विज को देने के लिए धन को बाँटता हुआ और कुबुद्धियों का दमन करता हुआ सारी पृथ्वी को यज्ञ वेदी बना देता है. तथा इसे परमार्थ के लिए समझकर त्वरित गमन और अत्यंत प्रत्युत्मन्नमति होकर अपने सामर्थ्य को सर्वत्र इस प्रकार बिखेरता है की वह यहीं पर आवे और मेघ के जल के सामान सर्वत्र फैले. 10-61-2

ये सूर्य चन्द्र देवता के रूप में मन के सामान तीक्षण गति से उन यज्ञों में यजमान के कर्म से जाकर अपना भाग ग्रहण करतें है जिन यज्ञों में अध्वर्यु कर्म करने वाला अपने हाथ में सामग्री को लेकर अँगुलियों के द्वारा यज्ञ के देवता के निर्देश के साथ आहुति प्रदान करता है. 10-61-3

जब उषा का समय होता है तब द्युलोक के पालक सूर्य और चन्द्रमा को लक्ष्य में रखकर मैं यजमान आहुति प्रदान से उनकी प्रशंसा करता हूँ. वे बिना किसी प्रकार की हानी किये हमारे यज्ञों को प्राप्त होते है, आहुति भाग को ग्रहण करते है और वर्षा आदि से अन्न देने वाले और ज्ञान के विषय बनकर ज्ञान के साधन बनते है. 10-61-4

प्रजापति रूद्र=अग्नि की उत्पादन शक्ति विस्तार को प्राप्त होती है. उसके द्वारा स्थापित उत्पादन शक्ति रूप तेज को दृढ और नर तथा देवों का हितकारी पार्थिव अग्नि अपने अन्दर ढंककर रख लेता है और वह तेज सर्वत्र फैलाता है. वस्तुता यह तेज है जो द्युलोक से ग्रहण किया जाता है. 10-61-5

आदित्य और उषा वा द्युलोक के परस्पर अभिगमन में आदित्य अरुण किरण नामक तेज को द्युलोक में फैलाता है और दिन की उत्पत्ति होती है. सूर्य का यह तेज द्युलोक में भरा पड़ा है. 10-61-6

आदित्य जब द्युलोक उषा को अभिव्याप्त करता है तब पृथ्वी के साथ संगत होकर आकाश में तेज को सिक्त करता है उससे दिन का प्रकाश और अग्नि आदि उत्पन्न होते है. इस अग्नि को वास्तोसपति रूद्र=अग्नि कहा जाता है. 10-61-7

यह वास्तोसपति अग्नि विध्युदबल के सामान यज्ञ में घृत आदि को प्राप्त कर यज्ञ देवों की और फेंकता है. इस सब कुछ को वह हम से दूर पहुंचता है. 10-61-8

जो अग्नि दिन में और रात में भी आसानी से कार्य में नहीं लगाया जा सकता है और जलने आदि का भय जिससे प्राणिमात्र को बना रहता है, जिसे बिना किसी आच्छादन के खुले हाथ कोई नहीं छू सकता, वही विधिवत प्रयोग में लाया जाकर यज्ञ में समिधा, अन्न आदि का प्राप्त करने वाला पदार्थों का धारक और संयोग विभाग का साधन बन जाता है. 10-61-9

नवीन गति वाली अग्नि की लपटें सृष्टि नियम और उसके योग को बताती हुयी शीघ्र ही पृथ्वी पर आ जाती है. वे द्यु और पृथ्वी लोक में रहकर वायु को प्राप्त होती है और जल का दोहन करती है. 10-61-10

ये अग्नि की लहरें नवीन धन के सामान जल की वाष्पभूत बीज को सीचतें हुए आकाश से वृष्टि करतें है. तथा इस प्रकार ये तेरे लिए हे यजमान! पवित्र जल रूप धनको अमृत देने वाली गाय के दूध के समान देते है 10-61-11

क्या कोई बुद्धिमान जीव बता सकता है की इस पूरे प्रसंग में  "पिता सूर्य द्वारा अपनी पुत्री उषा के साथ सम्भोग किया गया " कहाँ  बतलाया गया है . उषा सूर्य की पत्नी है जो सूर्य की किरणों को दुहकर सारे ब्रह्माण्ड में फैलाती है .

बताइए जमाल साहब दो पैमानों से कौन नाप रहा है, कौन बैर फैला रहा है. आप खुद ही अपने आप को संदिग्ध  बना रहे है और कोई नहीं, और हम तो आपके पवित्र ग्रन्थ को  भी पूरे सन्मान के साथ समझने का प्रयास करतें है. आप ही लोगों का आग्रह है की इसका एक एक शब्द जिस रूप में है, उसी तरह अर्थ समझना होगा. आप बेहतर जानते है.

जमाल साहब इस तरह जहर उगलते हुए कुछ मार्मिक अपील करने का क्या फायदा ? जब से आपने ब्लॉग शुरू किया है तब से आप हिन्दू धर्मग्रंथों का अनर्गल अर्थ-अनर्थ किये जा रहें है बताइए शुरुवात किसने की ? अब भी अगर आपमें मानवता विद्यमान है तो इस प्रकार बातें मत कीजिये कोई भी आपके ब्लॉग से मालूम कर सकता है की शुरुवात कहाँ से हुई थी.
जमाल साहब ऐसा क्यों कर रहें है आप कृपया बतलाइए क्या मिल जाएगा आपको.

