Thursday, December 30, 2010

जयपुर दर्शन --------- 2

जयपुर का राज-प्रासाद
"बान्दरवाल का दरवाजा"
दुदुम्भी-पोल
जलेब-चौक
उदय-पोल
दीवान-ऐ-आम
सवाई मानसिंह म्यूजियम
सर्वतोभद्र --- दीवान-ऐ-ख़ास
मुबारक महल
चन्द्रमहल
जनानी ड्योढ़ी
जंतर-मंतर वेधशाला
हवामहल
जयनिवास उद्यान
गोविंददेवजी का मंदिर
ताल कटोरा
बादल महल
त्रिपोलिया
ईसरलाट -- सरगासूली 


जयपुर शहर जिस माप, पैमाने और ढर्रे पर सवाई जयसिंह ने बसाया वह आज भी सबका मन मोह लेता है.  इसकी सबसे बड़ी मिसाल जयपुर का नगर-प्रासाद या राजमहल है जो नौ चौकडियों के इस शहर के बीचों-बीच स्थित है. परकोटे से घिरे शहर का कुल सातवाँ हिस्सा इस महल की सरहद में आता है.
जयपुर राजमहल का यह क्षेत्र एक तरह से शहर के अन्दर शहर है. राजा-रानियों की नगरी, जिसमें अनेक भव्य महल, दर्जनों मंदिर,लम्बे चौड़े बाग़ बगीचे, आवासीय घर भरें है.
जयपुर का यह नगर-प्रसाद वस्तुतः नगर-कोट है. सामरिक स्थापत्य में आठ तरह के किले माने गए है. इनमें नगर कोट वह है जो धराधार तो होता ही है, जनसंकुल नगर से भी घिरा होता है. जब जयपुर शहर की आयोजना हो रही थी तो राजा के निवास के लिए नगर का यह मध्यवर्ती क्षेत्र सर्वथा उपयुक्त माना गया. क्योंकि उत्तर दिशा में नाहरगढ़ और गणेश गढ़ की पहाड़ियां व ताल कटोरा और राजामल के तालाब से, जिनमें मगरमच्छ भी खूब थे, सुरक्षित था. दक्षिण में मोदीखाना और विश्वेश्वर जी की चौकडियाँ, पश्चिम में पुरानी बस्ती और उसके सामने तोपखाना की चौकडियाँ रहनी थी. और पूर्व में गलताजी व लाल डूंगरी की पहाड़ियों से प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त थी.

"बान्दरवाल का दरवाजा"

जयपुर के इस भव्य राजमहल में प्रवेश का परम्परागत प्रवेश द्वार है सिरह ड्योढ़ी का पूर्व की ओर देखता दरवाजा जिसे "बान्दरवाल का दरवाजा"  भी कहतें है.  इस पोल से राजाओं के आवास चन्द्रमहल तक पहुँचने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने हुए दरवाजों या "पोळो" की श्रंखला में से होकर निकलना होता था. इस सारे रास्तें में कदम कदम पर राजसी वैभव, दरबारी भव्यता की प्रतीति होती है.
बान्दरवाल के दरवाजें में प्रवीश करतें ही दायीं तरफ दो दुमंजिले "नोले" (गैरेज) हैं, जिनमें ऐसे 'रथ' या गाड़ियाँ बंद है जो अपने आप में पूरी की पूरी हवेली है. ऐसा रथ जो दो-दो हाथियों को जोतकर खींचा जाता था, हाथियों के इस रथ को "इन्द्र-विमान" कहतें है.
इन्द्र-विमान

दुदुम्भी-पोल
यहाँ से जलेब-चौक में दुदुम्भी-पोल या नक्कारखाने के दरवाजें से होकर प्रवेश किया जाता है. एक स्थापत्य-कला मर्मज्ञ का कहना है की दुदुम्भी-पोल भारत के सर्वोत्तम दरवाजों में से एक है. राजतंत्र के जमाने में यहाँ सुबह-शाम नौबत बजती थी .
दुदुम्भी-पोल (नक्कारखाना)

दरवाजा क्या है एक हवेली है जो पहले रंगों की सजावट से भरा था. सरमिर्जा इस्माइल के जमाने में इस पर एक ही सस्ता रामराज का पीला रंग पोत दिया गया जिससे इसकी पुरानी शोभा तो जाती रही, लेकिन इमारती खूबियाँ आज भी मुंह बोलती है.