Thursday, April 15, 2010

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा // १/१/१// ब्रह्मसूत्र 
ब्रह्म कौन है ? उसका स्वरुप क्या है ? इस विषय पे बड़े बड़े विद्वानों के पसीने छूट जाते है. तो साधारण भोगी जीवो की क्या बिसात जो उस परब्रह्म के स्वरुप का वर्णन कर सके. वेद जिसे नेति नेति कहकर पुकारते है उस आदि,मध्य,अवसान रहित परमात्मा को जानने की कोशिश प्राचीन आत्मतत्व ज्ञानी ऋषि-मुनियों ने की थी. हम जैसे सड़े-गले विकारवान जीव उस तत्व को क्या समझ सकते है और क्या बखान सकते है. मानव को भगवान् ने विवेक-बुद्धि  प्रदान की है जिसकी सहायता से,और सदगुरु के निर्देशन में जीव उस परम तत्व को जानने समझने का प्रयत्न करता है. सदगुरु ही वह शक्ति है जो हमारी बुद्धि को निर्मल करके,हमारे आत्मकल्याण की राह दिखलाता है. इसी लिए हमारे शास्त्रों में सदगुरु को महान और पूजनीय बताया गया है. 
हमारी परम्परा और दूसरी परम्पराओ में यही तो सबसे बड़ा फर्क है की हम ब्रह्म को सर्वव्यापी मानते हुए कण कण में उस सर्वव्यापी को व्याप्त मानते है,जबकि दूसरी परम्पराए उसे अलग-थलग चित्रित करती है.
विचार करने की बात है की यह जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड देखने,सुनने ,और अनुभव करने में आ रहा है, जिसकी सृष्टि रचना के एक अंश पर भी विचार करने से आश्चर्यचकित  होना पड़ता है, हमें दिखने वाला सारा जगत तो उस सञ्चालन कर्ता की शक्ति का एक अंशमात्र है.
यह सबका ईश्वर है,यह सर्वज्ञ है ,यह सबका अन्तर्यामी है,यह संपूर्ण जगत का कारण है, क्योंकि सब प्राणियों की उत्पत्ति,स्थिति,प्रलय का स्थान यही है. वह इस सारे जगत का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है. उसका कर्तापन साधारण जीवों की भांति नहीं है .सर्वथा अलौकिक है.यह सर्वशक्तिमान सर्वरूप होने में  समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा असंग है.सर्व्गुन्सम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है .
हमें दिखाई देने वाले इस संसार का पैदा करने वाला और निमित्तकारण यह ब्रह्म ही है.
सर्वशक्तिमान परब्राह्म्पर्मेश्वरकी परा(चेतन जीव समुदाय) और अपरा (परिवर्तनशील प्रकृति) दो शक्तिया है. ये इसकी अपनी शक्तिया है इसलिए उससे अभिन्न है. वह इन शक्तियों का आश्रय है इसलिए इनसे भिन्न भी है.
 वेदों में ब्रह्म को चतुह्स्वरुपी बताया गया है -
१.ब्रह्म -----सत,चित,और आनंदस्वरूप है,वह निर्गुण और अक्षर रूप से विख्यात है.
२.ईश्वर ----वही ब्रह्म जब अचिन्त्य विविध रूप विशिष्ठ जगत की सृष्टि ,स्थिति,और लय करते है,तब ईश्वर कहलाते है. वही ब्रह्म संसार के निमित्त और उपादान कारण है.
३.वही ब्रह्म "एकोहम बहुस्याम" के अनुसार अपने चित अंश को अनंत रूपों में पसारित करके अपने स्वरुप से जीव समूह के रूप में प्रकाशित होता है.
४.ब्रह्म के जिन अनंत रूपों में चिदंश (जीव) प्रविष्ट हुए है,उन्ही अनंत रूप समूह का नाम ही जगत है .
उपरोक्त चारो स्वरूपों में ब्रह्म परिपूर्ण रूप से विराजमान है, जैसे समुद्र और तरंग अभिन्न होते हुए भी स्वरुप में भिन्न भी है उसी प्रकार जीव और ब्रह्म अभिन्न होते हुए भी स्वरूपतः भिन्न है.

 
 

Wednesday, April 14, 2010

एक बंधु को फिर वेद ज्ञान के कारण अपच हो गयी है

एक बंधु को अभी फिरसे  वेद ज्ञान के कारण अपच हो गयी है,और वामन करते फिर रहे है। अरे भाई इस ज्ञान  का उपयोग किसी ज्ञानी व्यक्ति द्वारा ही कराना चाहिए, अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है।
मन्त्रों का पाठ शुद्ध होना अनिवार्य है। और फिर उनका शुद्ध अर्थ भी होना चहिये। अब बताये कोई की शेरनी का दूध भी कही सोने के बर्तन के अलावा कीसी  दुसरे धातु के बर्तन में ठहर सकता है ? अब जनाब सारे दिन खोजबीन के "बृहदारण्यकोपनिषद" का एक श्लोक उठा लाये जो की पति-पत्नी के दांपत्य जीवन से सम्बंधित मीठी तकरार का उल्लेख कर रहा  है  इस उपनिषत के छठे अध्याय के चौथे ब्राह्मण में मनोवांछित सन्तान की प्राप्ति के लिए मन्त्रों का विवेचन है। मन्त्र द्वारा गर्भाधान करना, गर्भनिरोध करना तथा स्त्री प्रसंग को भी यज्ञ-प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है। इसमें कहीं भी अश्लीलता-जैसी कोई बात नहीं है। सृष्टि का सृजन और उसके विकास की प्रक्रियायों को शुद्ध और पवित्र तथा नैसर्गिक माना गया है। पंचभूतों का रस पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियां हैं, औषधियों का रस पुष्प हैं, पुष्पों का रस फल हैं, फलों का रस पुरुष है और पुरुष का सारतत्त्व वीर्य है। नारी की योनि यज्ञ वेदी है। जो व्यक्ति प्रजनन की इच्छा से, उसकी समस्त मर्यादाओं को भली प्रकार समझते हुए रति-क्रिया में प्रवृत्त होता है, उसे प्रजनन यज्ञ का पुण्य अवश्य प्राप्त होता है। भारतीय संस्कृति में इस प्रजनन यज्ञ को सर्वाधिक श्रेष्ठ यज्ञ का स्थान प्राप्त है।
यहां 'काम' का अमर्यादित आवेग नहीं है। ऐसी अमर्यादित रति-क्रिया करने से पुण्यों को क्षय होना माना गया है। ऐसे लोग सुकृतहीन होकर परलोक से पतित हो जाते हैं। यशस्वी पुत्र-पुत्री के लिए प्रजनन यज्ञ-ऋतु धर्म के उपरान्त यशस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए रति-कर्म करने से पूर्व यह मन्त्र पढ़ें-
'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि।'इस मन्त्र का आस्थापूर्वक मनन करने से निश्चय ही यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। इसके अलावा दही में चावल पकाकर खाने से व जल में चावल पकाकर व घी में मिलाकर खाने से भी पुत्र-रत्न की ही प्राप्ति होगी। यदि पति-पत्नी विदुषी कन्या की कामना करते हों, तो तिल के चावल की खिचड़ी बनाकर खानी चाहिए।
गर्भ निरोध का उपाय
यदि पति-पत्नी दोनों सन्तान नहीं चाहते या कुछ काल तक 'गर्भनिरोध' चाहते हैं, तो रति-क्रिया में परस्पर मुख से मुख लगाकर इस मन्त्र का उच्चारण करें-
'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे।' इससे कभी गर्भ स्थापित नहीं होगा। रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक कांसे के पात्र में खाने का भी निषेध है। अधिक शीत और उष्णता से भी बचना चाहिए। माता को अपनी सन्तान को स्तनपान कराने से भी नहीं बचना चाहिए। यह धर्म-विरूद्ध है और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
 अब बताइए की गृहस्थ के इन सामान्य क्रिया कलापों में भी कोई दुर्बुद्धि वासना का ही दर्शन करे तो उसे क्या कहा जाना चहिये. यह आप लोग बतलाइए।