जलेब-चौक
अरे नहीं जलेबी-चौक नहीं, जलेब कहिये. जलेब का आशय रक्षा-डाल से है और जलेब-चौक वह विशाल चौकोर चौक है जिसमें सिरह ड्योढ़ी या मर्दानी ड्योढ़ी से आजीविका कमाने वाले शागिर्द-पेशा लोग रहते थे और दरबार या राजा की सवारी का सारा ताम-झाम जुटाते थे. जलेब चौक के सामने उदय-पोल  से सिरह ड्योढ़ी या ख़ास महल को जाने वाला रास्ता है.

उदय-पोल
पलस्तर पर चितराम (चित्रकारी) या रंगीन बेलबूटों के काम पर लोई घिसाई से जैसा चिकनापन इस शहर की पुरानी इमारतों में लायी जाती थी, उसका यह दरवाजा बेहतरीन नमूना है. 

उदयपोल

यहाँ से दाहिनी ओर घुम्तें ही विजय-पोल है इसके बाद एक बड़ा चौक, यहाँ से बायीं ओर घुमने पर जयपोल है और उसके आगे फिर एक छोटा चौक और गणपतिपोल, जो उस विशाल चौक की आड़ बना हुआ है जिसमें "दीवाने-आम" है.
इस तरह बंदरवाल दरवाजे से यहाँ तक छ: "पोल" पार करने पर "दीवाने-आम" और सांतवीं अम्बापोल पार करने पर "दीवाने-ख़ास" या "सर्वतोभद्र" आता है.

दीवान-ऐ-आम
दीवान-ऐ-आम एक विशाल सभा भवन या दरबार हॉल है जो एक चबूतरे या ऊँची कुर्सी पर बना है. यह तीन तरफ से खुला और बरामदों से घिरा है, जिनकी कामदार किनारों वाली मेहराबें संगमरमर के शुण्डाकार स्थम्भो की दोहरी कतारों से उठी है. मेहराबों और छत में रंगों और सोने के पानी के काम से जैसे डिजाईन बनाए गए है वह दुर्लभतम है .इस बुलंद इमारत की ऊँची छत में जो विशाल झाड फानूस लटक रहे है, जब रोशन हो  जातें है तो सब-कुछ स्वप्न-लोक सा लगने लगता है.

जयपुर के आखिरी राजा सवाई मानसिंह द्वितीय (1992-1970 ई.) ने  इसी दीवाने-आम में 16081 वर्ग मील में फ़ैली और चौबीस लाख की आबादी वाली जयपुर रियासत को राजस्थान के राज-प्रमुख की शपथ लेकर इतिहास के गर्भ में विलीन होते देखा था. 30 मार्च, 1949 के दिन दीवाने-आम में जो आख़री दरबार हुआ था वह उस सारे इलाके की किस्मत बदलने वाला था जिसे अब राजस्थान कहते हैं . जिस भवन में कोई भी हिंदुस्थानी पगड़ी बांधे बिना प्रवेश नहीं पाता था, उसमें सोने के सिंहासन पर भारत के लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल "उघाड़े-माथे"-नंगे सिर- विराजमान थे. जर्क-बर्क साफा बांधे सवाई मानसिंह और उनके साथ दूसरे राजा तो अपने राज-पाट ख़ुशी-ख़ुशी छोड़ रहे थे, लेकिन सफ़ेद टोपी वाले --जो भारत का राज संभालने जा रहे थे-- आगे बैठने के इंतजाम को लेकर ही आपस में झगड़ने लगे थे और कुछ तो "वॉक-आउट" भी कर गए थे

 
जयपुर रियासत का राजस्थान में विलय. 30 मार्च को सरदार वल्लभ भाई पटेल महाराजा सवाई मानसिंह को राजप्रमुख की शपथ ग्रहण कराते हुए

इसी दीवाने-आम में अब सवाई मानसिंह म्यूजियम है. महाराजा सवाई मानसिंह ने पोथिखाना और सिलेह्खाना से कुछ चीजें चुनकर यह संग्राहलय स्थापित किया था.
संग्राहलय में पोथिखाना की कुल 93 पांडुलिपियाँ प्रदर्शित की गयी है और इनके अलावा बीस पांडुलिपियाँ ऐसी है जिन्हें "कलात्मक" वस्तुओं में गिना जाता है. क्योंकि हस्तलेख और चित्रों, दोनों ही द्रष्टियों से यह महत्वपूर्ण और मूल्यवान है.
आमेर-जयपुर  शैली के उत्कृष्ट चित्रों के नमूने जो रागमाला, भागवत, देवी महातम्य आदि ग्रंथों को सचित्र बनाने के लिए तैयार किये गए थे, प्रदर्शित हैं.



मुग़ल काल के बेहतरीन कालीन-गलीचे, सोने-चांदी का हाथी का हौदा, तख्ते रवां , अम्बाबादी,पालकी और रानियों के बैठने की छोटी गाडी, जैसे सवारी के कुछ साधन प्रदर्शित है.
 



सिलेह्खाने के अस्त्र-शस्त्र इस संग्राहलय का दूसरा भाग है जो आगे  चलकर मुबारक महल के चौक में एक दूसरे हिस्से में प्रदर्शित है. यहाँ तरह तरह की तलवारें. किसी की मूठ मीनाकारी की है तो किसी में जवाहरात जड़ें हैं. तरह तरह की बंदूकें, ढाल,गुर्ज,बाघनख,जिरह-बख्तर और ना जाने क्या-क्या हथियार ! अकबर के सेनापति आमेर शशक राजा मानसिंह प्रथम का खांडा (तलवार) देखकर अचम्भा होता है की इसे उठाने वाला किस डील-डौल का रहा होगा.




संग्राहलय का तीसरा विभाग एक प्रकार से वस्त्र प्रदर्शनी है. यह मुबारक महल में ऊपर है.



जयपुर दर्शन श्रंखला में जयपुर के राज-प्रासाद की सैर अभी शुरू ही हुयी है. बहुत कुछ बाकी है अभी.
फिर इसके बाद चार दिवारी से बाहर निकल कर नए जयपुर और आस-पास के स्थानों में घूमेंगे जी .
बड़ी मुश्किल से यह पोस्ट लग पायी है, लगातार संपर्क भी बना नहीं रह पायेगा शायद .........पर आप तो जयपुर दर्शन का मज़ा लीजिये :)   

Saturday, December 18, 2010

जयपुर-दर्शन ------- 1






आगामी पौष कृष्णा पडवा, जो की 22 दिसंबर को पड़ेगी. गुलाबी नगर जयपुर का स्थापना दिवस है. यानी हैप्पी बड्डे जी . तो इसी सन्दर्भ में जयपुर स्थापना महोत्सव मनाते हुए "जयपुर-दर्शन" श्रंखला के तहत जयपुर से जुडी पोस्ट लिखने का मन बनाया है. आशा है आपको भी जयपुर के बारें में पढ़कर अच्छा लगेगा.


जयपुर एक नयनाभिराम नगर मात्र नहीं, एक सांस्कृतिक बोध और साकार सपना है, जिसमें जीवन के रंग-ढंग, सुरुची और आनंदाभूति के आनंद, योद्धा के शौर्य, विद्याव्यसनी की कल्पना और हस्तशिल्पों के हुनर का ताना-बाना इस तरह गुंथा हुआ है की एक अपने ही प्रकार की मौलिकता की सृष्ठी हो गयी है .
जयपुर का अपना व्यक्तित्व है जो न केवल इस शहर में विद्या, विज्ञान और कला-कौशल के त्रिवेणी संगम से उभरा है, बल्कि उन मूल्यों का भी प्रतीक है जो जीवन को सुखद और समरस बनाने में सहायक होतें है. यही कारण है की जयपुर को आज के वास्तुकार और स्थापत्य-मर्मज्ञ भी संसार के सर्वसुन्दर नगरों में गिनते है.
जयपुर अपने अद्वितीय नगर नियोजन, सम़द्व ऐतिहासिक एवं सांस्‍क़तिक धरोहर के कारण देशी विदेशी पर्यटको के आकर्षण का केन्‍द्र रहा है . जयपुर के संस्‍थापक सवाई जयसिंह ने तत्‍कालीन सीमित साधनों के बावजूद विश्‍व के अनेक विख्‍यात नगरों के मानचित्रों का अध्‍ययन करने के बाद ज्‍योतिष एवं वास्‍तु सम्‍मत बातों को महत्‍व देते हुए इस नगर की स्‍थापना की ऐतिहासिक भव्‍य राजमहलों, आकर्षक बाजारों, रमणीय एवं सुर्दशन मंदिरों से अलंकृत यह शहर आज भी दुनियाभर के पर्यटकों को आकृष्ठ करता है. सवाई जयसिंह ने लगभग 2 लाख की आबादी को बसाने के लिये इस शहर की परिकल्‍पना की थी . शांत, सुव्‍यवस्थित एवं गुणीजनो के इस शहर की आबादी निरंतर बढती गयी और वर्ष 2001 की गणना के अनुसार यहां की आबादी 52 लाख 51 हजार 71 हो चुकी है .