ओहो जमाल साहब फिर वही अधकचरी बात

ओहो जमाल साहब फिर वही अधकचरी बात-
सबसे पहले तो आपको और आप जैसे दुसरे बंधुओं को यह समझना आवश्यक है की "वेद" सिर्फ किसी किताब या मन्त्रों का ही नाम नहीं है. वेद का मतलब है ज्ञान और ज्ञान कभी आधा-अधुरा नहीं होता उसमें जीवन के संपूर्ण व्यवहारों का निरूपण होता है. वेद मानव को पुरषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के सूत्र बतलाता है पुरषार्थ चतुष्टय तो जानते ही होंगे आप - "धर्म,अर्थ काम और मोक्ष". जब मानव मात्र का उद्देश्य ही ये चार पुरषार्थ निश्चित किये गए है तो,और इनको सम्यक रूप से किस प्रकार जीवन में प्राप्त किया जाये इसका निर्देशन वेद करता है.(याद रखिये "सम्यक रूप" से किसी भी तरह की अस्म्यकता का वेद निषेध करता है). और जब वेद जीवन को किस रूप में किस तरह जिया जाये का निर्देशन कर रहें है तो यह तो मुर्ख से मुर्ख प्राणी के भी समझ में आने वाली बात है की उसके हर मंत्र में "धर्म,अर्थ काम और मोक्ष" सम्बन्धी अर्थ निकलेंगे . यहाँ आप यह भी ध्यान रखिये की धर्म के साथ काम का वेद ने निषेद नहीं किया है,धर्म के साथ काम तो मानव के परम लक्ष्यों में शामिल है. लेकिन वही काम- क्रोध,मद,लोभ जैसे दुर्गुणों के साथ ताज्य है.
वेद सम्पूर्ण सत्य है,और सत्य को जो जिस भावना से देखेगा वोह उसको उसी रूप में दिखलाई देगा,ज्ञानमार्गी को ज्ञान,तो काममार्गी को काम
"जाकी रही भावना जैसे प्रभु मूरत तिन देखी तैसी"
जिसका जो स्वभाव होता है,उसको उसके प्रदर्शन का नाटक नहीं करना पड़ता ,क्योंकि व्यक्ति का असली स्वाभाव तो देर-सबेर उजागर हो ही जाता है. इसका अंदाजा तो ज्ञानीजन आपकी पोस्टो की शब्दावली और उनपे हमारी कमेंट्स की शब्दावली से अपने आप ही लगालेंगे.
यों काम विषयक शब्दों पे लजाने का तो सवाल ही नहीं है क्योंकि यह तो पुरषार्थ चतुष्टय की अंग है, लेकिन बात वही की उस काम का प्रयोग कहाँ और किस प्रकार हो रहा है, हम गर्भाधान संस्कार करतें है,तो वोह भी हमारा एक सम्यक रीती से निभाया जाने वाला धार्मिक संस्कार है. लेकिन आप जिस परम्परा का अनुगमन करतें है वहाँ काम, वासना की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है ,और उसके आवश्यक संस्कार के रूप में लिंगाग्र को कपडे से रगड़कर स्थंबन का स्वाभाव विकसित किया जाता है, ताकि चार चार प्रियतमाओं सहित खुद की भी वासना पूर्ति हो सके.
अब हर जगह वासना युक्त कामुक नजरों से देखने काही तो परिणाम है की आप तो भगिनी शब्द को भी स्त्री योनी से जोड़ बैठे. सोच सोच कर हैरान हूँ की कैसे आप की बुद्धि के घोड़े माँ-बहिनों के योंनांगो की शरण लेने लगतें है,आपके अहंकारी मन की बात को शब्द देने के लिए.

Tuesday, April 13, 2010

मेरे विचारों पे श्रीमोहम्मदसाहब ने मोहर लगायी

आज रात को मुझे गजब का सपना आया. वैसे तो सपने मुझे कभी कभी ही आते है, और जो आते है उन्हें मैं भूल जाता हूँ . पर यह सपना अभी तक भी स्मृति पटल पे बिलकुल ताजा बना हुआ है. और हो भी क्यों नहीं सपना ही ऐसा था . रात को जब गहरी नींद में था तो क्या देखता हूँ की एक महान विभूति बिलकुल चाँद की मानिंद उज्जवल वस्त्र पहिने,पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति चमकदार चेहरा,विशेष गरिमामय व्यक्तित्व लिए  मेरे सामने प्रकट हुए. मैं उन्हें पहचान नहीं पाया पर उनके गरिमामय व्यक्तित्व से सम्मोहित हुआ, उन्हें  परमेश्वर का अंश जानकर उनके सामने दंडवत हो गया.  मैंने विस्मित  होते हुए पूछा की आप कौन  है और किस प्रकार कृपा कर मुझे दर्शन दिए है .उन्होंने मुझे उठाया और कहा की मै तेरी सोच पे अपनी मोहर लगाने आया हूँ . मैंने कहा की मै कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. तब उन्होंने निर्मल मुस्कराहट  के साथ मुझसे कहा की "मैं उस परवरदिगार का रसूल हजरत मुहम्मद हूँ , और कुरआन को लेकर तेरे मन में जो  विचार उत्पन्न हुए है उन पर अपनी मुहर लगता हूँ ". इतना कहते ही वह  दिव्य स्वरुप अन्तर्निहित हो गया और मेरी नींद खुल गयी .
अब आप जानना चाहते  होंगे की श्रीमोहम्मद साहब ने मेरे कुरआन विषयक किन विचारों पे अपनी मोहर लगायी थी. (चाहे सपने में ही लगायी हो,और सपने दिनभर के विचारों की परिणिति ही क्यों ना हो)
तो बंधुओ गौर से पढिये मेरे कुरआन विषयक विचार और सोचकर  मुझे बताइए की क्या यह भी हो सकता है ?,या यही हुआ है ? ---
मुझे शक है की वर्तमान में जिस किताब को पवित्र कुरआन कहा जाता है, वही असल कुरान है, जिसे परमेश्वर ने श्रीमोहम्मद साहब पे नाजिल किया था. क्योंकि श्रीमोहम्मद साहब की जीवनी पढते हुए उल्लेख मिलता है की श्रीमोहम्मद साहब के जनाजे में  काफी कम लोग शामिल हुए थे. क्योंकि  उनके अनुयायी खलीफा पद की लड़ाई में उलझ गए थे. अब बताइए की जो अनुयायी आज तक उनके ऊपर शांति होने की प्रार्थना करते है, वो उनकी पार्थिव देह को भी शांति से नहीं सुपुर्दे-खाक ना कर सके. तो जो लोग अपने मसीहा की लाश को भी उचित  सम्मान नहीं दे पाए और सत्ता के लिए लड़ने लगे हों,क्या उन्होंने सत्ता के लिए श्रीमोहम्मद साहब की शिक्षाओं की की हत्या करके कुरआन में सत्ता प्राप्ति की सहायक आयतों का समावेश नहीं किया होगा.
श्रीमोहम्मद साहब ने तत्कालीन अरब में फैली बर्बर कबीलाई परम्पराओं को तोड़ते हुए शुद्ध वैदिक धर्म की महिमा का पुनर्स्थापन किया था. जिसे उनके अनुयायियों ने अपनी वासनाओं,और हैवानियत  की राह  में रोड़ा मानते हुए, पवित्र कुरआन में बर्बर और अनर्गल आयातों का समावेश कर दिया, जिससे की उन्हें खलीफा पद के रूप में कौम की बादशाहत, और लुटेरों के रूप में दुनिया की बेशुमार दौलत प्राप्त हो सकें.
तो यह है पवित्र कुरआन को लेकर मेरी चिंता और मेरे सपने में पधार कर श्रीमोहम्मद साहब द्वारा इसकी पुष्टि करने का हाल. अब आप लोग भी मुझे अपने अपने विचारों से शीघ्र अवगत करवाइए.

ऐसा कौन है,जो आपसे अलग है?

अयं निजः परोवेति, गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
 (यह् अपना है और यह पराया है ऐसी गणना छोटे दिल वाले लोग करते हैं । उदार हृदय वाले लोगों का तो पृथ्वी ही परिवार है।)

"वसुधैव कुटुम्बकम" भारतीय चिंतन को स्पष्ट करता है.संपूर्ण विश्व हमारे लिए कुटुंब के सामान है.जब अंतर्मन में परिवार का भाव विकसित हो जाता है,तो हमारे लिए न तो कोई गैर होता है और ना ही हमें किसी से बैर रह पाता है.सब अपने है और हम सबके है.
ऋग्वेद में ऋषि पूछते है की कौन है,जो आपसे अलग है? हर व्यक्ति में परमात्मा का अंश और उसकी शक्ति विराजमानहै.इसलिए प्रत्येक प्राणी हमारे लिए आदरणीय है.यही अवधारणा भारतीय संस्कृति का आधार है.ऋषि कहते है 'आत्मवत सर्वभूतेषु"
यानि सभी प्राणियों आत्मवत देखें और व्यहवहार करें .

बृहद-आरण्यक में कहा है की "जो जीवात्मामें रहकर उसका नियमन कर्ता है,वह अंतर्यामी तेरा आत्मा है"
यह बात गीता में भी स्पष्ट है ---ईश्वरः सर्वभूतानाम हृद्देशे$र्जुन तिष्टति /
                                        भ्राम्यन सर्व्भुतानी यंत्रारुड़ानी मायया //
                                        ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातनः /
पर जो परम्परा से ही सब जीवों को उस परब्रह्म से अलग मानते-जानते हों उन दुष्टों से कैसे आशा की जाये की वे सारे संसार को जो जैसा है के रूप में ही स्वीकारते हुए  "वसुधैव कुटुम्बकम" की उद्दात भावना रखेंगे. जो मनुष्य सब प्राणियों में परमात्मा को देखता है, वह किसी से घृणा नहीं कर सकता .समाज में दुराव को हमारे ऋषियों ने कभी स्वीकार नहीं किया. इसलिए ऋषि वेद में आह्वान करते है की- हे मनुष्यों तुम सब आपस में मिलजुलकर रहो,आपस में हिलमिलकर रहो .वेद का ऋषि समस्त जीव-जगत की मंगल कामना कर्ता है ना कि सिर्फ वेद अनुगामी की.
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।
            (सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े ।) 

Saturday, April 10, 2010

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे:

आजकल  हर तरफ धर्म ही धर्म की चर्चा चल रही है, पूरा ब्लॉग जगत धर्ममय हो रहा है. मै भी खुद को इसी रंग में रंगना चाह रहा हूँ . पर डरता हूँ की कहीं अधर्म का रंग ना चढ़ जाए. इसलिए 2 -3 दिन  का ब्रेक भी लिया.काफी समझने की कोशिश की, कई किताबे उलटी-पलटी की धर्म क्या है ? इतना तो दिमाग में घुसा की धर्म के आगे पीछे कोई नाम नहीं है,कोई विशेषण नहीं है,केवल धर्म है , और भैया धर्म तो धर्म ही होता है,यदि वह धर्म है तो.
फिर शरण दाता भगवन के साक्षात् स्वरुप श्रीरामचरितमानस की शरण ली. उसमे धर्म की अनेक  परिभाषाये तुलसी बाबा ने बताई है ,जो पल्ले पड़ा आप के साथ बाँटना चाहता हूँ शुरुवात में इस चौपाई  पे ध्यान गया, यह सीधे सीधे धर्म के लिए तो नहीं बता रही लेकिन यह बहुत सूक्ष्म रूप से धर्म की सार्वभौम  परिभाषा मुझे लगी -

सचिव जो रहा धर्मरूचि जासू. भयौ बिमात्र बंधु लघु तासु (१-१७६-४)

धर्मरूचि का मतलब है जिसकी जो रूचि हो उसके मुताबिक उस परम सत्ता की उपासना करे , तो वह उसका धर्म है. कोई ईश्वर बोले,कोई अल्लहा बोले, कोई कैसे कोई कैसे .लेकिन यहाँ एक बात  ध्यान देने की है की यह उपासना प्रलोभन से ना हो,किसी को पीड़ित करके ना हो,किसी को परवश करके ना हो .
किसी को पीड़ित करके ,लोभ से ,परवश करके किसी पद्दति में रूचि लेने के लिए कहा जाए तो ये अधर्म है. और शायद कोई भी बुद्धिमान प्राणी इस बात से असहमत नहीं होगा.
पर कोई अपनी अपनी रूचि की उपासना का यह मतलब भी नहीं की जिसकी जो मर्जी हो वही धर्म है.धर्म की परिभाषा के लिए तो शास्त्र  ही प्रमाण है

धरमु न दूसर सत्य समाना , आगम निगम पुराण बखाना (२-९५-५)
सत्य के सामान कोई धर्म नहीं, सत्य धर्म है .