अब से 283 साल पहले कछवाह वंश के शासक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितिय ने पौष कृष्णा एकम , विक्रम संवत 1784 (18 नवम्बर 1727 ईस्वी ) को अरावली पर्वत मालाओ की तलहटी में की, और आमेर के बजाय इसे नगर की अपनी राजधानी बनाया.
सवाई जयसिंह ने विश्‍व के सुंदरतम शहर की परिकल्‍पना की और इसे साकार करने का दायित्‍व अपने मुख्‍य वास्‍तुकार श्री विघाधर भट़टाचार्य को सौपा. स्‍थापत्‍य कला के उपलब्‍ध समस्‍त नमूनों का विस्‍तार से अध्‍ययन कर श्री विघाधर ने एक अनूठे नगर का नियोजन किया इस चतुर्भजाकार शहर को नौ चौकडियों में विभाजित किया . नगर के चारो ओर सात प्रवेश द्वार बनाये गये इनमें चांदपोल, अजमेरी गेट, सांगानेरी गेट, घाटगेट, सूरजपोल गेट, चारदरवाजा, जोरावरसिंह गेट आज भी शहर के जन जीवन के साक्षी बने हुए है .उसी अनुपात में तोपखाना हुजूरी , तोपखाना देश,मोदीखाना, विश्वेश्वरजी, रामचन्द्रजी, गंगापोल और सरहद नामक चौकड़ियों में में जयनगर को विभाजित किया गया. विभ्न्नि व्‍यवसायो को अलग अलग चौकडियों में व्‍य‍वस्थ्ति रूप से बसाया गया . आम जनता और व्यवसायिओं की सुविधा के लिए चांदपोल बाजार, किशनपोल बाजार, गणगौरी बाज़ार, त्रिपोलिया बाज़ार, जौहरी बाज़ार, रामगंज बाज़ार और सिरह ड्योढ़ी बाज़ार का निर्माण हुआ. सवाई जयसिंह ने जयपुर को कलाओं के क्षेत्रो में अग्रणी बनाने के लिये अनेक कलाकारों और विशेषज्ञो को विभिन्‍न स्‍थानो से लाकर उन्‍हें जयपुर में बसाया और राज्‍याश्रय प्रदान किया . इससे यह शहर शिल्‍पकला, चित्राकारी, मीनाकारी, जवाहरात, पीतल की नक्‍काशी, हस्‍त निर्मित कागज,रत्‍नाभूषण, ब्‍ल्‍यू पौट्री तथा छीपाकला आदि सभी कलाओं में उत्‍क़ृष्‍टता अर्जित कर सका .

जब नगर-नियोजन प्रायः अनजाना विषय रहा होगा, जयपुर के राजमार्ग ज्यामितिक सूत्रों और गणित की कसौटी पर खरे उतार कर बनाए गए थे. इन सड़कों का संगम एक नाप और आकार के चौराहों - जिन्हें चौपड़ कहा जाता है - पर होते है. जिनके बीच में फव्वारे जल की फुहारें छोड़तें है. दोनों और सूत बांधकर एक सी दुकाने और उनके ऊपर आवासीय एवं धार्मिक भवनों-हवेलियों और मंदिरों की पंक्तियाँ चली गयी है.

चौपड़ के नक्शे के अनुसार ही सड़कें बनवाई गई . पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली मुख्य सड़क 111 फुट चौड़ी रखी गई . यह सड़क, एक दूसरी उतनी ही चौड़ी सड़क को ईश्वर लाट के निकट समकोण पर काटती है. अन्य सड़कें 55 फुट चौड़ी रखी गई . ये मुख्य सड़क को समकोणों पर काटती है. कई गलियाँ जो चौड़ाई में इनकी आधी या 27 फुट है, नगर के भीतरी भागों से आकर मुख्य सड़क में मिलती है. जयपुर की एक बड़ी विशेषता है की इसके मुख्य राजमार्गों पर मुख्य बाज़ार है, और एक भी राजमार्ग पर किसी भी घर का रास्ता नहीं खुलता है, सारे घरों कें प्रवेशद्वार अन्दर की गलियों में ही है.
जयसिंह ने इस शहर को बनाने में जिस शैली को अपनाया, वह भारतीय स्थापत्य-कला की मूल धरा से अलग नहीं थी लेकिन आमेर आमागढ़ और धाट के पत्थर और यहाँ बनायी जाने वाली सुर्खी और कली के मेल से तैयार होने वाले चूने ने इस शैली में कुछ ऐसी विशेषताएं पैदा कर दी हैं जो जयपुर की अपनी है और भारत में दूसरी जगह नहीं मिलती. यहाँ की इस निर्माण सामग्री ने बड़े हलके-फुल्के अंदाज में बड़ी से बड़ी इमारतें बनाई और स्थापत्य कला के अनुपातों का ऐसा निर्वाह किया की आज के विशेषज्ञ भी उन्हें देखकर दंग रह जातें है .

जयपुर के इमारती काम की इन खूबियों में नुकीली, कामदार किनारों वाली या सादा मेहराबें, टोडों (ब्रैकटों) पर झूलतें हुयें झरोंखे, पालथी मारकर बैठी हुयी चौकोर, अष्टकोण या आयताकार गुम्बदें, पतलें खम्भों पर उठी हुयी गुम्बजाकार छतरियाँ, गोखों से उठाये गए ताज, विशाल पोल या द्वार, सीढियों के बजाएं घुमावदार खुर्रे, चबूतरों के साथ ऊँची कुर्सी, खुले लम्बे-चौड़े चौक और उनके चौतरफा शुंडकार खम्बों पर वितानयुक्त मेहराबों वालें लम्बें दालान जो कहीं-कहीं जालियों से बंद हैं, गिने जा सकतें है.पत्थर के टुकड़ों की ठोस चुनाई और उस पर चूने का मोटा पलस्तर जयपुर की इमारतों के फौलादगी का बीमा होता है. नक्काशी के बजाये रंगों की सजावट या बेल-बुटें होतें है जो, "लोई" या बारीक चूने-कली के घोल से पाट कर इस तरह रगड़-घिस दिए जातें है की पीढ़ियों तक उनकी चमक बरकरार रहती है.

जयपुर के निर्माण में जयपुर के सभी शासकों का कुछ ना कुछ योगदान रहा है. लेकिन जयपुर संस्थापक सवाई जयसिंह के बाद सवाई प्रतापसिंह का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय कहा जा सकता है . और महाराजा सवाई रामसिंह का तो जयपुर को गुलाबी नगरी के रूप में पहचान देने का योगदान उल्लेखनीय है ही.
गुलाबी नगर जैसा हम आज देखतें है अपने निर्माण के समय गुलाबी नहीं था. जयपुर को गुलाबी रंग सवाई रामसिंह ने दिया था.


किपलिंग ने जयपुर को "अचंभो का नगर" कहा था. वास्तव में अपनी स्थापना के समय से ही जयपुर ने भारतीय और विदेशी मेहमानों को आकर्षित और आश्चर्य चकित किया है .
तिफैन्थैलर ने, जो जयसिंह के समय जयपुर आया था, लिखा है की -----
पीछे की पहाड़ी से जयपुर नगरी का द्रश्य अत्यंत मनोहारी है. यह नगर नया होते हुए भी निश्चित रूप से भारत के प्राचीन नगरों में सबसे ज्यादा सुन्दर है. इसका प्रमुख मार्ग इतना चौड़ा है की उस पर छ : सात गाड़ियां बिना कठिनाई के एक साथ चल सकती है .