धर्म की दया सरिस हरिजाना (७-११२-१०)
दया के सामान कोई धर्म नहीं है .
"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई"

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा , पर निंदा सम अघ न गरीसा (७-१२१-२२)
अहिंसा के बराबर कोई परम धर्म नहीं है, इस बात से कौन  दुष्ट इनकार करेगा . कौन सा धर्म हिंसा  की छूट देगा ,और जो हिंसा की छूट दे तो उसको धर्म कैसे माना जाये .


क्या कोई भी बंधु धर्म की इन परिभाषाओ को नकार सकता है, अगर नकार सकता है तो अपना पक्ष रखें
बात धर्म की है किसी उपासना पद्दति की नहीं पिछली पोस्टों में  रिलिजन (उपासना पद्दति ) की बातें थी,
एक तरीके से माने तो हिन्दू शब्द जिस उपासना विधि का निर्देशन करता है, वह उपासना पद्दति इस सार्वभौम मानव धर्म से सबसे अधिक निकट पड़ती दिखाई देती है. इसलिए अगर हिन्दू उपासना पद्दत्ति  को धर्म भी  कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है  

कोई समझे तो धर्म का मूल क्या है-

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: (३-१-१)  
धर्म का मूल है शंकर और शंकर का कोई संकीर्ण मतलब ना निकाले,शंकर का मतलब है कल्याण .
बाकि तो जैसा जो समझे ,

समय काफी कम मिल पा रहा है विषय  जटिल है, अपने मन की भावनाओ को आपके सामने रखने की कोशिश करता रहूँगा.,कृपया मार्ग दर्शन करते रहिये .

Wednesday, April 7, 2010

रिलिजन क्या है ?

मैं एक बात साफ़ कर देना चाहता  हूँ कि ये लेख मै किसी के पक्ष विपक्ष में नहीं लिख रहा हूँ, मुझे ब्लॉग माध्यम लगा अपने मन कि बात कहने का तो मन में जो विचार आते रहतें है उनको संजोने का प्रयास  मात्र है ,अगर मेरे लेखों से किन्ही बंधुओं के दिल को ठेश पहुँचती है तो मै उन से माफ़ी मांगना चाहूँगा.पाठकों को मेरे लेख पसंद ना आयें तो अच्छा बुरा कह सकतें है.
पिछली पोस्ट क्या हिन्दू धर्म एक पंथ (रिलिजन) है?  के विषय पे आगे चलते हुए आज रिलिजन का मतलब समझने कि कमोबेश कोशिश करते है -
यूँ तो पश्चिमी विचारको  ने रिलिजन को परिभाषित करने की कोशिश की है ,पर मैक्समूलर ने सभी दार्शनिको की परिभाषाओं को नकारते हुए 1878 में "रिलिजन की उत्पत्ति और विकास " विषय पे भाषण देते हुए रिलिजन की परिभाषा इस तरह दी है -"रिलिजन मस्तिष्क की एक मूल शक्ति है जो तर्क और अनुभूति के निरपेक्ष अन्नंत विभिन्न रूपों में अनुभव करने की योग्यता प्रदान करती है". यहाँ मैक्समूलर ने कल्पना की है की ईश्वर जैसी कोई सत्ता है जो असीम है,अनन्त है. इस से तो यह लगता है की मैक्समूलर यहाँ आस्तिकवाद की परिभाषा दे रहा है .
असल बात तो यह लगती है की विश्व में दो ही रिलिजन है, एक
आस्तिकवाद और दूसरा नास्तिकवाद . आस्तिक ईश्वर की सत्ता में यकीन रखता है और नास्तिकवाद ईश्वर को चाहे जिस नाम से पुकारो, उसके अस्तित्व को ही नकारता है .
समय के साथ साथ
आस्तिकवाद और नास्तिकवाद दोनों ही रिलिजन अनेक मतों और पंथों में बँट गए है .इनमे से इसाईयत और इस्लाम दो ऐसे आस्तिकवादी पंथ है जिनमे अनेको शाखाएं और उपशाखाएँ बन गयी है. और हर शाखा अपने को असल इस्लाम या ईसाईयत बताता है. वेटिकन के पोप की अगुवाई में रोमन कैथोलिक अपने को असली ईसाई रिलिजन का दावेदार मानते है,जबकि इसके विरोधी प्रोटेस्टेंट चर्चें रोमन कैथोलिकों को जाली ईसाई बतातें है .आज ईसाईयत की करीब 120 से ज्यादा शाखाएं है.
इसी तरह इस्लाम की दो मुख्य शाखाएं है शिया और सुन्नी, और दोनों ही अपने को असल इस्लाम बताते है. हालाँकि दोनों में काफी अंतर है सुन्नी मुसलमान कहतें है कि "अल्लहा एक है और हजरत मोहम्मद  उसके रसूल है" जबकि शिया कहतें है कि "इसके अलावा अली भी अल्लहा के उप रसूल है". आज इस्लाम कि 313 शाखाएं  है.
और इसके अलावा इस्लाम में अहमदिया जमात भी अपने को इस्लाम का अनुयायी मानता है पर हजरत मोहम्मद साहब को अंतिम रसूल नहीं मानता है.उधर आम मुसलमान अहमदी जमात को मुसलमान ही नहीं मानता है .
इस प्रकार रिलिजन कि कोई संतोष जनक परिभाषा अभी सामने नहीं आ पाई है,फिर भी "थोमस  पेन" कि परिभाषा जो कि उसने अपनी किताब "एज ऑफ रीजन" में की है शायद सबसे आगे निकल गयी है, जो है तो इसाई पंथ के लिए पर  सभी आस्तिक पंथों  पर पर सटीक बैठती है .-"मुझे तो ईसाइयत संबंदी सभी आस्थाएं एक प्रकार का नास्तिकवाद या एक प्रकार से ईश्वर को धार्मिक स्तर पे नकारना प्रतीत होता है. यह आदि सृष्ठा में विश्वाश करने के स्थान पे मनुष्य में विश्वाश करने की शिक्षा देता है ,यह नास्तिकवाद के उतने ही पास है जितना की अँधेरे के पास धुंधला प्रकाश. यह मनुष्य और सृष्टि कर्ता के बीच एक पारदर्शी शरीर प्रस्तुत करता  है, जिसे यह उद्धारक कहता है जैसे चन्द्रमा का पारदर्शी स्वरुप जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है तो ग्रहण हो जाता है,वैसे ही यह प्रकाश का धार्मिक ग्रहण है ."
यहाँ पेन का यह कथन गौर करने लायक है -
"यह मनुष्य और सृष्टि कर्ता के बीच एक पारदर्शी शरीर प्रस्तुत करता  है, जिसे यह उद्धारक कहता है".
ईसाइयत में जीसस को और इस्लाम में हजरत मोहम्मद साहब को एक पारदर्शी शरीर की तरह खड़ा किया गया है. इन दोनों में मुक्ति की प्राप्ति  के लिए क्राइस्ट और हजरत साहब अनिवार्य है . और इस कसौटी  पे ये दोनों ही रिलिजन हो गए है. 
यही बात एक दूसरे मापदंड से भी परखी जा सकती है की क्या कोई आस्तिकवादी,कोई पंथ , रिलिजन बन सकता है या नहीं ? क्या इसमें किसी को कोई आपत्ति होगी की इस सृष्टि में जो कुछ है उसी सार्वभौम सर्जनहार परमात्मा ने बनाया है. जिसे अल्लहा ,खुदा ,गाड,ईश्वर ,भगवान् किसी भी नाम से पुकारो. अतः यह भी स्पष्ठ है की एक विश्व सत्ता जो कुछ भी बनाएगी ,अपनी सारी सृस्ठी के लिए एक से ही नियम बनाएगी .अलग अलग समुदायों की लिए अलग अलग व्यवस्था नहीं करेगा .
इसलिए जो लोग किसी ऐसे मत में विश्वाश करते है जो उन्हें जो उन्हें किसी एक विशिष्ट नियम पद्दति और पैगम्बर पे विश्वाश करना आवश्यक बतलाता है, किसी विशेष रिलिजन के अनुयायी ही माने जायेंगे.
मतलब
आस्तीक्वादियों   के लिए रिलिजन वह जीवन पद्दति है जिसमें मनुष्य और ईश्वर के बीच कोई एक मानव शरीर जरूरी हो और उसके वचन,कर्म,और,नेतृत्व में उसके अनुयायियों को कट्टरता की परकस्ठ्ता तक पूर्ण आस्था हो.
आज इस्लाम और ईसाइयत अपने उस रूप में नहीं रह गएँ है जैसा की जीसस क्राइस्ट और हजरत मोहम्मद साहब की मूल धारणा थी. समय के साथ इन रिलिजनो की परस्पर विरोधी कई शाखाएं बन गयी है.इस्लाम के कई सम्प्रदाय मोहम्मद साहब को आखिरी नबी नहीं मानते है तथा ईसाईयों में भी कई सम्प्रदाय जैसे -क्राइस्टलैस क्रिस्चियन, जीसस को देव दूत नहीं मानते है.