१८२० ई. में एक ब्रिटिश सेना अधिकारी ने कहा था -----
"मैं यह काहे बिना नहीं रह सकता हूँ की सुन्दरता और स्वछता की द्रष्टि से इंग्लैण्ड के मुश्किल से पांच-छ: मार्ग ही जयपुर की बड़ी चौपड़ से अच्छे होंगे ."

एक फ़्रांसिसी विद्वान जो १८३२ ई. में जयपुर आया था, कहता है की ----
"मुख्य मार्ग ही मुख्य बाजार है दोनों ओर महलो,मंदिरों और मकानों की कतारों के नीचे कारीगरों की दुकाने है. मुख्य मार्गों के बीच व्यापारियों की बड़ी-बड़ी दुकाने है. दिल्ली में ऐसी केवल एक सड़क है जिसका नाम चांदनी चौक है. पर जयपुर की सब सड़कें इसी तरह की है."

नगर कोट, बाजार, चौपड़
जयपुर शहर की चारों तरफ ऊँची और पक्की चार दिवारी बनी हुयी है. जिसमें प्रवेश के लिए दरवाजे चांदपोल, सूरजपोल, रामपोल(घाटगेट), शिवपोल (सांगानेरी गेट), किशनपोल (अजमेरी गेट ), ध्रुवपोल हैं.



जयपुर का परकोटा


चांदपोल गेट



अजमेरी गेट

पहले सारा शहर इसी चारदीवारी में घिरा हुआ था. दरवाजे खुलने और बंद होने का समय निश्चित था.
इन दरवाजों से अन्दर पहुंचे तो चांदपोल बाज़ार, किशनपोल बाजार, त्रिपोलिया बाजार, जहरी बाजार, रामगंज बाजार जैसे प्रमुख बाजार हैं जो मुख्य मार्गों पर स्थित है.
शहर की मुख्य सड़क जो की चांदपोल गेट से लेकर सूरजपोल तक है 111 फीट चौड़ी है और दूसरी सडकें 54' 26',13'-6" फीट चौड़ी हैं .
इसी प्रकार सडक के दोनों ओर दुकानें भी निश्चित चौड़ाई की हैं. जिनके आगे राहगीरों के लिए बरामदें बने हैं .
चांदपोल से सूरजपोल तक के मुख्य मार्ग पर जहाँ दूसरें प्रमुख रास्तें एक दूसरें को समकोण पर काटतें है, उन चोरहों पर तीन चौपडों का निर्माण हुआ है. अजमेरी गेट से ब्रहमपुरी जाने वाला रास्ता जो कि किशनपोल बाजार और गणगौरी बाजार कहलाता है मुख्यमार्ग को जहाँ काटता है वोह कोतवाली चौपड़ या छोटी चौपड़ कहलाती है . सांगानेरी गेट से जौहरी बाजार होते हुए हवामहल के सामने से जो रास्ता चाँदी की टकसाल की तरफ जाता है यह जहाँ मुख्यमार्ग को समकोण काटता है वह बड़ी चौपड़ कहलाती है. घाटगेट से चार दरवाजा जाने वाला रास्ता रामगंज चौपड़ का निर्माण करता है.

चांदपोल से सूरजपोल वाला मुख्यमार्ग



दुकानों के आगे राहगीरों की सुविधा के लिए बारामदें





छोटी चौपड़
छोटी चौपड़ का एक पुराना फोटो जिसमें ईश्वरलाट(सरगासूली) भी दिखाई दे रही है .


बड़ी चौपड़ जिसमें हवामहल भी दिखाई दे रहा है .
और यह इसी एंगल का पुराना फोटो





जयपुर के बाज़ार के नए पुराने चित्र जिनमें चौड़ी सड़कें साफ़ देखी जा सकती है .


नाहरगढ़ किले से लिया गया जयपुर का नजारा जिसमें बड़ी सड़कें एक सीध में दिखाई दे रहीं है . यह तीन सड़कें जहाँ राजमार्ग को काटती हैं वहाँ ही चौपड़ें बनी है.