इस प्रकार ईसाइयत और इस्लाम रिलिजन (पंथ) है धर्म नहीं.


Monday, April 5, 2010

क्या हिन्दू धर्म एक पंथ(रिलिजन) है?

जब अंग्रेजी राज की जड़ें भारत में जमने लगी.तब उन्होंने हिन्दु धर्मांतरण की सोची.पर उन्होंने इस बात को समझा  की हिन्दुओ के सीधे धर्मांतरण का विरोध होगा. इसलिए दुसरे प्रभावकारी उपाय सोचे गए. मैकाले-मैक्समुलर की मुखियागिरी में हिन्दुधर्म में तथाकथित नैतिक सुधार ,स्कूलों में इंग्लिश मीडियम से पढाई के जरिये मातृभाषा से कटाव , और सबसे बड़ा तथा हिन्दुधर्म की जड़ो पे सीधा व मारक वार करने वाला उपाय था हिन्दू-धर्मशास्त्रों का भ्रामक-भाष्य करना उनमे उलटे सीधे श्लोक डालकर प्रिंट करके हिन्दुओं के हाथों  में सौंपकर हिन्दू मन को ग्लानी से भर देना की देखो तुम्हारे धर्मशास्त्रों में  कितना अनर्गल लिखा है. क्योंकि अगर किसी घर को बर्बाद करना है तो उसका सीधा सा उपाय है की घर के बच्चों को उनके माता पिता के लिए उलजलूल भड़काते रहो,बच्चा माता-पिता की अवज्ञा करने लगेगा, बस हो गया घर का सत्यानाश.  आश्चर्य तो यह है की मैक्समूलर को हिन्दू हितैषी बताया गया है जबकि हकीकत में वह हिन्दुधर्म का सबसे बड़ा दुश्मन था .
ईस्ट इण्डिया कंपनी ने मैक्समूलर को बहुत ऊँची रकम पे वेदों का जाली भाष्य बनाने और दूसरे ग्रंथों में  वाहियात बाते ठूंसने के लिए अनुबंधित किया था. इतना ही नहीं ईसाईयों द्वारा लगातार कुप्रचार किया जाता रहा की हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है यह तो सम्प्रदायों का जोड़ मात्र है. ब्रिटिश कुप्रचार "हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है" ने आज अपनी जड़ें काफी मजबूत कर ली है. घोर दुखद आश्चर्य तो यह है की जिन विद्वानों को हिन्दू  लोग धर्मशास्त्रों का विशेषज्ञ मानते है वे भी यही भाषा बोलने लगें है. 
असंख्य हिन्दू और अहिंदू विद्वानों ने हिंदुत्व की ऐसी-ऐसी उड़न-परी सी परिभाषाये दी है जो की वास्तव में कोई परिभाषा ही नहीं है .हर परिभाषा एक दुसरे से अलग होते हुए भी सिर्फ एक ही बात का रोना रोती है की "हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है"
ब्रिटिश राज के के दो-सौ  सालों तक  "हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है" के थोथे  प्रचार का क्या यही मतलब समझा जाये की करीब सौ करोड़  हिन्दुओं का कोई धर्म नहीं था और न अभी है?
ऐसे कुप्रचार का एक मात्र लक्ष्य केवल हिन्दू धर्म के प्रति अश्रद्धा,हीनता,संदेह की भावना पैदा करना रहा है ताकि हिन्दुओं को धर्मान्तरित करके हिंदुत्व को मिटा दिया जाये. और  इसमें ईसाई  मिशनरिया, और इस्लाम के अनुयायी जी जान से लगे हुए है, और उन का साथ देने के लिए हिन्दू पैदा होकर भी हिंदुत्व से अनजान सेक्युलर जमात (जिन्हें शायद सेक्युलर का अर्थ भी नहीं पता ) तैयार बैठी है.
मगर हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों की अटल धारणा  है की हिंदुत्व ईसाइयत और इस्लाम की तरह किसी मानव द्वारा स्थापित कट्टरवादी पंथ(रिलिजन) नहीं है,क्योंकि हिन्दुधर्म ईश्वरीय ज्ञान पर आधारित,पक्षपात रहित स्वतंत्र विचारों का स्वागत करने वाला,प्रगतीशील,मानव-कल्याणकारी,संपूर्ण ब्रह्माण्ड में स्थित जीव मात्र का हित चाहने वाला,संपूर्ण मानव धर्म है.
इसलिए हिंदुत्व धर्म है कोई पंथ (रिलिजन) नहीं है.क्योंकि रिलिजन शब्द  धर्म शब्द का समानार्थक या पर्यायवाची शब्द नहीं है. दोनों शब्दों में पर्याप्त मौलिक अंतर है.
अतः रिलिजन और धर्म की परिभाषा और उनके अंतर को समझना गंभीर रूप से जरूरी है. तभी हम इस्लाम और ईसाइयत को हिन्दू धर्म की तुलना में अच्छी तरह से समझ पायेंगे.
अगली पोस्टों में रिलिजन और धर्म की परिभाषा और उनके अंतर को समझने की कोशिश की जायेगी

Saturday, April 3, 2010

परमात्मा की सहमती सिर्फ मानव धर्म में

मार्च के चक्कर में ब्लॉग का चक्कर लगाना नहीं हो पाया. फुर्सत मिलते ही नेट पे आया तो  आप सभी के स्नेह की फुहारें दिमाग को शांति दे गयी.
डी.पी.राणाजी,विजयप्रकाश जी,सौरभ आत्रेय जी,नवीन जी त्यागी,जैसे आदरणीय महापुरषों का अमूल्य निर्देशन पाकर निहाल हो गया.
और मेरे बड़े भाई  दीपपांडे जी,कुंवरजी, संजीवजी,जीत भाई का प्यार तो सदा तैयार है ही बरसने के लिए.

प्रतुल वशिस्ठजी आपने जो पूछा था तो जितनी बुद्धि है उस के अनुसार जवाब देने की कोशिश की है-

— यदि आप मुसलमान परिवार में जन्म लेते क्या तब भी लोगों को यही धार्मिक मजबूती दिखती?
     @अब सरजी यह तो कुछ ऐसा प्रश्न है की "एक निबंध लिखो की अगर मै प्रधानमंत्री होता तो क्या करता "
— क्या परमात्मा की हिन्दू धर्म वाले परिवार में जन्म लेने पर सहमती- असहमति हुआ करती है?
     @परमात्मा की सहमती सिर्फ सर्वकल्याण की भावना रखते हुए मानव धर्म की पलना करने वाले की साथ होती है ऐसा मेरा मानना है, जो की मुझे बुजुर्गो ने समझाया है .
— क्या एक पाखण्ड के गढ़ को तोड़कर दूसरा पाखण्ड स्थापित करना उचित है?
     @क्या आप रात के समय रेड-लाइट पे गाडी रोकना पाखंड समझेंगे जब कोई पुलिसवाला वहां नहीं हो?
इसी तरह जो भी परम्पराए हमें विरासत में मिली है, हरेक का कोइ-ना-कोई मतलब जरूर रहा है . अब हमने ही अपने स्वार्थों की खातिर उनमे छेड़छाड़ करके उन्हें पाखंड बना के रख दिया तो,इसमें परम्पराओ की गलती तो नहीं है ना ?
इसलिए मान्यताओ को पाखंड बताना मैं ठीक नहीं समझता. फिर एक को  तोड़ने और और दूसरी के स्थापना की बात फिर रह ही नहीं जाती .

उत्साहवर्धन के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद् ! आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में

Friday, April 2, 2010

बहता पानी सदा निर्मल

ज्ञान तो अपने आप में हमेशा पूर्ण है, कहीं से नया नहीं पैदा होता और ना ही कभी उसका क्षरण होता है.
सिर्फ संस्कृतियों को,मानव जीवन को संचालित करने वाली नीतिया समय समय पे बदलती रही है,
बहता पानी ही सदा निर्मल हुआ करता है, जहाँ कहीं भी पानी ठहर जाता है तो उसमे सडन पैदा होने लगती है.  भारतीय संस्कृति की धारा सदा प्रवाहमान रही है. इस संस्कृति ने परिवर्तन को संसार का नियम माना है, नए विचारों को कभी पूर्व ज्ञान का विरोधी नहीं माना.
क्योंकी  "ज्ञान" ज्ञानी की व्याख्याओं के कारण ज्ञान नहीं होता है, बल्कि "ज्ञान" की उपलब्धता से कोई "ज्ञानी" बनता है.
जिस समय ध्यान  की सहायता से उस पूर्णब्रह्म का सहज में साक्षात्कार किया जा सकता था,तदनुरूप समाज की नीतिया थी,समय के साथ मानव की बुद्धि को वह ज्ञान कठिन लगने लगा तो उस हिसाब से नीतिगत परिवर्तन हुए.
ज्ञान को सरलता से बुद्धि गम्य बनाने के लिए व्याख्या स्वरुप उपनिषदों का निर्माण हुआ पुराणों- स्मृतियों के माध्यम से ज्ञान को समझने में सहायता मिली.
ब्रह्मं के स्वरुप का बोध करने वाले ध्यान को स्पष्ठ करने के लिए और मन की एकाग्रता को स्थिरता के लिए मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ था, भाव मूर्ति ही भगवान है नहीं, बल्कि मूर्ति में भी भगवान है ,ये ही रहा . मूर्ति उस चैतन्य के स्वरुप का बोध कराने में किस तरह सहायक हो पाती है , यह इस विष्णु ध्यान मंत्र की सहायता से समझने की कोशिश कर सकते है.