जयपुर परकोटे में प्रमुख दर्शनीय स्थल (इनका विस्तृत वर्णन अगली पोस्टों में होगा)

चन्द्रमहल
यह जयपुर का राजप्रासाद चन्द्रमहल है जिसे सिटी पैलेस कहते है .





हवामहल

जैसे खादी का नाम लेते ही चरखा और गाँधी बाबा याद आते हैं, वैसे ही जयपुर की पहचान बन चुका हवामहल
(यह हवामहल का पिछला हिस्सा है, शायद दुनिया की इकलौती ईमारत होगी जो जो अपने पिछवाड़े के लिए प्रसिद्द है )
ईश्वरलाट (सरगासूली)



जंतर-मंतर

तालकटोरा / बादल महल
(अभी सूखा है पर विस्तृत परिचय में इसका महत्त्व बताऊंगा )


श्रीगोविंददेवजी


त्रिपोलिया
( सभी चित्र गूगल से साभार )
चलिए जी आज काफी थक गए अभी तो और भी बहुत कुछ है इस जयपुर की चारदिवारी में और परकोटे के बाहर नए जयपुर में भी जिनका अगली पोस्टों में वर्णन करूँगा. जयपुर के आसपास के दर्शनीय स्थलों पर भी ले चलूँगा.
आप इस जवाहरात की नगरी के एक हीरे रणजीत रजवाड़ा की आवाज में "म्हारे देस" आने का निमंत्रण स्वीकार कीजिये .

video
(यूट्यूब से साभार )

Tuesday, December 14, 2010

ईश्वर इन उर्जावान युवा बुजुर्ग की उर्जा को अनंत तक बनाये रखे.


आज सतीश सक्सेनाजी का जन्म दिवस है. ईश्वर मानवीय संवेदनाओं से लबालब इन उर्जावान युवा बुजुर्ग की उर्जा को अनंत तक बनाये रखे. ब्लॉग जगत में ऐसा कौन होगा जो उनकी आत्मीयता का रस अपने अन्दर महसूस ना कर चुका होगा.
ब्लॉग-परिवार के सदस्यों के आपसी सद्भाव को बनाए रखने और आपसी संवाद की गर्मी को अपने मीठे गीत गुनगुनाकर शांत कर देने की कूवत जैसी उनमें है, वैसी प्रतिभा कम ही देखने को मिलती है. 
जैसा की Poorviya Ji ने एक जगह लिखा है > 
"सतीश जी, आप वो है जो दिल को दिलों से बांधते हैं. इस (आभासी) जगत का आप पर स्नेह का यही कारण है."

ईश्वर से प्रार्थना है कि हरदिल अजीज हमारे इस स्नेहिल पुंज को हमेशा अपनी दिव्यता से आलोकित रखे, जिसके प्रकाश में  हम जैसे बालकों को भी मार्गदर्शन मिलता रहे .

उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई देते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना है >>>>>>>>

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं श्रुणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।।

Saturday, December 11, 2010

आज़ादी .........कहानी नहीं हकीकत --1

मैं भौचक्का खडा था...........दिमाग सुन्न होता जा रहा था .............. पर उसके चेहरे पर एक भरपूर चमक थी  मानो कायनात की शहँशाई मिली है उसे........... बड़ा खुश होकर वह कह रहा था..........


"यार जिन्दगी जीने का असली मजा ही अब आ रहा है, सब काम अपने हिसाब से करता हूँ. किसी भी काम के लिए किसी से कुछ परमिशन का झंझट ही नहीं .  अनु भी बहुत खुश है जो जी करता है वही खाना बनाती है. कोई रोक टोक नहीं . अपनी पसंद के कपडे पहनती है.  सच यार बड़ा मज़ा आ रहा है अब लाइफ में . पूरी आजादी है अब ."