शास्त्रों में शेषशायी भगवान विष्णु का ध्यान इस प्रकार किया गया है कि-
ध्यायन्ति दुग्धादि भुजंग भोगे ।
शयानमाधं कमलासहायम्॥
प्रफुल्लनेत्रोत्पलमंजनाभ, चर्तुमुखेनाश्रितनाभिपद्म । आम्नायगं त्रिचरणं घननीलमुद्यछ्रोवत्स कौन्तुभगदाम्बुजशंखचक्रम् ।
हृत्पुण्डरीकनिलयं जगदेकमूलमालोकयन्ति कृतिनः पुरुषं पुराणम्॥
अर्थात्-भगवान क्षीर सागर में शेषनाग पे  सोये हुए हैं, लक्ष्मी रूपणी प्रकृति उनकी पादसेवा कर रही है, उनके नाभिकमल से चर्तुमुख ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई है, उनका रंग घननील है, उनके हाथ हैं जिनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं- वे जगत् के आदि कारण तथा भक्त-जन हृत्सरोज बिहारी हैं ।
इनके ध्यान तथा इनकी भावमयी मूर्ति में तन्मयता प्राप्त करने से भक्त का भवभ्रम दूर होता है ।
क्षीर का अनंत समुद्र सृष्टि उत्पत्तिकारी अनन्त संस्कार समुद्र है जिसको कारणवीर करके भी शास्त्र में वर्णन किया है । कारणवीर जन्म न होकर संसारोत्पत्ति के कारण अनन्त संस्कार है ।

संस्कारों को क्षीर इसलिये कहा गया है कि क्षीर की तरह इनमें उत्पत्ति और स्थिति विधान की शक्ति विद्यमान है । ये सब संस्कार प्रलय के गर्भ में विलीन जीवों के समष्टि संस्कार हैं ।
अनन्त ननाश अथवा शेषनाग अनंत आकाश को रूप है जिसके ऊपर भगवान् विष्णु शयन करते हैं ।
शेष भगवान् की सहस्रफण महाकाश की सर्वव्यापकता प्रतिपादन करती है, क्योंकि शास्त्र में ''सहस्र '' शब्द अनन्तता-वाचक है ।

आकाश ही सबसे सूक्ष्म भूत है, उसकी व्यापकता से ब्रह्म की व्यापकता अनुभव होती है और उससे परे ही परम-पुरुष का भाव है इस कारण महाकाशरूपी अनन्तशैया पर भगवान सोये हुए हैं ।
लक्ष्मी अर्थात् प्रकृति उनकी पादसेवा कर रही है । इस भाव में प्रकृति के साथ भगवान का सम्बंध बताया गया है । प्रकृति रूप माया परमेश्वर की दासी बनकर उनके अधीन होकर उनकी प्रेरणा के अनुसार सृष्टि स्थिति, प्रलयंकारनी है ।
इसी दासी भाव को दिखाने के अर्थ में शेषशायी भगवान की पादसेविका रूप से माया की मूर्ति बनाई गई है ।
भगवान के शरीर का रंग घननील है । आकाश रंग नील है । निराकार ब्रह्म का शरीर र्निदेश करते समय शास्त्र में उनको आकाश शरीर कहा है, क्योंकि सर्वव्यापक अतिसूक्ष्म आकाश के साथ ही उनके रूप की कुछ तुलना हो सकती है ।अतः आकाश शरीर ब्रह्म का रंग नील होना विज्ञानसिद्ध है ।
भगवान के गलदेश में कौस्तुभ मणि विभूषित माला है । उन्होंने गीता में कहा है :-
मनः परतरं नान्यत् किंचिदरित्र धनंजय ।
मुचि सर्वमिद प्रोक्तं सूत्रे मणिगणा इव॥
भगवान की सत्ता को छोड़कर कोई भी जीव पृथक नहीं रह सकता, समस्त जीव सूत्र में मणियों की तरह परमात्मा में ही ग्रथित है । सारे जीव मणि है, परमात्मा सारे जीवों में विराजमान सूत्र है ।
गले में माला की तरह जीव भगवान में ही स्थित हैं । इसी भावन को बताने के लिए उनके गले में माला है ।
उक्त माला की मणियों के बीच में उज्ज्ावलतम कौस्तुमणि नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव कूटस्थ चैतन्य है ।
ज्ञान रूप तथा मुक्तस्वरूप होने से ही कुटस्थरूपी कौस्तुभ की इतनी ज्योति है । माला की अन्यान्य मणियाँ जीवात्मा और कौस्तुभ कूटस्थ चैतन्य है ।
यही कौस्तुभ और मणि से युक्त माला का भाव है ।
भगवान के चार हाथ धर्म अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चतुर्वर्ग के प्रदान करने वाले है ।
शंक, चक्र,गदा और पद्म भी इसी चतुर्वर्ग के परिचायक है ।
(http://hindi.awgp.org/?gayatri/sanskritik_dharohar/bhartiya_sanskriti_aadharbhut_tatwa/karmakand_panrmparae/bahudev_vad/)

कोई भी उपासना पद्दत्ति प्रतिक पूजा से दूर नहीं है. चाहे फिर उसका कारण जो भी हो .
एक बार एक राजा ने मूर्ति पूजा का विरोध करते हुए स्वामी विवेकानंद जी से कोई ऐसा तर्क पेश करने को कहा जिससे वो मूर्ती पूजा को सही सिद्ध कर सके इस पर स्वामीजी ने राजा से उनके पिताजी की तस्वीर की और इशारा करते हुए कहा की आप इस तस्वीर पर थूक दीजिये तो राजा क्रोधित हो गए तब स्वामीजी ने कहा की ये तो एक कागज़ का टुकड़ा है आपके पिताजी तो नहीं हैं फिर आप क्रोधित क्यों हो रहे हैं तब राजा के बात समझ में आई की जिस प्रकार उसके पिता के प्रति उसका सम्मान और प्रेम उनकी अनुपस्थिति में अब उस तस्वीर से जुड़ गया है ठीक उसी  प्रकार मूर्ती रूप में भक्त की भगवान् से आस्था जुडी होती है

मुस्लिम बंधु "हज़े-अस्वद " को चूमने का कारण बताते हुए कहते है की श्रीमोहम्मद साहब ने इसे चूमा था इसलिए हम इसे चूमते है , और कोई कारण नहीं है.
फिर जब उनसे पूछा जाता है की श्रीमोहम्मद साहब ने इसे क्यों चूमा था तो बताते है की उनसे पहले से ही काबा के लोग इसे चुमते आ रहे थे, इसीलिए उन्होंने लोगो की भावनाओ को बेवजह कष्ठ  पहुँचाना  उचित ना समझ कर इसे चूमा था.(बात कुछ हजम नहीं हुई- जो श्रीमोहम्मद साहब अपनी छड़ी से काबा के सारे बुतों को तोड़ डालते है,बिना लोगो की भावनाओ का ख्याल किये हुए.वे किस प्रकार सिर्फ "हज़े-अस्वद " को लोगो की भावनाओ का ख्याल करके चूम लेते है.)