अपने माँ बाप का इकलौता लड़का अभिनव अपने परिवार की कैद से आज़ाद हो गया.
( कहानी नहीं हकीकत )

Tuesday, November 30, 2010

जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा ------- अमित शर्मा


रसाई माँगता हूँ नज़रों की तुझसे खुदा
जर्रे जर्रे में तू ही, दिखे ना कोई अलहदा  


नाद-ऐ-अनलहक की गूंज में सरसार रहूँ
एक तू ही  एक ही तू  बार बार हरबार कहूँ 

खालिक हो तुम कायनात के मालिक तुम हो
क्या है रीता तुमसे जो बता इन खाफकानो को 


गर कहूँ के तू  बस वहाँ और ना कहीं यहाँ
तेरी ही बुलंदी पे तोहमत होगा मेरा कहा


सदाकत का जाम पियूँ साकी तुम रहना
सदाअत में बन्दों की तेरे जिंदगानी रखना 


गाफिल ना होऊं फ़र्ज़ ओ ईमान से रहनुमाई रखना
भूल जाऊ मैं तुझको मगर तुम याद अमित रखना


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रसाई -----------    पहुंचने की क्रिया या भाव। पहुँच।
अलहदा -------     जुदा। पृथक्। अलग। भिन्न।
अनलहक -----     एक अरबी पद जो अहं ब्रह्मास्मि का वाचक है
सरसार --------    मग्न
खालिक --------   सृष्टि की रचना करनेवाला। ईश्वर। स्रष्टा।
 कायनात ------   सृष्टि
खाफकानो ------ पागल। 
सदाकत -------   सच्चाई। सत्यता।
सदाअत -------   भलाई  नेकी 
गाफिल ------    बेपरवाह, बेखबर, असावधान, उपेक्षक

Friday, November 26, 2010

आप जो पूछा किया करते हो हाल-ऐ-अमित तफ़ज्जुल है आपका


आप कहते हो ग़मज़दा क्यों हो, कुछ कहकहाया भी किया करो
कहकहा क्या ख़ाक लगाएं पर, जब तबियत-ऐ-जहाँ नासाज हो

कोई ना, हामी-ऐ-गैरत यहाँ पर , बस गैरियत सी जमी जहाँ पर
कह ना पाए बात अपनी रवानी में, ठण्ड सी घुली है हर जवानी में

आप जो पूछा किया करते हो हाल-ऐ-अमित तफ़ज्जुल है आपका
वरना ज्यादा  तफावत से ही पडा करता है आजकल हमारा वास्ता

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हामी-ऐ-गैरत --------- सद्भावना के तरफदार 
गैरियत -------------  परायापन 
तफ़ज्जुल -----------  बड़प्पन
तफावत-------------  वैर-विरोध आदि के कारण आपस में होनेवाला अन्तर। मन-मुटाव।

Tuesday, November 23, 2010

राजेंद्र स्वर्णकार जी की आवाज में, बाबा को टूटे-फूटे शब्दों में श्रद्धांजली


आज मेरे दादाजी की पुण्यतिथि है . काफी पहले अपने टूटे-फूटे भाव लिखे थे. उन्ही भावों को आदरणीय राजेंद्र स्वर्णकार जी "शस्वरं" ने अपनी मधुर वाणी से सिक्त कर दिया है, उनके इस स्नेह वर्षण से अभिभूत हूँ . पोस्ट की सज्जा भी उन्ही की की हुयी है, और ऑडियो फाइल ब्लॉग पर अपलोड    उनके प्रयास से ही हो पाया है. 
राजेंद्र स्वर्णकार जी की आवाज में, बाबा को टूटे-फूटे शब्दों में श्रद्धांजली----- "

 ॐ

आज फिर से रात भर आपकी याद आई 

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आज  फिर से रात भर आपकी  याद आई
आज फिर से  रात भर हुई  नींद से रुसवाई  
तस्वीर जो देखी आपकी चली फिर से पुरवाई 
गुजरी हर एक बात  दौड़ी आँखों में भर आई  

जिन्दगी की धूप से जब कभी परेशां हुआ था
आप का ही  साया मैंने हमेशा सर पे पाया था 
साये तो वैसे  अब भी  जिन्दगी में खूब मिले है
पर मिला ना अब तक आप सा हमसाया कोई   

याद आती है अब भी बैठ काँधे पे घूमना आपके
घुमाता हूँ जब  बैठा काँधे पे पडपोते  को आपके
यादों  में ही आएंगे क्या अब  दिने - क़यामत तक
कहिये तो फिर आ चलें "अमित" जरा बाज़ार तक